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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 530 में से

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द्वितीयोंऽशः २३५
क्योंकि प्रथमतः तो अपात्र या कुपात्र होने पर इसका जप करना उसके लिए
सर्वविनाश का आमन्त्रण देना होगा और दूसरे यह कि यदि उसकी श्रद्धाभक्ति से
देवता प्रसन्न हो उठा तो मांत्री शक्ति से प्राप्त अचिन्त्य शक्तियों से अपने साथ ही
मानवीय समाज का एवं विश्व का बहुत बड़ा अहित कर सकता है इसीलिए मन्त्रों
को गोपनीय रखने का आदेश बार-बार दिया गया है यथा—
(क) गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
(ख) गोपनीयं मातृजःरवत् ।
(ग) अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरि व पार्वति ।।
(घ) अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ।।¹
६. गायत्री के दो रूप हैं । इनमें एक रूप तो अस्पष्ट एवं चारों वेदों
अत्यन्त गोपनीय है—'वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ।।'²
गायत्री मन्त्र का यह रूप (भाग) तो स्पष्ट है—"ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।'
किन्तु गायत्री का यह रूप—'परो रजसेऽसावदोम'—यह चतुर्थ चरण
अस्पष्ट है । 'त्रिपुरातापनीयोपनिषद' में इस मन्त्र को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया
है—"तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् परो
रजसेऽसावदोम ।।'³
गायत्री का जो द्वितीय रूप है वही 'श्रीविद्या' नामक रूप है भास्करराय कहते
हैं—"गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति पदच्छेद आवृत्या । चरणत्रयम् 'तत्सवितुः । इत्यादि
स्पष्टम् ।' 'परोरजसे सावयोम' इति चतुर्थं चरणं त्वस्पष्टमित्यर्थः । परं श्रीविद्याख्यं
द्वितीयं रूपम् ।।'⁴
'तस्या रूपद्वितयं तत्रैकं यत् प्रपठ्यतेऽस्पष्टम् ।
वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ।।'⁵
भास्करराय कहते हैं—इस 'श्रीविद्या' को वेद भी गुप्त ढंग से प्रस्तुत करते हैं
यथा—'कामो योनिः कमला' आदि—
"कामो योनिः कमलेत्येवं साङ्केतिकैः शब्दैः ।
व्यवहरति न तु प्रकटं यां विद्यां वेदपुरुषोऽपि ।।'⁶
७. श्रीभास्करराय ने अपने पक्ष की पुष्टि में 'देवीभागवत पुराण' एवं
"त्रिपुरोपनिषद" का नामोल्लेख किया है—
१. रुद्रयामलम् (कुब्जिकास्तोत्र) २. वरिवस्यारहस्यम् (प्रथम अंश)
३. त्रिपुरातापनीयोपनिषद ४. प्रकाश
५-६. वरिवस्यारहस्यम्