विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४. उज्जयन्त महातीर्थ-कल्प
सौराष्ट्र देश मे उज्जयन्त नामक रम्य पर्वत है जिसके शिखर
पर चढ कर भक्तिपूर्वक नेमि जिनेश्वर को नमस्कार करो ।
अम्बिका देवी को न्हवण-अर्चन-गध-धूप-दीपक से पूजन कर
प्रणाम करके धनार्थी अर्थ प्राप्त करता है ।
गिरिशिखर, कुहर, कन्दरा, झरने, कपाट, विकट कूपादि मे
खत्तवाय को देखो, जैसा कि पूर्वाचार्यों ने कहा है ।
कन्दर्प के दर्प को काटने वाले, कुगति दूर करने वाले, भगवान्
नेमिनाथ का मन्दिर निर्वाण-शिला नाम से जगत मे विख्यात है ।
उसके उत्तर की ओर दश धनुष पर अधोमुख विवर है, जिसके
द्वार पर चार धनुष नीचे अवदान लिंग है, ' वहाँ पशु मूत्र गन्ध
वाला रस है । सौ पल ताँबे के साथ मिलाने पर चन्द्रमा और कुन्द
के समान उज्ज्वल चाँदी सहसा बन जाती है ।
पूर्व दिशा से धनुष्यान्तर पर वैसा ही है जैसे आगे बताया,
वह पाषाणमय है और दक्षिण दिशा मे बारह धनुष जाने पर वहाँ
हिंगुल वर्ण वाला दिव्य प्रवर रस दिखाई पडता है जो अग्नि के
सग से सर्व प्रकार के लोहे को स्पर्श मात्र से ही वेध कर सोना
बना देता है ।
उज्जयन्त पर विहला नामक नदी है और पार्वती की प्रतिमा
है जिसे अगुली से दबाने पर पर्वतीय द्वार खुल जाता है ।
उज्जयन्त गिरिराज पर शक्रावतार है जिसके उत्तर की ओर
सोपान पक्तियाँ है और कबूतर के वर्ण वाली मिट्टी है । पच गव्य
से बाँधकर पिण्डी बनाकर धमन करने पर श्रेष्ठ चाँदी बनती है