विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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हे शत्रुजय शैलेग । तुम्हारे गुण कौन विद्वान थोडा-सा भी
कहने मे समर्थ हो सकते हैं ? इस तीर्थ के प्रभाव से यात्रा करने
वाले और नमस्कार करने वाले मनुष्य के मन-परिणाम शुभ होते
हैं और वृद्धिगत होते हैं ।
हे गिरिराज ! तुम्हारी यात्रा को चलते हुए सघ के रथ, घोडे,
ऊँट और मनुष्यो के चरणो से पवित्र हुई रज भव्य-जनो के अग
मे लगने पर पाप को नष्ट करती है । अन्यत्र मासक्षमण करने पर
जितने पापो का क्षय होता है उतना आपको नमस्कार करने मात्र
से हो जाता है ।
श्री नामेय-ऋषभ के द्वारा जहाँ निवास किया गया है और
इन्द्र से प्रग्रसित वैभव वाला है, ऐसे हे गिरिराज ! हे सिद्धक्षेत्र !
मन वचन और काया से तुम्हे नमस्कार करता हूँ । मैने सरल मन
से तुम्हारा कल्प बना कर जो पुण्य अर्जन किया है, उससे सारा
विश्व वास्तविक सुख वाला बने ।
पोथी मे रहे हुए इस कल्प को जो पूजेगा उसे समस्त इच्छित
सम्पत्तियाँ और सिद्धि प्राप्त होगी ।
- इसके प्रारंभ करने पर संघ मे 'राजाधिराज' प्रसन्न हुए थे,
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