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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 442 में से

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पृष्ठ 94

२. रैवतगिरि-कल्प संक्षेप
श्री नेमिनाथ जिनेश्वर को मस्तक नमाकर—नमस्कार कर,
रैवतगिरिराज—गिरनार का कल्प जैसा श्री वज्रस्वामी के शिष्य
और पादलिप्त सूरि ने कहा है, (कहूँगा)।
छत्रशिला के समीप शिलासन पर भगवान श्री नेमिनाथ ने
दीक्षा ली, सहस्राम्रवन मे उन्हे केवलज्ञान हुआ, लक्षाराम मे
मे देशना दी और 'अवलोकन' के उच्च शिखर पर निर्वाण पाये।
रैवतगिरि की मेखला मे श्रीकृष्ण ने वहाँ तीन कल्याणक के स्वर्ण-
रत्नमय प्रतिमालंकृत जीवित स्वामी के तीन चैत्य कराके अम्बिका
देवी (प्रतिमा) भी कराई। इन्द्र ने भी वज्र से पहाड को कोर के
स्वर्ण बलानक और रौप्यमय चैत्य, रत्नमय वर्ण और प्रमाणोपेत
प्रतिमा, अम्बा शिखर-पर रंगमण्डप, अवलोकन शिखर, बालानक
मण्डप मे शाम्ब ने इतने कराये। श्री नेमिनाथ के मुख से निर्वाण
स्थान ज्ञातकर निर्वाण के पश्चात् श्रीकृष्ण ने सिद्धविनायक
प्रतिहार की प्रतिमा स्थापित थी। तथा दामोदर के अनुरूप
१ कालमेघ, २ मेघनाद, ३. गिरिविदारण ४ कपाट, ५ सिंहनाद,
६ खोडिया और ७ रैवत तीव्रतप क्रीडन से क्षेत्रपाल उत्पन्न हुए।
इनमे मेघनाद सम्यग्दृष्टि और भ० नेमिनाथ का चरणभक्त है।
गिरिविदारण ने कचन बालानक मे पाँच उद्धार विकुर्वण किये।
वहाँ एक अम्बा देवी के आगे उत्तर दिशा मे एक सौ सात कदम
पर गुफा है, जहाँ अष्टम तप करके बलि-विधानपूर्वक शिला उठाने
पर बीच में गिरिविदारण प्रतिमा है। वहाँ से पचास कदम जाने
पर बलदेवकारित शाश्वत जिनप्रतिमा को नमस्कार कर उत्तर