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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 101

१८ विविध तीर्थ-कल्प
विलक्ष नगर मे मधुक गृह नामक दिव्य शिखर है, उसके
बीच मे गणपति रस-कुण्ड हैं जिसके ऊपर उपवास करके पूजन
करने पर गणपति के चलाया हुआ प्रवर-रस "पामापेवी" (?)
है और बग को स्तम्भित कर देता है, इसमे सन्देह नहीं ।
सहस्राश्रव नामक तीर्थ करज वृक्ष से मनोहर और सुन्दर है ।
वहाँ पर तुरियाचार नाम के पाषाण है, उसके दो भाग हैं। एक
भाग पारदमूत्र से पीसकर अ धरूषा मे धमन करने पर चाँदी वन
जाती है, जिससे मनुष्य दु खरूपी कान्तार से पार उतर जाता है।
अवलोकन शिखर की शिला के पीछे वहाँ श्रेष्ठ रस झरता है
जो तोते के पख के समान वर्ण वाला है और 'सुव्व' को श्रेष्ठ
सोना बना देता है ।
प्रद्युम्नगिरि पर अम्बिकाश्रम पद नामक स्थान हैं, वहाँ भी
पीली मिट्टी है और हेमवाद से श्रेष्ठ सोना बनती है ।
उज्जयन्त पर जहाँ ज्ञानशिला है और उसके नीचे भी पीली
मिट्टी है, उसे 'साहामिय' लेप से छाया मे सुखाने पर सोना
बनता है।
उज्जयन्त के प्रथम शिखर पर चढकर दक्षिण की ओर उतरने
पर तीन सौ धनुष 'पूतिकर' नाम की गुफा है, उसे उघाड कर
निपुण व्यक्ति को देखकर वहाँ जाना चाहिए । वहाँ बारह दण्ड
के अन्तर पर जवू फल जैसा दिव्य रस है, जिसे भाड मे सहस्र
भाग चाँदी के साथ घोलने पर सहसा बाजारू सोना हो जाता है।
अम्बिका भुवन के पूर्व दिशा से उत्तर दिशा पर्यन्त तापस-
भूमि है, वहाँ वासुदेव की पाषाणमय प्रतिमा दीखती है, उससे
उत्तर दिशा मे दश हाथ जाने पर पार्वती की प्रतिमा दिखाई
पडती है। जिसे अवराह मुहर अगुष्टिका से दबाने पर रास्ता
देती है। नौ धनुष प्रवेश करने पर दक्षिणोत्तर दिशा मे कूप