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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 442 में से

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उज्जयन्त महातीर्थ-कल्प १७

जो दारिद्रय व्याधि को नष्ट करती है और दुख-कान्तार से पार
लगा देती है।
शिखर के विशाल श्रुंग पर जहाँ पाद कुंट्टिमा दिखाई पडती
है उसके समीप गिखर पर कव्वड-हडा है उस पर पामह नामक
चाँदी है।
उज्जयन्त-रैवत वन मे जहाँ सुद्दार वानर है, उसका बाँया
कान कटा हुआ है, वह विवर के श्रेष्ठ द्वार को खोल देता है।
उस विवर मे प्रविष्ट होकर सौ हाथ जाने पर सुवर्ण वर्ण वाले
वृक्ष दिखाई पड़ते हैं, उनसे नीलां रस झरता है वह निश्चय से
सहस्रवेधी रस हैं। उसे लेकर निकलते हुए वानर-हनुमत को वाम
पाद से स्पर्श करना चाहिए, वह उस श्रेष्ठ द्वार को ढँक देता है
जिससे कोई भी मनुष्य जानने नही पाता।
उज्जयन्त शिखर पर कोहडि-अम्बिका गृह विख्यात है उसके
पोछे गिला है। उसके दोनो और औषधि है जिसे अलसी के तेल
से मिश्रित कर (प्रयोग करने पर) वह प्रतिवात वकित अंगो को
ठीक कर देती है। जिस पर अविका तुष्ट हो जाती है, उसकी
दुर्गति व सभी व्याधियाँ दूर हो जाती हैं। वहाँ पर प्रधान मन-
शिल वर्णवाली वेगवती नामक नदी है, उसकी मिट्टी को धमन
करने पर श्रेष्ठ रजत बन जाती है।
उज्जयन्त पर ज्ञानगिला है, जिसके नीचे सोने के समान वर्ण
वाली मिट्टी है, जिसका बकरे के मूत्र मे पिण्ड बनाकर खैर के
अगारो मे धमन करने पर सोना बनता है। ज्ञानशिला के नीचे
की मिट्टी पचगव्य से पिण्डी बनाकर हडे के नीचे रस हैं, उससे
सहस्र वेध करने पर सोना बनता है। गिरिराज के निकट 'तिल-
विसारण नामक औषधि है उसको लाकर गिला पर गाढी बाँधे,
उसमे दो लाख द्रम्म प्राप्त होते हैं। सुवर्ण तीर्थ पर लड्‌डुअ प्रधान
सेना नाम की नदी है, उसके पिण्ड से भी सोना बनता है, इसमें
कोई सन्देह नही।
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