वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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एक देश (अंश) के ग्रहण द्वारा समस्त नाम ग्रहण का बोध' लोक
प्रसिद्ध है । अतः समस्त नाम का अर्थ नाम के एक अंश का अर्थ
हुआ ॥ १११-११२ ॥ “नामैकदेशमात्रे नामग्रहणस्य लोकसिद्धत्वात् ।
नामोपस्थितिगम्यः प्रोक्तो नामैकदेशार्थः ॥”
९. 'शाक्तार्थ'—शाक्तों की मान्यतानुसार प्रत्येक अक्षर में शक्ति है तथा
अक्षरों एवं वामा, इच्छा तथा अन्य शक्तियों में अभेद है—यही 'शाक्तार्थ'
है ।१
१०. सामरस्यार्थ—'क' एवं 'ह' तथा 'ल' एवं 'स' का अर्थ है—'शक्ति' ॥
हल्लेखा (ह्रीं) का अर्थ शिव एवं शक्ति का सामरस्य रूप परब्रह्म
है ॥ ११९ ॥ उक्त तीनों कूटों में से प्रत्येक का अर्थ है । “शिव एवं
शक्ति के सामरस्य के कारण ब्रह्म ही शिव एवं शक्ति दोनों ही है ।”
यह विद्या का 'सामरस्यार्थ' है ॥ १२० ॥२
११. 'समस्तार्थ'—श्रीविद्या के 'समस्तार्थ' के अन्तर्गत अनेक पदों एवं गुणों
का समास समस्त पुरुषार्थों के साधन का संक्षिप्त एवं सार कथन आता
है ।३
१२. 'सगुणार्थ'—समस्त गुण गण के कथन द्वारा विद्या का सगुणार्थ व्यक्त
होता है—'इत्थं गुण गण कथनाद्विद्याया एष सगुणार्थः ॥'४
१३. 'महावाक्यार्थ'—'ह' 'स' आनन्द, 'क' सत्य, 'ह' अनन्त एवं 'ल'
ज्ञान है । इस प्रकार तटस्थ एवं स्वरूप लक्षणों द्वारा ब्रह्म का निर्णय
करके (यह विद्या) तुरीय कूट के द्वारा ब्रह्म एवं जीव का तादात्म्य
(अभिन्नता अभेदात्मकता) स्थिर करती है । 'स' 'क' 'ल' पद जीव का
वाचक है जिसकी जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति नामक तीन कलायें हैं ।
शक्ति बीज 'ह्रीं' ब्रह्म का वाचक है । उक्त दोनों में सामानाधिकरण्य होने
के कारण उनके द्वारा लक्षित शुद्ध वस्तुएँ अभिन्न हैं । तृतीय कूट होने
के कारण उनके द्वारा लक्षित शुद्ध वस्तुएँ अभिन्न हैं । तृतीय कूट के
'स' 'क' 'ल' पदों का अभिप्राय है—यह सब ब्रह्म है ।' इस प्रकार जीव
एवं ब्रह्म के स्वरूप का लाक्षणिक वाक्यों द्वारा वर्णन करके उनका अभेद
स्थिर किया गया । यही 'महावाक्यार्थ' है ।
“अथातः”—'अथ' = इसके अनन्तर (अर्थात् उक्त रीति से अर्थ ज्ञान के
अवश्यिकत्व के द्वारा अर्थों पर प्रकाश डाला जा रहा है ।) पूर्ण गायत्री = चतुर्थ
चरण सहित गायत्री । 'स्व' = आत्मीय आत्मीय वर्ण । 'संमिताः' = उन-उन वर्णों
से संमित । अर्थात् तत्संख्या समान संख्यक (१५) ॥ या संप्रदायार्थ के प्रकरण में
समागत-'कादिविद्या' में सप्तत्रिंश (३७) वर्णों से स्फुरीकृत किया जायेगा और उस
दिशा में अर्थ होगा—'तत्संमित' ॥
१-४. वरिवस्यारहस्यम्