विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउज्जयन्त महातीर्थ-कल्प १९
दिखाई पडता है उसमें निश्चय ही हरिताल लक्ष वर्ण वाला सहस्र-
वेधी रस है।
उज्जयन्त पर ज्ञानशिला विख्यात है, वहाँ पाषाण है, उसके
उत्तर पार्श्व मे दक्षिण अधोमुख विवर है, उसके दश धनुष दक्षिण
जाने पर हिंगुल वर्ण वाला शतवेधी रस है सो “सुव्व” को वेध
देता है इसमे कोई सन्देह नही।
वृषभ-ऋषभादि कूट पर पाषाण है, वहाँ पर सगम है। हाथी
को लीद के साथ स्पर्श करने पर वह सोना बन जाता है।
जिनालय के दक्षिण की ओर जानेपर जलुकचरी मिट्टी है, तिर्यञ्च
और मनुष्य के रक्त से विद्ध होने पर ताँबे को सोना बना देती है।
वेगवती नामक नदी है, उसमे मनशिल वर्ण वाले पाषाण हैं।
‘सुव्व’ को पत्रवेध करने पर स्रवित होता है और धमन करने पर
ताँवे को शीघ्र सोना बना देता है।
यह उज्जयन्त कल्प अविकल्प है, अम्बिका को प्रणाम कर जो
जिनभक्त करता है वह इच्छित सुख को प्राप्त करता है।
उज्जयन्त महातीर्थ का कल्प समाप्त हुआ।
५. रैवतगिरि-कल्प
पश्चिम दिशा मे सौराष्ट्र देश मे पर्वत-राज रैवत के शिखर
पर श्री नेमिनाथ भगवान का उत्तुग शिखर वाला भवन है।
पूर्वकाल मे वहाँ भगवान नेमिनाथ स्वामी की लेप्यमय प्रतिमा थी।
एक वार उत्तरदिशा-विभूषण कश्मीर देश से अजित और रतन