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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

१२ विविध तीर्थ-कल्प
दिशा मे पचास कदम जाने पर तीन वारी आती हैं । पहली वारी
तीन सौ कदम जाने पर गोदोहनासन से प्रविष्ट हो पाँच उपवास
पूर्वक भ्रमर रूप दारुण सत्त्व से उठाकर सात कदम अधोमुख
प्रवेग करके वालानक मण्डप मे इन्द्र के आदेश से धनद कारित
अम्बा देवी की पूजा करके स्वर्ण जाली मे स्थापन करना । वहाँ
स्थित होकर मूलनाथ श्री नेमिनाथ जिनेन्द्र को वन्दन करना
चाहिए । दूसरी वारी मे एक पाद पूजा करके स्वयंवर वापी से
नीचे चालीस कदम जाने पर मध्यवारी आती है । वहाँ से सात सौ
कदम पर एक कुँआ है । वहाँ वर हंस स्थित होकर यहाँ भी
मूलनायक को वन्दन करना । तीसरी वारी का मूल द्वार-प्रवेश
अम्बा देवी के आदेश से होता है, अन्यथा नही । ऐसा क्वचन
बालानक का मार्ग है और वहाँ अम्बा के आगे बीस हाथ पर
विवर है । अम्बा देवी के आदेश से यहाँ तीन उपवास पूर्वक
शिलोद्घाटन द्वारा बीस हाथ जाने पर सात सम्पुट और पाँच
पेटियो के नीचे रसकूपिका है, जो प्रत्येक अमावस्या के दिन
खुलती है । यहाँ भी तीन उपवास करके अम्बा देवी के आदेश से
बलिविधान-पूजन करके (रस) ग्रहण करना चाहिए ।
इसी प्रकार जीर्णकूट पर तीन उपवास करके बलिपूजन
द्वारा सरल मार्ग से सिद्ध विनायक उपलब्ध होता है । और वहाँ
चिन्तित कार्य की सिद्धि होती है । यदि वैसे प्रत्यक्ष हो जाय
तो एक दिन ठहरना चाहिए । वैसे हो राजिमती गुफा से एक सौ
कदम पर गो-दोहिका ( आसन ) द्वारा रसकूपिका और कृष्ण
चित्रकवल्ली हैं एव राजिमती की प्रतिमा रत्नमय है और अम्बिका
की भी वहाँ है, अनेक रूप्यमय औषधियाँ भी वहाँ रही हुई है ।-
वहाँ छत्रशिला, घटशिला और कोटिशिला—तीन शिलाएँ
बतलाई हैं । छत्रशिलाके बीचो-बीच कनकवल्ली है । सहस्राम्रवन