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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 530 में से

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पृष्ठ 323

प्रथमोऽंशः २२१

  • प्रकाश *
    इति श्रीनृसिंहानन्दनाथचरणाराधकेन भास्कररायापरनाम्ना भासुरानन्दनाथेनोन्मीते
    वरिवस्यारहस्ये तत्प्रकाशे च प्रथमोऽंशः
  • सरोजिनी *
    गुरोः करुणावशतः—गुरु की अनुकम्पा के कारण ॥ ग्रन्थकार प्रस्तुत
    ग्रन्थ-रचना का के कर्तृत्व एवं प्रणयन-गौरव का श्रेय स्वयं नहीं लेना चाहता प्रत्युत्
    इसे अपने गुरु को समर्पित करना चाहता है । इसका कारण क्या है? प्रथम
    कारण तो यह है कि ऐसा करके शिष्य गुरु द्वारा प्रयन्त ज्ञान के ऋण से मुक्त हो
    जाता है दूसरे अपने कर्तृत्व में गुरु के शक्ति-सञ्चार को अनुभव करने से
    ग्रन्थकार की अहङ्कार विमुक्त चेतना और अधिक निर्मल, व्यापक, सूक्ष्म, एवं
    शक्तिशाली होती जाती है । इसके अतिरिक्त 'गुरु' शब्द मङ्गलवाची भी है
    क्योंकि—'गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेफः पापस्य दाहकः । उकारः शम्भुरित्युक्त
    स्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ॥'१
    एक बात यह है कि प्रत्येक साधक ग्रन्थकार इष्टदेवता को प्रसन्न करना
    चाहता है । इस दृष्टि से देखें तो भी गुरु के प्रति निष्ठा आवश्यक है क्योंकि—
    गुरुप्रीति समुत्पन्ने देवता प्रीतिमाप्नुयात् ।
    देवताप्रीतिमापन्ने मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥२
    “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
    अतएव महेशानि साक्षाद् ब्रह्ममयो गुरुः ॥'३
    ॥ इस प्रकार वरिवस्यारहस्य के प्रथमोऽंश की डॉ० श्यामाकान्त द्विवेदी कृत
    'सरोजिनी' नामक हिन्दी टीका पूर्ण हुई ॥
    ―― * ――
    १. यामल २-३. कुलार्णव—शाक्तानन्द तरंगिणी