सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 96

रैवतगिरि कल्प-संक्षेप १३
मे रजत-स्वर्णमय चौबीस एवं लखाराम में चौबीस जिनेश्वरो की
बहत्तर गुफाएँ कही हैं।
कालमेघ के आगे स्वर्णवालुका नदी से तीन सौ आठ कदम
उत्तर दिगा मे जाकर गिरि-कन्दरा मे प्रविष्ट होकर जल से
स्नान करके उपवासपूर्वक रहने से द्वार खुलता है। प्रथम द्वार मे
स्वर्ण-खान, दूसरे द्वार मे रत्न-खान है जो सघ के लिए अम्बा देवी
द्वारा विकुर्वित है। वहाँ कृष्ण के पाँच भण्डार हैं, अन्य दामोदर
के समीप हैं। अंजनशिला के अधोभाग में बीस पुरुप नीचे रजत-
स्वर्ण-धूलि बतलाई है।
उसके पश्चिम मे मगलक देवदाली है जिससे रस-सिद्धि होती
है। संघ के समुद्धार कार्य के लिए श्री वज्रस्वामी ने बतलाई है।
शस्य कड़ाह मे लेकर कोटिविन्दु का सयोग करने पर घण्ट-
गिला चूर्ण के योग से अजन-सिद्धि होती है।
विद्यापाहुड उद्देशक से रैवत कल्प समाप्त हुआ। (ग्रथाग्र ० ३८)
●
३. श्री उज्जयन्तस्तवः
श्री रैवतक, उज्जयन्त आदि नामो से प्रसिद्ध, श्री नेमिनाथ
भगवान द्वारा पवित्रित श्री गिरनार गिरीश्वर की स्तवना
करता हूँ।
भुवन मे यह स्थान सौराष्ट्र देग नाम से विख्यात है जिसकी
भूमि रूपी कामिनी के ललाट पर यह गिरिराज तिलक के
समान है।