विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाम के दो भ्राता संघपति होकर गिरनार आये । उन्होने शीघ्रता-
वश बहुत से पचामृत भरे कलशो द्वारा न्हवण-स्नात्र कराया
जिससे श्री नेमिनाथ भगवान की लेप्यमय प्रतिमा गल गई । उन्होने
अपने पर (गल्ती) अत्यन्त खेद करते हुए आहार का प्रत्याख्यान
कर दिया । इक्कीस उपवास के अनन्तर स्वयं भगवती अम्बिका
देवी आई, संघपति को उठाया । उसने देवी को देखकर जय जय
कार शब्द किया । देवी ने कहा—यह विम्ब ग्रहण करो, पर पीछे
मत देखना । अजित संघपति एक तार से खीचते हुए श्री नेमिनाथ
भगवान का रत्नमय विम्ब कचनवालानक से लाये । प्रथम भवन
की देहली मे आरोपण कर संघपति ने अत्यन्त हर्षपूर्वक पृष्ठ
भाग मे देखा । प्रतिमा वही पर निश्चल हो गई । देवी ने कुसुम-
वृष्टिपूर्वक जय जयकार किया । यह प्रतिमा वैशाखी पूर्णिमा के
दिन संघपति ने नव्यकारित प्रासाद मे पश्चिमाभिमुख स्थापित
किया । स्नात्र-महोत्सव करके अजित संघपति अपने भाई के साथ
स्वदेश लौट गया । कलिकाल मे देवी ने लोगो का कलुषित चित्त
ज्ञात कर रत्नमय प्रतिमा की झलकती हुई कान्ति को आच्छादित
कर दिया ।
पहले गुजरात मे जयसिंह देव ने राजा खेंगार को मार कर
सज्जन को दण्डाधिप स्थापित किया । उसने विक्रम संवत् ११८४
मे श्री नेमिनाथ भगवान का अभिनव जिनालय बनवाया । मालव-
देशमण्डन सेठ भावड साह ने स्वर्णमय आमलसार-कलश कराया ।
चालुक्यचक्री श्री कुमारपालदेव नरेन्द्र संस्थापित श्री श्रीमाल
कुलोद्भव सौराष्ट्र दडनायक ने विक्रम संवत् १२२० मे पाज
(पद्या-सीढियाँ) करवायी । उसी भावना से धवल ने अंतराल मे
पर्व-प्रपा भराये । पाज चढते हुए लोगो को दक्षिण दिशामे लक्षा-
राम दिखाई देता है ।
अणहिल वाड पाटण मे पोरवाडकुलमण्डन आसराज-कुमार