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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

श्री उज्जयन्तस्तव. १५

जाम्बवती की कुक्षी से उत्पन्न कृष्ण के पुत्र गाम्ब ने और
प्रद्युम्न एवं महाद्युम्न ने ऊँचे श्रृंग पर दुष्कर तपश्चर्या की। यहाँ
नाना प्रकार की औषधियाँ रात्रि मे जाज्वल्यमान-चमचमाहट
करती हैं। घण्टाक्षरगिला व छत्रशिला ऊँचे स्थान पर शोभित है।
सहस्राम्रवन व लक्षाराम एव दूसरे भी वनसमूह मयूर, कोयल
और भँवरो के संगीत से सुभग लगते हैं।
ऐसा वृक्ष, वल्ली, पुष्प या फल कोई नही है जिसे यहाँ इह-
लौकिक विद्वान भी न चाहते हो। जहाँ रथनेमि को उन्मार्ग से
सन्मार्ग मे लाया गया था, उस राजिमती की गृफा के अन्दर कौन
वंदन नही करते ?
यहाँ पर भव्य जनो द्वारा सम्पन्न पूजा, स्नात्र, दान और तप
मोक्ष सुख प्राप्ति के हेतु होते हैं। यहाँ जो इस पहाड़ पर दिग्भ्रम
से भी किसी भी मार्ग मे चला जाय तो वह भी चैत्य स्थित
जिनेश्वर को स्थापित और पूजित-अर्चित देखता है।
काश्मीर से आये हुए रत्नश्रावक ने यहाँ कुष्माण्डी-अम्बिका
के आदेश से लेप्यमय बिम्ब के स्थान पर पाषाणमय नेमिनाथ
प्रतिमा स्थापित की।
नदी-झरने-कुण्ड-खानो और लताओ की संख्या को कौन
गिनने वाला (गिनती कर सकता) है ? चैत्यो से अलकृत शिखरो
वाले रैवतगिरि को नमस्कार हो, जिस महातीर्थ का अभिषेक
मुक्तिदायक है।
सूरीन्द्रो से वर्णित और देवताओ के समान प्रभा वाले इस
गिरिराज की मैंने स्तुति की है ऐसा गिरनार और रजत-हेम सिद्धि
वाली भूमि आप सबको हर्षित करे। कवि ने युक्ति से अपना
जिनप्रभसूरि नाम भी इस गाथा मे दे दिया है।