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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

प्रथमोऽंशः २२१

  • प्रकाश *
    इति श्रीनृसिंहानन्दनाथचरणाराधकेन भास्कररायापरनाम्ना भासुरानन्दनाथेनोन्मीते
    वरिवस्यारहस्ये तत्प्रकाशे च प्रथमोऽंशः
  • सरोजिनी *
    गुरोः करुणावशतः—गुरु की अनुकम्पा के कारण ॥ ग्रन्थकार प्रस्तुत
    ग्रन्थ-रचना का के कर्तृत्व एवं प्रणयन-गौरव का श्रेय स्वयं नहीं लेना चाहता प्रत्युत्
    इसे अपने गुरु को समर्पित करना चाहता है । इसका कारण क्या है? प्रथम
    कारण तो यह है कि ऐसा करके शिष्य गुरु द्वारा प्रयन्त ज्ञान के ऋण से मुक्त हो
    जाता है दूसरे अपने कर्तृत्व में गुरु के शक्ति-सञ्चार को अनुभव करने से
    ग्रन्थकार की अहङ्कार विमुक्त चेतना और अधिक निर्मल, व्यापक, सूक्ष्म, एवं
    शक्तिशाली होती जाती है । इसके अतिरिक्त 'गुरु' शब्द मङ्गलवाची भी है
    क्योंकि—'गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेफः पापस्य दाहकः । उकारः शम्भुरित्युक्त
    स्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ॥'१
    एक बात यह है कि प्रत्येक साधक ग्रन्थकार इष्टदेवता को प्रसन्न करना
    चाहता है । इस दृष्टि से देखें तो भी गुरु के प्रति निष्ठा आवश्यक है क्योंकि—
    गुरुप्रीति समुत्पन्ने देवता प्रीतिमाप्नुयात् ।
    देवताप्रीतिमापन्ने मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥२
    “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
    अतएव महेशानि साक्षाद् ब्रह्ममयो गुरुः ॥'३
    ॥ इस प्रकार वरिवस्यारहस्य के प्रथमोऽंश की डॉ० श्यामाकान्त द्विवेदी कृत
    'सरोजिनी' नामक हिन्दी टीका पूर्ण हुई ॥
    ―― * ――
    १. यामल २-३. कुलार्णव—शाक्तानन्द तरंगिणी

द्वितीयोंऽशः
जपलक्षणशरीरघटकत्वेन
'यदधीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते ।
अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥'
इत्यर्थज्ञानरहितशब्दोच्चारणस्य निन्दया पापानुमानाच्चार्थज्ञानमावश्यक-
मित्याह—
नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥ ५४ ॥
अर्थमजानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ ५५ ॥
(अर्थ-ज्ञान-शून्य अनुष्ठित जप की व्यर्थता)
अर्थ का सम्यक् ज्ञान हुए बिना शब्दोच्चारण कोई फल नहीं देता । (यथा)
अग्निशून्य भस्म में समर्पित हविष्य नहीं जल पाता ॥ ५४ ॥
अर्थ को न जानते हुए भी विविध प्रकार के शब्दमात्र का पाठ करने वालों
की उपमा चनदन के भार को ढोने वाले (किन्तु चन्दन के गुणों को न जानने
वाले) गर्दन से ही दी जा सकती है ॥ ५५ ॥
* प्रकाश *
चक्रीवान् गर्दभः । यद्यपि 'यथा खरश्चन्दनभारवाही' इति श्रुतौ खरस्यैवोप-
मानता, तथापि सादृश्यनिरूपकगुणाधिक्यवत एवोपमानत्वात् तदाधिक्यव्यञ्जनाय
प्रतीपालङ्कार इवोपमानोपमेययोर्व्यत्यासः ॥ ५४-५५ ॥
* सरोजिनी *
'नार्थ............फलति'—अर्थज्ञान के अभाव में किसी भी मन्त्र का जप
फलीभूत नहीं होता । चूँकि प्रत्येक मन्त्र-जापी अपने देवता के साक्षात्कार को ही

द्वितीयोंऽशः २२३
अपना प्रधान लक्ष्य मानता है किन्तु मन्त्र अर्थ ही तो देवता होता है अतः मन्त्र
का अर्थ जाने बिना देवता का साक्षात्कार कैसे हो सकता है ? 'शाक्तानन्दतरंगिणी'
में कहा गया है—'मन्त्रार्थं देवतां रूपं चिन्तनं परमेश्वरि । वाच्यवाचक भावेन अभेदो
मन्त्रदेवयोः ॥'१ 'देवता' वाच्य है 'मन्त्र' वाचक है—'वाच्या हि देवता देवमन्त्रोहि
वाचकः स्मृतः ॥'२ वाचक के ज्ञात होने पर स्वतः वाच्य भी प्रसन्न होता है—
“वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव प्रसीदति ॥”
जिस-जिस मन्त्र का जो-जो देवता हो उसके आकार का चिन्तन करके ही—
अर्थात् मन्त्र का देवता रूप अर्थ समझकर एवं उसका ध्यान करके जप करना
चाहिए—
“यस्य यस्य च मन्त्रस्य उद्दिष्टा या च देवता ।
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जप माचरेत ॥”३
'कुलार्णवतन्त्र' में तो यहाँ तक कहा गया है कि जिस भी मन्त्र का जप
करना हो साधक को 'तन्निष्ठ' 'तद्गतप्राण' 'तच्चित्त' 'तत्परायण' होकर उस पदार्थ
का अर्थानुसंधान करते हुए मन्त्र का जप करना चाहिए४—
तन्निष्ठस्तद्गत प्राणस्तच्चित्तस्तत् परायणः ।
तत्पदार्थानुसंधानं कुर्वन्मन्त्रं जपेत् प्रिये ॥
आदि में मन्त्र के अर्थस्वरूप देवता का ध्यान करना चाहिए । इसके बाद
अंत में भी मन्त्र के अर्थस्वरूप देवता का ध्यान करना चाहिए एवं इस प्रकार
ध्यानपूर्वक मन्त्र जप करना चाहिए ।
आदौ ध्यानं ततोमन्त्रं ध्यानस्यान्ते मनुं जपेत् ।
ध्यान मन्त्रसमायुक्तः शीर्घ सिध्यति साधकः ॥५
“यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य” । खर की
उपमानता । सादृश्य निरूपकगुणाधिक्यवत् उपमान से तदाधिक्य के भाव की
अभिव्यञ्जना हेतु ‘प्रतीपालङ्कार’ का प्रयोग किया गया है जिसमें ‘इव’ शब्द द्वारा
उपमानोपमेयों के व्यत्यास को व्यक्त किया गया है ।
पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थाः परिज्ञेयाः ।
अर्थनादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥ ५६ ॥
(मन्त्रार्थों का परिज्ञान आवश्यक क्यों?)
पुरुषार्थों (धर्मार्थ काम मोक्ष) की आकांक्षा रखने वाले लोगों को (मन्त्रों के)
अर्थों का परिज्ञान होना चाहिए । (मन्त्रों के अर्थों के प्रति) तिरस्कार का
भाव रखने वालों के लिए अर्थ (अभीष्ट) की प्राप्ति नहीं प्रत्युत् अनर्थ की प्राप्ति
होती है ॥ ५६ ॥
१-५. शाक्तानन्द तरंगिणी

२२४ वरिवस्यारहस्ये

  • प्रकाश *
    एतेनार्थज्ञानस्य नित्यत्वमुक्तं भवति ॥ ५६ ॥
  • सरोजिनी *
    भास्करराय कहते हैं कि जो व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की आकांक्षा
    रखते हैं उन्हें अपने आकांक्षा की इस पूर्ति के लिए मन्त्रों के अर्थों को जानना
    अत्यावश्यक है । जो लोग मन्त्रार्थ के प्रति उपेक्षा दृष्टि रखते हैं उन्हें
    स्वाभीष्ट-प्राप्ति की बात तो दूर अनर्थों का सामना करना पड़ता है । आचार्य
    भास्कर श्लोकान्तर से इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं कि चन्दन की लकड़ियों का
    बोझ लादे हुए गधा जिस प्रकार चन्दन के बोझ मात्र को जानता है चन्दन के गुणों
    को नहीं अतः उसे चन्दन को बोझ की दृष्टि से देखने के कारण चन्दन से कष्ट
    ही प्राप्त होता है और चन्दन का अर्थ—'बोझ' (दुःख, पीड़ाकारक वस्तु) ही
    समझ में आता है उसे चन्दन के शीतलत्व, सुगंधि, मनमोहकता एवं मनः प्रसादत्व
    का गुण प्राप्त नहीं । होता ठीक उसी प्रकार मन्त्रार्थ ज्ञान-शून्य शब्दसङ्गठित मन्त्र
    के जाप से अनर्थ-ही प्राप्त होता है कोई लाभ प्राप्त नहीं होता—
    “नार्थ ज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
    भस्मनि वह्नि विहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥ ५४ ॥
    अर्थमजानानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
    उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ ५५ ॥”१
    यह मन्त्रार्थविहीन मन्त्रों का उच्चारण भास्करराय की दृष्टि में उ
    ‘शब्दस्योच्चारण’ मात्र है । यह ऐसा प्रयास है यथा—वह्निविहीन भस्म में हवि
    डालना—‘भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥’ इसके अतिरिक्त उसकी
    दशा गधे की भाँति है—‘‘यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ॥’’
    निष्कर्ष—‘यद धीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते ।
    अनग्नाविव शुष्कौधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥’
    जो व्यक्ति मन्त्रार्थ—विरमित मन्त्र का जप करता है वह दरिद्रता, विपत्ति एवं
    नरक तीनों को आमंत्रित करता है—
    श्रोत्रादीनां ज्ञानाभावे मन्त्रजापं करोति यः ।
    दारिद्र्यं च विपत्ति च नरकं प्राप्नुयातु सः ॥२
    ‘यामल’ में कहा गया है कि ‘‘मन्त्र का अर्थ देवता है’’ और ‘‘मन्त्र एवं
    देवता में वाच्यवाचकभावेन अभेद है’’—‘‘मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि ।
    वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ॥’’३ ‘मन्त्र’ वाचक है और ‘देवता’ वाच्य है

१. वरिवस्यारहस्यम् २-३. शाक्तानन्द तरंगिणी

द्वितीयोऽंशः २२५
‘वाच्या हि देवता देवमन्त्रो हि वाचकः स्मृतः । वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव
प्रसीदति ।।’’ इसीलिए भगवान शिव पार्वती को सावधान करते हुए कहते हैं—
“मन्त्रार्थं परमेशानि सावधानावधारय”१ ‘योगशास्त्र’ में अर्थभावन के साथ ही जप
का विधान किया गया है—‘तज्जपस्तदर्थभावनम्’२
ते चार्थस्तन्त्रोपनिषद्ग्रन्थभेदेन नानाविधाः शिवेनोक्ताः । तांश्च संजिघृक्षुरु-
द्दिशति—
अथातः पूर्णगायत्र्याः प्रतिपाद्योऽर्थ आदिमः ।
भावार्थः संप्रदायार्थो निगर्भार्थस्तुरीयकः ॥ ५७ ॥
कौलिकार्थो रहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च ।
नामार्थः शब्दरूपार्थश्चार्थो नामैकदेशगः ॥ ५८ ॥
शाक्तार्थः सामरस्यार्थः समस्तसगुणार्थकौ ।
महावाक्यार्थ इत्यर्थाः पञ्चदश्याः स्वसंमिताः ॥ ५९ ॥
(अर्थों के विभिन्न भेद)
इसलिए इसके अनन्तर सर्वप्रथम पूर्ण गायत्री (चरणचतुष्टयसम्पन्ना गायत्री
मन्त्र) के प्रतिपाद्य अर्थ फिर भावार्थ, संप्रदायार्थ, चौथा निगर्भार्थ, कौलिकार्थ,
रहस्यार्थ, महातत्त्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ, सामरस्यार्थ,
समस्तार्थ, सगुणार्थ एवं महावाक्यार्थ—अर्थात् उतने अर्थ जितने कि पञ्चदशी मन्त्र
के अपने वर्ण हैं—की मीमांसा की जाएगी ॥ ५७-५९ ॥

  • प्रकाश *
    अथानन्तरम्, अत उक्तरीत्या अर्थज्ञानस्यावश्यकत्वात्, अर्थाः कथ्यन्त इति
    शेषः । पूर्णगायत्र्याश्चतुर्थचरणसहितायाः । स्व आत्मीया वर्णाः तैः संमिताः, तत्संख्या-
    समानसंख्याकाः । पञ्चदशेति यावत् । अथ वा, संप्रदायार्थप्रकरणे कादिविद्यायां
    सप्तत्रिंशद्वर्णाः स्फुटीकरिष्यन्ते, तत्संमिता अर्था इत्यर्थः ॥ ५७-५९ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘भावार्थ’—मन्त्र के अवयवभूत अक्षर का अर्थ ही ‘भावार्थ’ है । ‘संप्रदायार्थ’
    = (परमेश्वर ही मन्त्रों के मूल हैं) अतः गुरुमुख से स्वीय मन्त्र का उद्भव एवं
    उसका अवतरण-क्रम या परम्परा का ज्ञान मन्त्र का ‘संप्रदायार्थ’ है । ‘निगर्भार्थ’—
    परमेश्वर, गुरु एवं निजात्मा का ऐक्यानुसन्धान ही निगर्भार्थ है । ‘कौलिकार्थ’ =
    (निष्कल परमेश्वर का जिन्होंने स्वात्मरूप में साक्षात्कार किया है वही गुरु है । अतः
    गुरु एवं परमेश्वर अभिन्न हैं 1) चक्र, देवता, विद्या, गुरु एवं साधक का
    १. शाक्तानन्द तरंगिणी २. योगसूत्र
    १५ वरि.

२२६ वरिवस्यारहस्ये
ऐक्यानुसन्धान ही मन्त्र का 'कौलिकार्थ' है। 'रहस्यार्थ'—मूलाधारस्थ कुण्डलिनीरूपा
विद्या ही साधक की स्वात्मा है—इस रूप की भावना का नाम ही 'रहस्यार्थ' है।
'महातत्त्वार्थ' = निष्कल अणु से अणुतर, तथा महान् से महत्तर, निर्लक्ष्य,
भावातीतः, व्योमातीत परमतत्त्व के साथ प्रकाशानन्द रूप में विश्वातीतः एवं विश्वमय
निज गुरु के द्वारा प्रबोधित निर्मलस्वभाव स्वकीय आत्मा का ऐक्यानुप्रवेश
'महातत्त्वार्थ' है। इन समस्त अर्थों के परिज्ञान से पाशात्मक विकल्प जाल सम्यक्
प्रकार से निवृत्त हो जाते हैं ।१
१. 'भावार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—अम्बा (देवी) मन्त्र एवं
जगत् में अभेद का प्रतिपादन 'भावार्थ' है—'तेनाम्बामनुजगतामभेद एवात्र
भावार्थः ॥'२
२. 'सम्प्रदायार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—कार्य एवं कारण, वाच्य
एवं वाचक, ब्रह्म एवं जगत् में अभेद होने के समान ही जगत् एवं विद्या
में भेदाभाव का प्रतिपादन ही 'संप्रदायार्थ' है।
'योगिनीहृदय' में षड्विध अर्थ—'योगिनीहृदय' में निम्न छः प्रकार के मन्त्रार्थों
का विवेचन किया गया है जो निम्न है—"षड्विधस्तं तु देवेशि ! कथयामि
तवानघे। भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भार्थश्च कौलिकः रहस्यार्थो गहातत्वार्थ एव च ।
अथराथों हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।।" (१५, १६) १. भावार्थ २. सम्प्रदायार्थ
३. निगर्भार्थ ४. कौलिकार्थ ५. सर्वरहस्यार्थ ६. महातत्त्वार्थ ।। (मन्त्र सङ्केत) ।।
'नामार्थ' 'शब्दरूपार्थ' 'नामैकदेशार्थ' 'शाक्तार्थ' 'सामरस्यार्थ' 'समस्तार्थ'
'सगुणार्थ' एवं 'महावाक्यार्थ'—ये आठ अर्थ भास्करराय के स्वकल्पित नये अर्थ हैं
जो कि 'योगिनीहृदय' में उल्लिखित नहीं है ।
जगत् एवं विद्या में अभेद है—यही 'संप्रदायार्थ' है३—
“जन्यजनकयोर्भेदाभावाद वाच्यस्य वाचकेनापि ।
ब्रह्मणो जगतो जगति च विद्याभेदस्तु संप्रदायार्थः ।। ८१ ।।”
३. 'निगर्भार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—'निगर्भार्थ' का स्वरूप इस
प्रकार है—"सर्वातिशायी सत्त्व परमशिव में एकात्मकता या अन्य पदार्थों
का अभाव (निष्कलत्ता), अपने दीक्षा गुरु एवं उस परमशिव में अभेद
तथा उस (गुरु) की कृपावश अपने एवं उस परमशिव में अभेद-दर्शन ही
निगर्भार्थ है"—
१. भारतीय संस्कृति और साधना (प्र०ख०) (पृ० ३३९-३४०)
२. 'अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।'
कूटत्रयात्मिका देवी समष्टि व्यष्टि रूपिणीम् ।
आद्यां शक्ति भावयन्तो भावार्थमिति मन्वते ।। २५ ।। (योगिनीहृदय)
३. तथा मन्त्राः समस्ताश्च विद्यायामन्त्र संस्थिताः ।। ४७ ।। (योगिनीहृदय)
गुरुक्रमेण संप्राप्तः संप्रदायार्थ ईरितः ।।

द्वितीयोऽंशः २२७
“परमशिवे निष्कलता तदभिन्नत्वं स्वदेशिकेन्द्रस्य ।
तत्करुणातः स्वस्मिन्नपि तदभेदो निगर्भार्थः ॥”
४. ‘कौलिकार्थ’—वरिवस्यारहस्यम् के अनुसार—माता, विद्या, चक्र स्वगुरु
एवं स्वयं में—(इस प्रकार पाँचों में) अभेदभावना ही मन्त्र का पञ्चनामपि
भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ १०२ ॥१
५. ‘रहस्यार्थ’—कुण्डलिनी साक्षात् विद्या एवं माता से अभिन्न है । इससे
अपने को अभिन्न देखना ही श्रीविद्या का रहस्यार्थ है—
“साक्षाद्विद्यैवैषा न ततोभिन्ना जगन्माता ।
अस्याः स्वाभिन्नत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थः ॥ १०७ ॥”
६. ‘महातत्त्वार्थ’—वाणी, मन एवं इन्द्रियों द्वारा अगम्य (३६ तत्त्वों से
अतीत) महान से महत्तर, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, व्योम से भी ऊपर स्थित,
विश्व से अभिन्न, चित् एवं आनन्दस्वरूप परब्रह्म में अपने आपको उस
(ब्रह्म के साथ) अभेद की प्राप्ति के लिए नियुक्त करना चाहिए, यह
श्रीविद्या का ‘महातत्त्वार्थ’ है—
“ब्रह्मणि परे नियोज्यः स्वात्मा तद्भेदसंप्राप्त्यै ।
एष भहातत्त्वार्थः श्रीविद्यायाः शिवेनोक्तः ॥ १०९ ॥”
७. ‘नामार्थ’—एवं ‘शब्दरूपार्थ’—यह विद्या स्वयं अपने घटक अक्षरों द्वारा
व्यक्त अर्थों से अभिन्न है । उसका स्वरूप उसका प्रत्येक अक्षर है ।
श्रीविद्या के ‘नामार्थ’ एवं ‘शब्दरूपार्थ’ का यही स्वरूप है—
“तत्तद्वर्णार्थेयं तत्तद्वर्णस्वरूपेयम् ।
इति तु श्रीविद्याया नामार्थः शब्दरूपार्थः ॥”
८. नामैकदेशार्थ—कल्याणी एकाक्षरी, ईशित्री, ललिता आदि देवी के तीन
सौ नामों का तात्पर्य मन्त्र के आदि अक्षरों द्वारा व्यक्त होता है नाम के

१. कौलिकं कथयिष्यामि चक्रदेवतयोरपि ॥ ५१ ॥ (योगिनीहृदय)
विद्यागुर्वात्मनामैक्यं तत्प्रकारः प्रदर्श्यते ॥
‘चक्र-देवता-गुरु-विद्या-साधकानामैक्यानुसन्धानं कौलिकार्थः ॥ (दीपिका) ॥
शिव-गुर्वात्मैक्यगोचरानुसंधानात्मको निगर्भार्थः ॥ (दीपिका) ‘श्रीचक्रं श्रीमाता श्रीविद्या
श्रीगुरुरात्मा चेति पंचानामैक्यं कौलिकार्थ इत्युच्यते । (सेतुबन्ध : भास्करराय)
२. महातत्त्वार्थ इति यत्तच्च देवि ! वदामि ते ।
निष्कले परमे सूक्ष्मे निर्लक्ष्ये भाववर्जिते ॥ ७३ ॥ (योगिनीहृदय)
व्योमातीते परे तत्त्वे प्रकाशानन्द विग्रहे ।
विश्वोत्तीर्णे विश्वमये तत्त्वे स्वात्मनियोजनम् ॥ ७४ ॥ (योगिनीहृदय)
परमशिवरूपे निजगुरु प्रबोधित निर्मलस्वभाव स्वात्मनि ।
योजनं तदेकतानुप्रवेशो महातत्त्वार्थः । (अमृतानन्दनाथः—दीपिका)

२२८ वरिवस्यारहस्ये
एक देश (अंश) के ग्रहण द्वारा समस्त नाम ग्रहण का बोध' लोक
प्रसिद्ध है । अतः समस्त नाम का अर्थ नाम के एक अंश का अर्थ
हुआ ॥ १११-११२ ॥ “नामैकदेशमात्रे नामग्रहणस्य लोकसिद्धत्वात् ।
नामोपस्थितिगम्यः प्रोक्तो नामैकदेशार्थः ॥”
९. 'शाक्तार्थ'—शाक्तों की मान्यतानुसार प्रत्येक अक्षर में शक्ति है तथा
अक्षरों एवं वामा, इच्छा तथा अन्य शक्तियों में अभेद है—यही 'शाक्तार्थ'
है ।१
१०. सामरस्यार्थ—'क' एवं 'ह' तथा 'ल' एवं 'स' का अर्थ है—'शक्ति' ॥
हल्लेखा (ह्रीं) का अर्थ शिव एवं शक्ति का सामरस्य रूप परब्रह्म
है ॥ ११९ ॥ उक्त तीनों कूटों में से प्रत्येक का अर्थ है । “शिव एवं
शक्ति के सामरस्य के कारण ब्रह्म ही शिव एवं शक्ति दोनों ही है ।”
यह विद्या का 'सामरस्यार्थ' है ॥ १२० ॥२
११. 'समस्तार्थ'—श्रीविद्या के 'समस्तार्थ' के अन्तर्गत अनेक पदों एवं गुणों
का समास समस्त पुरुषार्थों के साधन का संक्षिप्त एवं सार कथन आता
है ।३
१२. 'सगुणार्थ'—समस्त गुण गण के कथन द्वारा विद्या का सगुणार्थ व्यक्त
होता है—'इत्थं गुण गण कथनाद्विद्याया एष सगुणार्थः ॥'४
१३. 'महावाक्यार्थ'—'ह' 'स' आनन्द, 'क' सत्य, 'ह' अनन्त एवं 'ल'
ज्ञान है । इस प्रकार तटस्थ एवं स्वरूप लक्षणों द्वारा ब्रह्म का निर्णय
करके (यह विद्या) तुरीय कूट के द्वारा ब्रह्म एवं जीव का तादात्म्य
(अभिन्नता अभेदात्मकता) स्थिर करती है । 'स' 'क' 'ल' पद जीव का
वाचक है जिसकी जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति नामक तीन कलायें हैं ।
शक्ति बीज 'ह्रीं' ब्रह्म का वाचक है । उक्त दोनों में सामानाधिकरण्य होने
के कारण उनके द्वारा लक्षित शुद्ध वस्तुएँ अभिन्न हैं । तृतीय कूट होने
के कारण उनके द्वारा लक्षित शुद्ध वस्तुएँ अभिन्न हैं । तृतीय कूट के
'स' 'क' 'ल' पदों का अभिप्राय है—यह सब ब्रह्म है ।' इस प्रकार जीव
एवं ब्रह्म के स्वरूप का लाक्षणिक वाक्यों द्वारा वर्णन करके उनका अभेद
स्थिर किया गया । यही 'महावाक्यार्थ' है ।
“अथातः”—'अथ' = इसके अनन्तर (अर्थात् उक्त रीति से अर्थ ज्ञान के
अवश्यिकत्व के द्वारा अर्थों पर प्रकाश डाला जा रहा है ।) पूर्ण गायत्री = चतुर्थ
चरण सहित गायत्री । 'स्व' = आत्मीय आत्मीय वर्ण । 'संमिताः' = उन-उन वर्णों
से संमित । अर्थात् तत्संख्या समान संख्यक (१५) ॥ या संप्रदायार्थ के प्रकरण में
समागत-'कादिविद्या' में सप्तत्रिंश (३७) वर्णों से स्फुरीकृत किया जायेगा और उस
दिशा में अर्थ होगा—'तत्संमित' ॥
१-४. वरिवस्यारहस्यम्

द्वितीयोंऽशः २२९
त्रिपुरोपनिषदि प्रतिपादितं गायत्र्यर्थमाह—
कामयते स ककारः कामो ब्रह्मैव तत्पदस्यार्थः ।
सवितुर्वरेण्यमिति वै सवितुः श्रेष्ठं द्वितीयवर्णार्थः ॥ ६० ॥
(गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र के मन्त्राक्षरो के अर्थ में साम्य का प्रतिपादन)
जो कामना करता है वह कामेश्वर ही 'ककार' है । 'तत्' पद का अर्थ है—
ब्रह्म । द्वितीयाक्षर ('पञ्चदशी मन्त्र' का द्वितीयाक्षर) 'ए' 'सवितुर्वरेण्यम्' का अर्थ
देता है जो कि जन्मदात्री कामेश्वरी का वाचक है ॥ ६० ॥

  • प्रकाश *
    'ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः' इति स्मृतेः, 'तदिति ब्रह्म
    शाश्वतम्' इति श्रुतेश्च तत्पदार्थो ब्रह्म । तदेव च ककारार्थः, 'कं ब्रह्म' इति श्रुतेः ।
    कामयत इत्यर्थो वा । कमेरीणादिको डः । 'कामयते कामी जायते स एव निरञ्जनो
    ऽकामतवेनोज्जृम्भते... कामोऽभिधीयते, तत्परिभाषया कामः ककारं व्याप्नोति' इति
    श्रुतेः । कामेश्वर इति तु पर्यवसितम् । सवितुरिति तृप्रत्ययान्तम् 'पुरा वत्सानामपाकर्ता:'
    इत्यादि-कल्पसूत्रीयप्रयोगवत् । प्राणिप्रसवकारणम् । योनिरिति यावत् । तच्च नान्य-
    साधारणमित्यतो वरेण्यमिति श्रेष्ठं भजनीयमित्यर्थः । तेन पदद्वयेनापि जगद्योनित्वं
    लब्धम् । तेन च कामेश्वरीत्यर्थः । स एव चार्थ एकारस्य, तस्य त्रिकोणत्वात् । तथा च
    श्रुतिः—'सवितुर्वरेण्यमिति षूञ् प्राणिप्रसवे, सविता प्राणिनः सूते' इत्युपक्रम्य
    'त्रिकोणा शक्तिरेकारेण महाभगेन प्रसूते तस्मादेकार एव गृह्यते' इत्यादि ।
    'यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयात्मकम् ।
    ब्रह्माण्डादि कटाहान्तं जगदद्यापि दृश्यते ॥'
    इति वामकेश्वरतन्त्रे स्पष्टं दृश्यते' । सर्वेति । सर्वान्तर्यामित्वं देवपदस्यार्थः, 'देवो
    मध्यवर्ती' इति श्रुतेः । सोर्डस् । धत्त इति धीः । दधत् । जगदाधार इत्यर्थः, 'धरो
    धीत्येवं धार्यते' इति श्रुतेः । भर्ग इति स्पष्टार्थः । सर्वान्तर्यामी सर्वाधारः शिव इति
    पर्यवसितम् । ईकारस्याप्येतावानर्थः । 'भर्गो देवस्य' इत्याद्युपक्रम्य तुरीयमक्षरं
    सर्वान्तर्भूतम् । तुरीयाक्षरं पदानां मध्यवर्तित्वेन व्याख्यातम् 'तस्माद्भर्गो देवस्य
    धीत्येवमीकारः' इति श्रुतेः । तुर्यार्थः, मन्त्र तु तृतीयस्यापि मातृकाक्रमे तुरीयत्वाद्दी-
    कारस्यार्थ इत्यर्थः । मही पृथिवी महत्त्वात् काठिन्याच्च । पञ्चमहाभूतानामुपलक्षणमेतत् ।
    'मृद्धट:' इतिवदेकविभक्तिमत्त्वरूपसामानाधिकरण्यस्य तदात्मना परिणतत्वमर्थः ।
    अयमेव च पृथिवीबीजस्य लकारस्यार्थः, महीत्यस्य व्याख्यानमुपक्रम्य 'ससागरं
    सपर्वतम्' इत्यादिना भूमण्डलं प्रतिपाद्य 'भूमण्डलमेवेक्तं लकारेण' इति श्रुतेः ।
    तृतीयेति गायत्र्यास्तृतीयोऽङ्घ्रिः 'धियो यो नः प्रचोदयात्' इति । अस्मदादीनां धियो
    ध्यानादिरहिते वस्तुनि निष्प्रपञ्चे विषये प्रेरयतीत्यर्थः । परतत्त्वविषयकज्ञानजनक इति
    यावत् । तुरीयाङ्घ्रिः 'परोरजसे सावदोम्' इति । रजसः परं परे रजसे । सोः शे
    इत्यादेशः । रजेऽतीतम् । निर्मलमिति निर्गुणमिति वार्थः, रजःशब्दस्य धूलीवाचक-
    त्ववद् गुणत्रयोपलक्षकत्वसंभवात् । त्रिगुणातीतमिति यावत् । न पुनः पर इत्यत्र

२३० वरिवस्यारहस्ये
भिन्नपदत्वभ्रमः कार्यः, सुब्रह्मण्यानिगदे 'परोरजास्ते पञ्चमः पादः' इति प्रयोगात्।
सावदोमित्यस्य सवदोऽवदश्च यः प्रणवः। वक्तुं शक्यो वक्तुमशक्यश्चेत्यर्थः। शब्दैः
शक्तिमर्यादया न बोध्यः, शक्यतावच्छेदकधर्ममात्रस्य परतत्त्वे विरहात्। लक्षणया तु
बोध्यः, सत्यज्ञानादिपदशक्यविशिष्टतादात्म्यसंबन्धशालित्वात्। 'यतो वाचो निवर्तन्ते'
इति श्रुतेः, 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः, 'लक्ष्यार्था लक्षणागम्या' इत्यादिसमृतेश्च। प्रणवार्थः
परतत्त्वमकारोकारमकारैर्ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मकम्। एतावानप्यर्थो हल्लेखायाः। हकारस्य
हृदयमर्थः। तत्र ई गतेत्यर्थः। 'इट्किट्कटी गतौ' इत्यत्र प्रश्लिष्टोऽयं धातुः। अत
एव 'हृदयागारवासिनी हल्लेखा' इति श्रुतिः। एवं चायमर्थो गायत्र्याः प्रथमकूटस्य च
संपन्नः—सर्वजगत्सिसृक्षारूपकामनावान् कामेश्वरः, जगत्कारणरूपा कामेश्वरी, शिवः
सर्वान्तर्यामी सर्वाधारः पञ्चमहाभूताद्यात्मना परिणतः परवस्तुमात्रविषयकनिर्विकल्पक-
ज्ञानजनको निरञ्जनो निर्गुणो वेदैर्लक्षणया गम्यः शक्त्या त्वगम्यो ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मा
परतत्त्वमिति॥ ६०-६१॥

  • सरोजिनी *
    (क)—वाग्भवकूट एवं गायत्री मन्त्र में समन्वय—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र एवं
    गायत्री मन्त्र—अर्थात् दोनों में एकात्मता, एकार्थता, एकोद्देश्यता एवं अभिन्नता है—
    इसका प्रतिपादन उपनिषदों में भी किया गया है।—त्रिपुराताप न्युपनिषद 'पञ्चदशी'
    के वाग्भवकूट के साथ गायत्री मन्त्र के समन्वय की पुष्टि निम्न रूप से करता है—
    “महामनुसमुद्भवं तदिति ब्रह्म शाश्वतं परो भगवान् निर्लक्षणो निरञ्जनो
    निरूपाधिराधिरहितो देव उन्मीलते पश्यति विकास्ते चैतन्यभावं कामयत इति स एको
    देवः शिवरूपी दृश्यत्वेन विकास्ते यतिषु यज्ञेषु योगिषु कामयते कामं जायते। स
    एष निरञ्जनोऽकामतवेनोज्जृंभते अ क च ट त प य शान् सृजते। तस्मादीश्वरः
    कामोऽभिधीयते। तत्परिभाषया कामः ककारं व्याप्नोति। काम एवेदं तत्तदिति ककारो
    गृह्यते। तस्मात्तत्पदार्थ इति य एवं वेद॥ 'क' = कामेश्वर॥ 'तत्' (गायत्री मन्त्र
    का एक पद) = परमात्मा।
    'ए' = 'पञ्चदशाक्षरी मन्त्र' का 'ए' वर्ण एवं गायत्री मन्त्र
    “ए” = कामेश्वरी॥ (पञ्चदशाक्षरी)
    “सवितुर्वरेण्यं”—(गायत्री मन्त्र)—सवितुर्वरेण्यमितिषूङ्प्राणिप्रसवे सविता
    प्राणिनः सूते प्रसूते शक्तिः सूते ॥ ८ ॥ त्रिपुरा शक्तिराद्येयं त्रिपुरा परमेश्वरी।
    महाकुण्डलिनी देवी जातवेदसमण्डलम् ॥ ९ ॥ योऽधीते सर्वं व्याप्यते। त्रिकोण
    शक्तिरेकारेण महाभागेन प्रसूते। तस्मादेकार एवा गृह्यते ॥ १० ॥
    “वरेण्यं” श्रेष्ठं भजनीयमक्षरं नमस्कार्यम्। तस्माद्वरेण्य मेकाराक्षरं गृह्यत इति
    य एवं वेद ॥ ११ ॥
    “भर्गो देवस्य धीमहि”—इत्येव व्याख्यास्यामः। धकारो धारणा॥ धियैव
    धार्यते भगवान् परमेश्वरः। भर्गो देवो मध्यवर्ति तुरीयमक्षरं साक्षात्तुरीयं सर्व

द्वितीयोंऽशः २३१
सर्वन्तरभूतं तुरीयाक्षरमीकारं पदानां मध्यवर्तीत्येवं व्याख्यातं भर्गोरूपं व्याचक्षते ।
तस्माद् भर्गो देवस्य धीत्येवमीकाराक्षरं गृह्यते ॥ १२ ॥
महीत्यस्य व्याख्यानं महत्वं जडत्वं काठिन्यं विद्यते यस्मिन्नक्षरे तन्महि । लकारः
परंधाम । कठिन्याढ्यं ससागरं सपर्वतं सप्तद्वीपं सकाननममुज्जवलद्रूपं मण्डल मेवोक्तं
लकारेण । पृथ्वी देवी महीत्यनेन व्याचक्षते ॥ १३ ॥
‘धियो यो नः प्रचोदयात्’—परमात्मा सदाशिव आदिभूतः परः स्थाणुभूतेन
लकारेणे ज्योतिलिङ्गात्मानं धियो बुद्धयः परे वस्तुनि ध्यानेच्छारहिते निर्विकल्पके
प्रचोदयात् पैरदित्युच्चारं रहितं चेतसैव चिन्तयित्वा भावयेदिति ॥ १४ ॥
परो रजसेऽसावदोमिति तदवसाने पर ज्योतिरमलं हृदि दैवतं चैतन्यं चिल्लिङ्गं
हृदयागारवासिनी हृल्लेखेत्यादिना स्पष्टं वाग्भवकूटं पञ्चाक्षरं पञ्चभूतजनकं पञ्चकलामयं
व्यापठ्यत इति । य एवं वेद ॥ १५ ॥
| १. “क”—‘ककार’ = कामेश्वर | गायत्री मन्त्र का ‘तत्’ समानार्थक ॥ |
| २. 'ए'—'एकार' = कामेश्वर (महा- | 'सवितुर्वरेण्यं' = 'सावित्री' = त्रिपुरा |
| कुण्डलिनीदेवी मूलाधार के त्रिकोण | शक्ति ॥ (मूलाधार में त्रिपुरा के निवास |
| जो कि 'ए' के आकृति का होता | का प्रमाण भी पाया जाता है ।) |
| है) में व्यष्टिरूप में कुण्डलिनी | |
| शक्ति के स्वरूप में निवास करती | |
| है । त्रिकोण शक्ति कुण्डलिनी | |
| एकार के द्वारा सभी को जन्म | |
| देती है । अतः 'सावित्री' है । | |
| 'एकार'—'एकार' सभी कारणों का | 'वरेण्य'— |
| कारण है । इसीलिए अन्य | |
| सत्ताओं से वरिष्ठ होने के कारण | |
| 'वरेण्य' है । जो इस प्रकार | |
| समझता है वह भी 'वरेण्य' है । | |
| ३. 'ई'—'ई' | 'भर्गो देवस्य धी'—'धी' में धकार = |
| | धारण '

२३२ वरिवस्यारहस्ये

| ५. 'ह्रीं'—(गायत्री के तुरीय पद एवं | 'धियो यो नः प्रचोदयात्' जो हमारी |
| हृल्लेखा में समन्वय) | 'धियो' (ध्यानेच्छाशून्य निर्विकल्प |
| | परमात्मा के प्रति) प्रेरित करे। उस |
| | अनिर्वचनीय ज्योतिर्लिंग आत्मा के प्रति |
| | ब्रह्माकार परिणत चित्त द्वारा 'सोऽहं' के |
| | रूप में कल्पित करना चाहिए ॥ |

(ख) 'कामकूट' का 'गायत्री' के साथ समन्वय—अथ तु परं कामकलाभूतं
कामकूटमाहुः । तत् सवितुर्वरेण्यमित्यादिद्वात्रिंशदक्षरीं पठित्वा तदिति परमात्मा
सदाशिवोऽक्षरं विमलं निरूपाधितादात्म्यप्रतिपादनेन हकाराक्षरं शिवरूपं अनक्षरमक्षरं
व्यालिख्यत इति तत्परागव्यावृत्तिमादाय शक्तिं दर्शयति ॥ १६ ॥¹

द्वितीयोंऽशः २३३
१. ‘गायत्री’ वेदमाता है और वैदिक मन्त्र है । इसके साथ ही साथ
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र भी वैदिक मन्त्र है क्योंकि—‘कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा
हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा.... विश्वमातादिविद्योम ।। एक वैदिक मन्त्र है और
वह पञ्चदशाक्षरी मन्त्र ही है ।
२. गायत्री मन्त्र और पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का अर्थ एवं उसका अभिप्राय एक ही
है । भिन्न-भिन्न शब्दों में एक ही मन्त्र को उद्घाटित किया गया है यथा—इस मन्त्र
का अर्थ देखिए—
‘कामोयोनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला माययां च पुरुच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् ।।१
‘कामो’ = (‘क’), योनिः (‘ए’), कमला (‘ई’), वज्रपाणि (इन्द्र) = (‘ल’),
गुहा (ह्रीं), ‘ह’, ‘स’, मातरिश्वा-वायु (‘क’), अभ्र (‘ह’), इन्द्र (‘ल’) पुनः ‘गुहा’
= (‘ह्रीं’), ‘स’ ‘क’ ‘ल’ ‘माया’ (ह्रीं),—यह सर्वात्मिका जगन्माता की मूल विद्या
है और यह ब्रह्मरूपिणी है । (यही पञ्चदशाक्षरी मन्त्र है ।)
‘शिवशक्त्यभेदरूपा, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिका, सरस्वती-लक्ष्मी-गौरीरूपा’
अशुद्ध-मिश्र-शुद्धोपासनात्मिका, समरसीभूत शिवशक्त्यात्मक ब्रह्मस्वरूप का निर्विकल्प
ज्ञान प्रदान करने वाली, सर्वतत्त्वात्मिका महात्रिपुरसुन्दरी’—यही है पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
का भावार्थ ।
यह मन्त्र समस्त मन्त्रों का मुकुटमणि है और मन्त्र शास्त्र में ‘पञ्चदशी’ ‘कादि
श्रीविद्या’ के नाम से प्रख्यात है । इसका केवल एक ही अर्थ नहीं प्रत्युत् अनेक
अर्थ हैं ।
३. पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का एक ही अर्थ नहीं है प्रत्युत् अनेक अर्थ हैं—
‘योगिनीहृदय’ नामक ग्रन्थ में इसके छः अर्थ बताये गए हैं—(१) भावार्थ (२)
संप्रदायार्थ (३) निगर्भार्थ (४) कौलिकार्थ (५) सर्वरहस्यार्थ (६) महातत्त्वार्थ ।।२
‘सेतुबंध’ ‘प्रकाश’ आदि में इसके और भी अर्थ बताए गए हैं । भास्करराय
ने ‘वरिवस्यारहस्यम्’ में इसके निम्न पन्द्रह अर्थ बताए हैं जो निम्न हैं३—
(१) प्रतिपाद्यार्थ (२) भावार्थ (३) संप्रदायार्थ (४) निगर्भार्थ (५) कौलिकार्थ
(६) रहस्यार्थ (७) महातत्त्वार्थ (८) नामार्थ (९) शब्दरूपार्थ (१०) नामैकदेशार्थ
(११) शाक्तार्थ (१२) सामरस्यार्थ (१३) समस्तार्थ (१४) सगुणार्थ (१५)
महावाक्यार्थ ।।
४. ‘ह्रीं’ या हल्लेखा अतिगुप्त है और यह ओंकार का ही दूसरा नाम है ।४
१. श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् २. ‘योगिनीहृदय’ (मन्त्रसंकेत १५-१६)
३. वरिवस्यारहस्यम् (द्वि०अंश ५७-५९)—भास्कराचार्य
४. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक १२-१३)

२३४ वरिवस्यारहस्ये
इसे 'देवी प्रणव' भी कहा जाता है । इसका अर्थ देखिए । 'ह्रीं' में चार वर्ण हैं—
(१) ह (२) र (३) ई (४) बिन्दु । ये तो स्पष्ट वर्ण हैं किन्तु व्यापक दृष्टि से
देखें तो इसके बारह अवयव हैं—(१) ह (व्योम) (२) र (अग्नि) (३) ई
(वामलोचना) (४) बिन्दु (ं) (५) अर्धचन्द्र (६) रोधिनी (७) नाद (८) नादान्त
(९) शक्ति (१०) व्यापिका (११) समना (१२) उन्मनी । (ह्रीं में नौ नाद भी
अंतर्निविष्ट हैं । अतः इसकी अनन्त महिमा है ।)
५. अथर्वशीर्ष में भी 'ह्रीं' का अर्थ रहस्यात्मक दृष्टि से उद्घाटित किया गया
है जो निम्नानुसार है—
'वियदीकार संयुक्तं वीतिहोत्र समन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्याबीजं सर्वार्थ-
साधकम् ।।' 'देवी बीज' = 'ह्रीं' ।। इस देवी बीज का स्वरूप देखिए—
१. 'वियदीकार संयुक्तं' अर्थात् = 'वियत्' (आकाश) से युक्त एवं 'ईकार' से
युक्त । (वियत् + ईकार से युक्त ।)—अर्थात् 'ह एवं ई' से युक्त ।।
२. 'वीतिहोत्र समन्वितम्'—वीतिहोत्र (अग्नि) से संयुक्त ।। अर्थात् 'र' वर्ण से
युक्त ।
३. 'अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं'—अर्धेन्दु ( ँ ) से सुशोभित देवी-बीज ।।
सारांश—ह + ई + र + ँ (बिन्दु) से युक्त अर्थात् = 'ह्रीं' ।।
इसी गुप्त रीति से 'नवार्ण मन्त्र' को भी व्यक्त किया गया है यथा—
“वाङ्माया ब्रह्मभूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् ।
सूर्योऽवामश्रोत्र बिन्दु संयुक्तष्टा तृतीयकः ।।
नारायणेन संमिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः ।
विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ।।''१
अर्थात्—वाक् ('ऐं'), माया ('ह्रीं'), ब्रह्मसू = काम ('क्लीं') 'षष्ठं' (छठवां
व्यञ्जन) = अर्थात् 'चा', 'सूर्य' ('म'), 'अवाम श्रोत्र' = दक्षिणवर्ती कान ('उ'),
'बिन्दु' (अर्थात् अनुस्वार) से संयुक्त (अर्थात् म + उ + अनुस्वार से संयुक्त अर्थात्
'मुं'), 'संयुक्तष्टातृतीयकः'—टकार से तृतीय (अर्थात् 'ड'), 'नारायणेन संमिश्रो' =
'नारायण' (आ) से मिश्रित अर्थात् = ड + आ = 'डा', 'वायु' (मरुत = 'य'),
'अधर' ('ऐ') से युक्त अर्थात् 'यै' 'विच्चेनवार्णकोऽर्थ' अर्थात् अन्त में 'विच्चे'
पद । उपर्युक्त समस्त वर्णों को सङ्गति में बैठाने पर पूरा मन्त्र इस प्रकार बनेगा—
'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।' (नवार्ण मन्त्र) ।।
मन्त्रों को सीधे-सीधे न लिखकर इस प्रकार रहस्यात्मक रीति से उद्घाटित
करने के पीछे तर्क यह था कि कोई अपात्र व्यक्ति इस मन्त्र को न पा जाय
————————————————————————
१. श्रीदेव्यथर्वशीर्षम्

द्वितीयोंऽशः २३५
क्योंकि प्रथमतः तो अपात्र या कुपात्र होने पर इसका जप करना उसके लिए
सर्वविनाश का आमन्त्रण देना होगा और दूसरे यह कि यदि उसकी श्रद्धाभक्ति से
देवता प्रसन्न हो उठा तो मांत्री शक्ति से प्राप्त अचिन्त्य शक्तियों से अपने साथ ही
मानवीय समाज का एवं विश्व का बहुत बड़ा अहित कर सकता है इसीलिए मन्त्रों
को गोपनीय रखने का आदेश बार-बार दिया गया है यथा—
(क) गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
(ख) गोपनीयं मातृजःरवत् ।
(ग) अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरि व पार्वति ।।
(घ) अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ।।¹
६. गायत्री के दो रूप हैं । इनमें एक रूप तो अस्पष्ट एवं चारों वेदों
अत्यन्त गोपनीय है—'वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ।।'²
गायत्री मन्त्र का यह रूप (भाग) तो स्पष्ट है—"ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।'
किन्तु गायत्री का यह रूप—'परो रजसेऽसावदोम'—यह चतुर्थ चरण
अस्पष्ट है । 'त्रिपुरातापनीयोपनिषद' में इस मन्त्र को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया
है—"तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् परो
रजसेऽसावदोम ।।'³
गायत्री का जो द्वितीय रूप है वही 'श्रीविद्या' नामक रूप है भास्करराय कहते
हैं—"गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति पदच्छेद आवृत्या । चरणत्रयम् 'तत्सवितुः । इत्यादि
स्पष्टम् ।' 'परोरजसे सावयोम' इति चतुर्थं चरणं त्वस्पष्टमित्यर्थः । परं श्रीविद्याख्यं
द्वितीयं रूपम् ।।'⁴
'तस्या रूपद्वितयं तत्रैकं यत् प्रपठ्यतेऽस्पष्टम् ।
वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ।।'⁵
भास्करराय कहते हैं—इस 'श्रीविद्या' को वेद भी गुप्त ढंग से प्रस्तुत करते हैं
यथा—'कामो योनिः कमला' आदि—
"कामो योनिः कमलेत्येवं साङ्केतिकैः शब्दैः ।
व्यवहरति न तु प्रकटं यां विद्यां वेदपुरुषोऽपि ।।'⁶
७. श्रीभास्करराय ने अपने पक्ष की पुष्टि में 'देवीभागवत पुराण' एवं
"त्रिपुरोपनिषद" का नामोल्लेख किया है—
१. रुद्रयामलम् (कुब्जिकास्तोत्र) २. वरिवस्यारहस्यम् (प्रथम अंश)
३. त्रिपुरातापनीयोपनिषद ४. प्रकाश
५-६. वरिवस्यारहस्यम्

२३६ वरिवस्यारहस्ये
‘गायत्र्यर्थस्त्रिपुरोपनिषदिकथितस्तथैव भागवते’१
उन्होंने ‘योगिनीहृदय’ एवं ‘सङ्केतपद्धति’ के भी अनेक उद्धरण प्रस्तुत किये
हैं। ‘योगिनीहृदय’, ‘देवीभागवत’, ‘सङ्केतपद्धति’, ‘वामकेश्वर तन्त्र’, ‘नित्या
षोडशिकार्णव’ एवं अमृतानन्दनाथ को अनेक बार उल्लेखित करके वे उन्हें अपने
पक्ष का समर्थक प्रदर्शित करते हुए दिखाते हैं ।
वे यह भी कहते हैं कि पुराकाल में गायत्री चरणत्रय मात्रवाली थी । यथा—
‘सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि । बुद्धिं या नः प्रचोदयात्’२ आचार्य
भास्करराय का कथन है कि उपर्युक्त देवी भागवत के श्लोक के अनुसार गायत्री का
प्रतिपाद्यत्व, आद्या श्रीविद्या के ब्रह्मरूपत्व के प्रतिपादन में ही निहित है ‘अंत्र
ह्याद्यायाः श्रीविद्याया एवं ब्रह्मरूपत्व गायत्र्यादिप्रतिपाद्यत्वं’३ भास्करराय अपनी पुष्टि में
निम्न श्लोक भी प्रस्तुत करते हैं—‘हयग्रीव ब्रह्मविद्या वृत्रवधस्तथा । गायत्र्या च
समारंभस्त द्वै भागवतं विदुः ॥’४
सर्वान्तर्यामि दधद्भगों देवस्य धीति तुर्यार्थः ।
पृथ्वी मही लकारस्तृतीयतुर्याङ्घ्रिबोधिका माया ॥ ६१ ॥
(गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र के वर्णों की परस्पर वाचकता)
(पञ्चदशी मन्त्र का तृतीय वर्ण जो) वर्णमाला के चतुर्थ वर्ण (ई) का प्रतीक
है ‘भगों देवस्य धी’ का वाचक है । इसका अर्थ है—सर्वान्तर्यामी एवं सर्वपोषक
शिव ।। ‘लकार’ पृथ्वी का वाचक है । माया (हीं) (गायत्री के) तृतीय एवं चतुर्थ
चरण का वाचक है ॥ ६१ ॥

  • सरोजिनी *
    ‘पञ्चदशी मन्त्र’ का तृतीय वर्ण वर्णमाला का चतुर्थाक्षर ‘ई’ है ।
    | पञ्चदशी मन्त्र | गायत्रीमन्त्र | समता |
    | :--- | :--- | :--- |
    | ‘ई’ | ‘भर्गो देवस्य धी’ | दोनों मन्त्र एकार्थक |
    | | | हैं—दोनों एक दूसरे के |
    | | | अर्थ के द्योतक हैं ।। |
    | अर्थ सर्वान्तर्यामी सर्वाधार | अर्थ—सर्वान्तर्यामी | पञ्चदशी के ‘ई’ एवं |
    | शिव | एवं सर्वपोषक शिव | गायत्री मन्त्र के ‘भर्गो |
    | ‘तस्माद्भगों देवस्य धीत्ये- | —(गा०मं०) | देवस्य धी’ दोनों का |
    | वमीकारः’ श्रुति = ‘ई’ | ‘ईकारस्याप्येतावानर्थः | एक ही अर्थ है । |
    | | (—भास्कर) | |
    १. वरिवस्यारहस्यम् २. देवीभागवत पुराण
    ३. भास्करराय—‘प्रकाश’ ४. वरिवस्यारहस्यम्

द्वितीयोंऽशः २३७
| 'ल्'—भूमण्डल मेवोक्तं | 'महि' । 'भर्गोदेवस्य | 'ल' 'लं' एवं मही |
| लकारेण (श्रुति) (अर्थात् | धीमहि' का 'महि' । | दोनों पृथ्वी वाचक हैं । |
| महनीया पृथ्वी = पृथ्वी | अर्थ = पृथ्वी | |
| तत्व का बीजाक्षर 'लं') | | |
| = भूमण्डल 'ल' | | |
| ह्रीं (माया बीज) | (गायत्री का चतुर्थ | |
| | चरण) | |
| | 'परोरजसे सावदोम्' | |
'सवितुर्वरेण्यं' = 'ए' ॥ 'सवितुः' = (गा०मं०) प्राणिप्रसवकारण । योनि ।
सविता + वरेण्य = कामेश्वरी । 'ए' = कामेश्वरी ।
'क' = कामेश्वर । 'कं ब्रह्म' । 'तत्' (गायत्री मन्त्र) = ब्रह्म ॥ 'ॐतत्
सदिति' 'धी'—जगदाधार—'दधत्, धत इति धीः ॥ 'धरोधोत्येवं धार्यते ।' (श्रुति) ।
'वरेण्यं' (गा०मं०) श्रेष्ठ । भजनीय । 'धयो यो नः प्रचोदयात्' का अर्थ है—हम
लोगों की 'धी' (बुद्धि) को ध्यानातीत वस्तु, निष्प्रपञ्च विषयों में प्रेरित करें ॥
अर्थात् परात्परतत्त्व विषयक ज्ञान को प्राप्त करने हेतु प्रेरणा प्रदान करें ।
'तुरीयांघ्रिः' = गायत्री का 'परोरजसे सावदोम्' पद है । 'क' = 'कं ब्रह्म' =
ब्रह्म ॥
'क' = 'कामयते कामी जायते स एव निरञ्जनोऽकामत्वेनोज्जृंभते कामोऽभि-
धीयते तपरिभाषायां कामः ककारं व्याप्नोति' (श्रुति) 'क' = कामेश्वर ॥ 'तत्' =
तदिति ब्रह्म शाश्वतम्' (श्रुति) 'ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ॥ (गीता)
"सवितुर्वरेण्यम्" = 'श्रेष्ठ भजनीय योनि', जगत् का मूल एवं श्रेष्ठ कारण
= अर्थात् कामेश्वरी ॥
मन्त्र द्वय की समतुल्यता एवं समानार्थकता
| पञ्चदशाक्षरी मन्त्र | गायत्री मन्त्र |
| क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ह्रीं, | “ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो |
| स क ल ह्रीं | देवस्य धीमहि धियो यो नः |
| | प्रचोदयात्” |
| प्रथमकूट | |
| १. 'क' (कामनाओं को पूर्ण करने | 'तत्' = ब्रह्म ॥ 'ॐ तत् सदिति' |
| वाला = कामेश्वर) परमात्मा ॥ | |
| २. 'ए' = सरस्वती । त्रिकोण = | 'सवितुर्वरेण्यम्' जीवों की उत्पत्ति करने |
| एकार = (कामेश्वरी) कामेश्वरी 'त्रिकोण | वाली श्रेष्ठ कामेश्वरी ॥ |

२३८ वरिवस्यारहस्ये
शक्तिरेकारेण महाभगगेन प्रसूते |
तस्मादेकार एव गृह्यते ।। |
३. 'ई' = सर्वान्तर्यामी, सर्वाधारशक्ति | 'भर्गो देवस्य धी' = सर्वान्तर्यामी,
| सर्वपोषकशिव ।। 'देव' = सर्वान्तर्यामी
| 'धी' = जगदाधार ।। भर्ग = शिव ।
| ब्रह्मा । आदिम तेज ।। 'धी' में भी
| ईकार स्थित है । 'ई' = तुरीय ।। 'धी'
| = तुरीय ।।
४. 'ल' = पृथ्वी ।। (लकार पृथ्वी | धीमहि ।। मही = पृथ्वी ।। 'मही'—
बीज है ।) ('भूमण्डल मेवोक्तं लकारेण' | महत्व के कारण या काठिन्य के कारण
—श्रुति) | पृथ्वी मही कही जाती है । = 'मही'
| = ५ भूतों का उपलक्षण ।।
५. 'ह्रीं' (माया) । ह = हृदय ।। ही | 'धियो योनः प्रचोदयात्' हम लोगों के
= प्रणव = ब्रह्मा-विष्णु-महेश = (अ) | ध्यान को निष्प्रपञ्च विषय में प्रेरित
(उ) (म) ।। 'हृदयागारवासिनी हृल्लेखा' | करें ।'
(श्रुति) 'इ गतौ' धातु + 'इट किट |
कटी गतौ' |
प्रथमकूट का अर्थ—समस्त जगत् की सृष्टि करने की इच्छा रखने वाला
सिसृक्षारूप कामेश्वर जगत्कारणरूपा कामेश्वरी, शिव, सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार,
पञ्चमहाभूतादि के रूप में परिणत, परवस्तु मात्र विषयक निर्विकल्पक ज्ञान जनक
निरञ्जन निर्गुण वेद-प्रोक्त लक्षणों से गम्य शक्ति के द्वारा अगम्य ब्रह्म विष्णु रुद्रात्मा
परतत्व है ।'
द्वितीय कूट एवं तृतीय कूट | गायत्री मन्त्र
पञ्चदशीमन्त्र |
१. 'ह' 'स' 'क' । | 'तत् सवितुः वरेणं'
२. 'ह' | 'भर्गो देवस्य धीः'
१. ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध स्मृताः ।। (गीता) 'तदिति ब्रह्म
शाश्वतम्' (श्रुति) तत् = 'ब्रह्म' ।। 'क' = ब्रह्म ।। 'कं ब्रह्म' (श्रुति) कामयत इति । कम
(औणादिक) + उः = काम ।। 'कामयते कामी जायते स एव निरंजनोऽकात्वेनोज्जृंभते-
कामोऽभिधीयते । तत्परिभाषायां कामः ककारं व्याप्नोति ।।' (श्रुति) 'काम' = कामेश्वर ।।
'सवितुः' = तु प्रत्यय ।। सवितां प्राणियों के प्रसव का कारण अर्थात् योनि । ऐसा होने
के कारण वह सामान्य तो है नही अतः 'वरेण्य' कहा गया । वरेण्य = श्रेष्ठा भजनीय ।
सविता = कामेश्वरी ।।

द्वितीयोंऽशः २३९
| ३. 'सं' 'क' (तृतीय कूट) | उन्हीं तीन पदों एवं ६ वर्णों का बोध कराते हैं । |
| ४. द्वितीयएवं तृतीय कूटों के शेष वर्णों का उद्धार उपर्युक्त रीति से ही करना चाहिए ॥ | (त्रिपुरोपनिषद एवं देवी भागवत पुराण में गायत्री विद्या का ऐरम ही अर्थ किया गया है । ) |
| ५. द्वितीय कूटस्थ वर्णत्रय त्रिपदी गायत्री के समतुल्य है । | गायत्री त्रिपदी है । पदत्रय युक्ता है 'तत् = ब्रह्म । शिव ॥ 'तदिति परमात्मा' (श्रुति) |
| 'स'—गायत्री के 'सविता' का बोधक है । | 'स': सवितुः ॥ |
| 'क' ............ | 'वरेण्य' |
| 'ह' (तुर्य हकार) ......... | 'भर्गो देवस्य धी' का बोधक । धीत्यन्त गायत्री के अर्थ अर्थ-बोधक । |
| 'स क' (तृतीय कूट) | पञ्चमहाभूतादि एवं आत्मा |
| लकार एवं ह्रीं | |
आद्या श्रीविद्या ब्रह्म है । यही पञ्चदशीमन्त्र एवं गायत्री मन्त्र दोनों में
प्रतिपादित है । 'सर्वचैतन्यां तामाद्यां विद्यां च धीमहि । बुद्धिं या नः प्रचोदयात् ।'
यह भी समतुल्य दृष्टि रखने के कारण ध्यातव्य है ।
पञ्चदशीमन्त्र के वाग्भवकूट का अर्थ—आचार्य भास्करराय इसका समष्टिगत
अर्थ बताते हुए कहते हैं—
“एवं चायमर्थो गायत्र्याः प्रथमकूटस्य च संपन्नः—सर्वजगत्सिसृक्षारूप
कामनावान् कामेश्वरः जगत्कारणरूपा कामेश्वरी” शिवः सर्वान्तर्यामी सर्वाधारः
पञ्चमहाभूताद्यात्मना परिणतः परवस्तुमात्र विषयक निर्विकल्पकज्ञानजनको निरञ्जनो
निर्गुणो वेदैर्लक्षणया गम्यः शक्त्या त्वगम्यो ब्रह्म विष्णु रुद्रात्मा परतत्वमिति ॥”१
द्वितीयतृतीयकूटयोरर्थमाह—
त्रिपदी त्रिवर्णबोध्या तुर्यस्तदुपरीषदक्षरीगमकः ।
अथ तार्तीये वर्णद्वितयं त्रिपदीषदक्षरीगमकम् ॥ ६२ ॥
(पञ्चदशी एवं गायत्री मन्त्र के वर्णों का अन्तर्संबन्ध)
अक्षरत्रय (ह स क) द्वारा (गायत्री मन्त्र के) तीन वर्णों (तत् सवितुः वरेण्यं)
को (उनके वाचक के रूप में) जानना चाहिए । चतुर्थाक्षर (ह) परवर्ती छः वर्णों
(भर्गो देवस्य धी) का बोधक है ॥ तृतीय कूट के वर्णद्वय (स क) उन्हीं तीन पदों
एवं छः वर्णों को सङ्केतित करते हैं ॥ ६२ ॥

  • प्रकाश *
    त्रिपदी गायत्रीस्थं पदत्रयं विद्याद्वितीयकूटस्थवर्णत्रयेण बोध्यम् । त्र्यवयवका
    वर्णास्त्रिवर्णाः । 'त्रिगुणसचिवः', 'नवरसरुचिराम्', इत्यादिवत् समासः । तत्पदार्थो

२४० वरिवस्यारहस्ये
ब्रह्मशिववाचिहकारस्यार्थः, 'तदिति परमात्मा' इत्यारभ्य 'हकाराक्षरं शिवरूपम्'
इत्याद्युक्त्वान्ते तत्पदव्यावृत्तिमादाय 'शक्तिं दर्शयति' इति श्रुतेः । सकारस्य सविता
अर्थः । ककारस्य वरेण्यमर्थः । तुर्यो हकारस्तदुपरि पदत्रयोपरि विद्यमाना या षडक्षरी
'भर्गो देवस्य धी' इति तदर्थबोधकः । तृतीयकूटे वर्णद्वितयं सकेति । ताभ्यां
धीत्यन्तगायत्र्या अर्थः प्रतिपाद्यः । उभयत्रापि लकारहृल्लेखाभ्यां पञ्चमहाभूताद्यात्मने-
त्यादिरर्थ इत्याह—कूटद्वितय इति । एवं चतुश्चरणाया गायत्र्यास्त्रिरावृत्ताया अर्थस्य
प्रतिपादकं कूटत्रितयमिति । भागवत इति । भगवत्या इदं भागवतम्, तत्र भगवतीपुराण
इत्यर्थः । तस्य हि पुराणस्यादिमः श्लोकस्त्रिचरणः पठ्यते । यथा—
'सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि ।
बुद्धिं या नः प्रचोदयात् ॥'
इति । अत्र ह्राद्यायाः श्रीविद्याया एव ब्रह्मरूपत्व गायत्र्यादिप्रतिपाद्यत्वं
विद्याप्रतिपाद्यत्वादिकं च तदर्थव्याख्यानदर्शिनां स्पष्टम् । वस्तुतस्तु
'हयग्रीवब्रह्मविद्या यत्र वृत्रवधस्तथा ।
गायत्र्या च समारम्भस्तद्वै भागवतं विदुः ॥'
इति लक्षणानुगत्येदमेव भागवतपदवाच्यम्, न पुनः 'जन्माद्यस्य यतो ऽन्वयात्'
इत्यादिकम् ॥ ६२-६३ ॥
* सरोजिनी *
'त्रिपदी..............गमकम्' ॥ तुलना कीजिए—

पञ्चदशीमन्त्रावयवगायत्रीमन्त्रावयव
'ह स क' 'त्रिपदी''तत् सवितुः वरेण्यं' ('त्रिवर्ण')
'ह स क' का वही अर्थ है जो कि 'तत् सवितुः वरेण्यं' का अर्थ है ।
पञ्चदशीमन्त्रावयवगायत्रीमन्त्रावयव
:---:---
'ह' (तुर्य) (चतुर्थवर्ण ह)'भर्गो देवस्य धी' ('षडक्षरी')
'ह स क ह ल' में से चतुर्थाक्षर (ह) का वही अर्थ है जो कि गायत्री मन्त्र
के 'भर्गो देवस्य धी' का अर्थ है ।
पञ्चदशीमन्त्रावयवगायत्रीमन्त्रावयव
:---:---
(तृ०कूट के) 'स-क' ('वर्णद्वितयं)'भर्गो देवस्य धी' 'त्रिपदी षडक्षरी'
सारांश—
१. 'ह स क' (पं०मन्त्र) के समानार्थी = 'तत् सवितुः वरेण्यं' (गा०मं)
२. 'ह' (पं०मन्त्र) के समानार्थी = 'भर्गो देवस्य धी' (गा०मन्त्र)
३. 'स क' (पं०मन्त्र) के समानार्थी = 'भर्गो देवस्य धी' (गा०मन्त्र)