वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः २३३
१. ‘गायत्री’ वेदमाता है और वैदिक मन्त्र है । इसके साथ ही साथ
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र भी वैदिक मन्त्र है क्योंकि—‘कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा
हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा.... विश्वमातादिविद्योम ।। एक वैदिक मन्त्र है और
वह पञ्चदशाक्षरी मन्त्र ही है ।
२. गायत्री मन्त्र और पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का अर्थ एवं उसका अभिप्राय एक ही
है । भिन्न-भिन्न शब्दों में एक ही मन्त्र को उद्घाटित किया गया है यथा—इस मन्त्र
का अर्थ देखिए—
‘कामोयोनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला माययां च पुरुच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् ।।१
‘कामो’ = (‘क’), योनिः (‘ए’), कमला (‘ई’), वज्रपाणि (इन्द्र) = (‘ल’),
गुहा (ह्रीं), ‘ह’, ‘स’, मातरिश्वा-वायु (‘क’), अभ्र (‘ह’), इन्द्र (‘ल’) पुनः ‘गुहा’
= (‘ह्रीं’), ‘स’ ‘क’ ‘ल’ ‘माया’ (ह्रीं),—यह सर्वात्मिका जगन्माता की मूल विद्या
है और यह ब्रह्मरूपिणी है । (यही पञ्चदशाक्षरी मन्त्र है ।)
‘शिवशक्त्यभेदरूपा, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिका, सरस्वती-लक्ष्मी-गौरीरूपा’
अशुद्ध-मिश्र-शुद्धोपासनात्मिका, समरसीभूत शिवशक्त्यात्मक ब्रह्मस्वरूप का निर्विकल्प
ज्ञान प्रदान करने वाली, सर्वतत्त्वात्मिका महात्रिपुरसुन्दरी’—यही है पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
का भावार्थ ।
यह मन्त्र समस्त मन्त्रों का मुकुटमणि है और मन्त्र शास्त्र में ‘पञ्चदशी’ ‘कादि
श्रीविद्या’ के नाम से प्रख्यात है । इसका केवल एक ही अर्थ नहीं प्रत्युत् अनेक
अर्थ हैं ।
३. पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का एक ही अर्थ नहीं है प्रत्युत् अनेक अर्थ हैं—
‘योगिनीहृदय’ नामक ग्रन्थ में इसके छः अर्थ बताये गए हैं—(१) भावार्थ (२)
संप्रदायार्थ (३) निगर्भार्थ (४) कौलिकार्थ (५) सर्वरहस्यार्थ (६) महातत्त्वार्थ ।।२
‘सेतुबंध’ ‘प्रकाश’ आदि में इसके और भी अर्थ बताए गए हैं । भास्करराय
ने ‘वरिवस्यारहस्यम्’ में इसके निम्न पन्द्रह अर्थ बताए हैं जो निम्न हैं३—
(१) प्रतिपाद्यार्थ (२) भावार्थ (३) संप्रदायार्थ (४) निगर्भार्थ (५) कौलिकार्थ
(६) रहस्यार्थ (७) महातत्त्वार्थ (८) नामार्थ (९) शब्दरूपार्थ (१०) नामैकदेशार्थ
(११) शाक्तार्थ (१२) सामरस्यार्थ (१३) समस्तार्थ (१४) सगुणार्थ (१५)
महावाक्यार्थ ।।
४. ‘ह्रीं’ या हल्लेखा अतिगुप्त है और यह ओंकार का ही दूसरा नाम है ।४
१. श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् २. ‘योगिनीहृदय’ (मन्त्रसंकेत १५-१६)
३. वरिवस्यारहस्यम् (द्वि०अंश ५७-५९)—भास्कराचार्य
४. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक १२-१३)