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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 442 में से

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८ विविध तीर्थ-कल्प

दिन उपवास करके पर्वत गुफा में रहे और कपर्दि यक्ष का आराधन
कर तीन विम्बो को पर्वतगुफा मे छिपाकर रखा। सुनते हैं कि आज
भी शक्रेन्द्र वहाँ आते हैं और पूजा करते हैं।
पाण्डवो द्वारा स्थापित श्री ऋषभदेव के उत्तर दिशा की ओर
वह गुफा आज भी चेलना तलाई तक विद्यमान है। यक्ष के
आदेग से प्रतिमाओ के दर्गन होते हैं।
यहाँ भगवान अजितनाथ और शान्तिनाथ वर्षावास रहे थे।
वहाँ उनके दो पूर्वाभिमुख चैत्य थे, अजितनाथ चैत्य के निकट
अनुपमा सर हुआ। मरुदेवी के पास आँखो को गीतल करनेवाला
गान्तिनाथ चैत्य भव्य प्राणियो की भव-भ्रान्ति को दूर करता है।
श्री गान्तिनाथ जिनालय के आगे तीस हाथ पर सात पुरुष
नीचे सोने और रूपे की दो खाने हैं। वहाँ से सौ हाथ आगे पूर्व
द्वार वाली सिद्ध रस से भरी हुई आठ हाथ नीचे रसकूपिका है।
श्री पादलिप्ताचार्य ने तीर्थोद्धार के लिए उसके समीप स्वर्ण और
रत्न स्थापित किए थे। पूर्व दिगा मे ऋषभदेव के नीचे ऋषभकूट
से ३० धनुष जाकर अष्टम तप पूर्वक बलिविधान आदि करने पर
वरुट्टया देवी बहु धन दिखलाती है। उनकी आज्ञा से गिला
उघाड कर रात्रि मे वहाँ प्रवेग-किया जाता है। वहाँ उपवास
करने से सर्वसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ऋषभदेव भगवान् का पूजन
वदन करने से (भव्य प्राणी) एकावतारी होता है। पाँच सौ
धनुष आगे पाषाणकुण्डिका है, वहाँ सात पद जाकर बुद्धिमान को
बलिविधि करनी चाहिए। किसी-किसी पुण्यगाली को वहाँ
गिलोत्पाटन कर दो उपवास करनेपर रसकूपिका प्रत्यक्ष होती है।
कल्कि का पुत्र परमार्हत् धर्मदत्त होगा, वह प्रतिदिन जिन-
विम्ब की प्रतिष्ठा कराके भोजन करेगा। उसका पुत्र जितगत्रु
राजा गत्रुञ्जय का उद्धार करेगा और वह बत्तीस वर्ष राज्य-
लग्मी का भोग करेगा। उसका पुत्र मेघघोष यहाँ कपर्दि यक्ष के