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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 442 में से

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पृष्ठ 92

शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ९
आदेश से श्री शान्तिनाथ और मरुदेवी के चैत्य का उद्धार करेगा।
नन्दिसूरि, आर्य श्रीप्रभ, मणिभद्र, यशोमित्र, धनमित्र, विकटधर्म,
मुमङ्गल और सूरसेन इस तीर्थ के उद्धार कराने वाले होगे जो
दुष्प्रसहसूरि के समय होने वाले विमलवाहन से पहले उद्धार
करेंगे।
जो यहाँ यात्रियो को कष्ट देते हैं अथवा उनका धन अपहरण
करते हैं वे अपने पाप के भार से वंश सहित घोर नरक मे पडते
हैं। यहाँ यात्रा-पूजा-तीर्थ द्रव्य की रक्षा और यात्री सघों का
सत्कार करने वाला, गोत्रसहित स्वर्ग लोक मे पूजा जाता है।
यहाँ पर वस्तुपाल और पेथड आदि के बनवाये हुए धर्म-
स्थानो का वर्णन करते हुए वक्ता पार नही पा सकता है। दूषक-
काल के प्रभाव से म्लेच्छो द्वारा इसके भविष्य मे भग होने की
सभावना करके मन्त्री वस्तुपाल एव तेजपाल—बुद्धिमानो—ने
ऋषभदेव व पुडरीक स्वामी की प्रतिमाएँ मम्पाणी पाषाण की
बनवा कर भूमिगृह मे रख दी थी।
कलिकाल के प्रभाव से स० १३६९, वैक्रमीय मे म्लेच्छो ने
जावड् स्थापित बिम्ब को भग कर दिया। इसके बाद स० १३७१
मे समरा शाह ने मूलनायक बिम्ब का उद्धार किया।
इस तीर्थ पर जो सघपति हो गए हैं, हो रहे हैं, और भविष्य
मे होगे, वे धन्य है। वे चिरकाल तक लक्ष्मी से समृद्ध रहे।
श्री भद्रबाहु स्वामी ने पहले 'कल्प पाहुड' से श्री शत्रुजय
कल्प बनाया था और उनके बाद श्री वज्रस्वामी ने और फिर
पादलिप्ताचार्य ने भी बनाया। उन्ही कल्पो से उद्धृत कर सक्षेप से
श्री जिनप्रभ सूरि ने यह श्री शत्रुजय कल्प प्रणीत किया है।
इस कल्प को वाचने, ध्यान करने, व्याख्यान करने, पढने और
श्रवण करने पर भक्तिशाली भव्य तीसरे भव मे सिद्धि प्राप्त
करते हैं।