विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ५
जो इस तीर्थ-शिखर पर प्रतिमा या मन्दिर बनवाता है वह
भारतवर्ष की ऋद्धि भोगकर स्वर्गश्री प्राप्त करता है।
नमस्कार-सहित तपश्चर्यादि करता हुआ मनुष्य पुण्डरीक
गिरि की स्मृति से उत्तरोत्तर तप फल प्राप्त करता है।
त्रिकरण शुद्धि पूर्वक इस तीर्थ को स्मरण करने वाला मनुष्य
छःमासी तप का फल प्राप्त करता है।
आज भी पुण्डरीक गिरि पर उत्तम अनशन करके शीलरहित
भी सुखपूर्वक स्वर्ग प्राप्त करता है।
यहाँ छत्र, चामर, कलश, ध्वज, स्थाल का दान करने वाला
विद्याधर एवं रथदान करने वाला चक्रवर्ती हो जाता है।
भावशुद्धिपूर्वक यहाँ दश पुष्पमालाओ को देने वाला भोजन
करता हुआ भी उपवास का फल प्राप्त करता है।
दुगुणा देने से छट्ठ तप, त्रिगुणा से अष्टम, चौगुना देने से
दशम, पाँच गुणा से द्वादश और क्रमशः बढते-बढते देने से फल
की भी उत्तरोत्तर वृद्धि कही गई है।
विमलाचल पर स्नान पूजा मात्र से जो पुण्य होता है, अन्य
तीर्थों मे वह स्वर्ण-भूषण और भूमिदान करने से भी नही होता।
यहाँ धूप-खेने से पक्षोपवास का फल और कर्पूर-पूजा से
मासक्षमण का फल प्राप्त करता है।
यहाँ निर्दोष भोजनादि से साधुओ को प्रतिलाभने से कात्तिक-
मासक्षमण का फल होता है। तीनो काल मंत्र पूर्वक स्नान करके
चैत्र व आश्विन मे "नमोऽर्हद्भ्य" पद का ध्यान करने से तीर्थंकर
पद अर्जन करता है।
पालीताना नगर में पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के दो
जिनालय है और जिनके नीचे नेमिनाथ भगवान का महान्
आयतन है।
मन्त्रीश्वर वाग्भट ने तीन करोड तीन लाख स्वर्ण व्यय कर