विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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आदीश्वर भगवान के प्रासाद का उद्धार करवाया । यहाँ तीर्थ मे
प्रवेश करते ही पहले आदीश्वर भगवान की विशद प्रतिमा के
दर्शन करने पर आँखे तृप्त होती है ।
श्री विक्रमादित्य से एक सौ आठ वर्ष बीतने पर जावडशाह
ने प्रचुर द्रव्य व्यय करके प्रतिमा को विराजमान किया । और
उसने मम्माण पर्वत मे उत्पन्न चमकीली कान्ति वाले मम्माण
रत्न पाषाण के ज्योतिरस रत्न द्वारा प्रतिमा घटित—निर्माण
करवाई ।
मधुमती नगर निवासी सेठ जावड ने पहिले श्री वज्रस्वामी से
शत्रुञ्जय का माहात्म्य सुना था । वह गन्धोदक स्नान कराने की
रुचि से लेप्यमय बिम्ब का विचार कर चक्रेश्वरी देवी को स्मरण
करके मम्माण पर्वत की खान मे गया और वहाँ से पाषाण की
प्रतिमा बनवा कर रथ मे आरोपण कर शुभ दिन मे भार्या-सहित
विमल गिरि की ओर चला । दिन मे प्रतिमा सहित रथ जितना
रास्ता चलता था, उतना ही रात्रि मे वापस लौट आता था ।
यह आश्चर्य देखकर जावडसाह का चित्त खिन्न हो गया और
उसने कपर्दि-यक्ष का स्मरण किया । और उसके हेतु और विधि
को ज्ञात कर वह अपनी पत्नी के सहित रथ के मार्ग मे टेढा सो
गया । उसके साहस से प्रसन्न हुए देवता ने रथ को बिम्ब सहित
पहाड़ के शिखर पर चढा दिया । सात्त्विको के लिए कुछ भी
दु साध्य नही है ।
मूलनायक का उत्थापन करके उनके स्थान पर मम्वाणी
पाषाण की प्रतिमा स्थापन करने पर लेप्य बिम्ब के भयंकर शब्द
से पर्वत के टुकडे हुए और उनके द्वारा छोडी हुई बिजली श्रेष्ठी के
बिम्ब ने हाथ मे लेकर मर्दन कर दी । वह सीढियो में छेद करती
हुई पहाड़ के देश को भेद कर निकल गई ।
जावड सेठ चैत्य शिखर पर पत्नी सहित चढकर प्रमोद से