विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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स्वामी को अवलोकन किया जाता है । फिर पहले शिखर पर
गांवकुमार और दूसरे पर प्रद्युम्न (के विम्ब) हैं ।
इस पर्वत पर स्थान-स्थान पर चैत्यो मे रत्न-स्वर्णमय जिन-
विम्ब नित्य पूजा किए हुए दिखाई देते हैं । यहाँ की भूमि स्वर्ण-
मडिनी है और अनेक प्रकार के धातु रसो का भेदन करने वाली
देदीप्यमान दिखाई पडती है । रात्रि मे दीपक की भाँति प्रज्वलित
औषधियां दिखाई देती हैं । नाना प्रकार के वृक्ष-वल्ली-पत्र-पुष्प-
फलादि पद-पद पर उपलब्ध होते हैं । अनवरत खल-खलाहट
शब्द करके झरते हुए झरणो का जल और मत्त कोयल व भ्रमरो
के झकार सुनाई देते हैं ।
उज्जयन्त महातीर्थ कल्प शेप सक्षेप से यह श्री जिनप्रभसूरि
जी ने यथाश्रुत लिखा है ।
श्री रैवतगिर का कल्प समाप्त हुआ । इसके ग्रंथाग्रं० (अनुष्टुप
छंद के अक्षरो वाला) १६१ अक्षर २७ हैं ।
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