वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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इसे 'देवी प्रणव' भी कहा जाता है । इसका अर्थ देखिए । 'ह्रीं' में चार वर्ण हैं—
(१) ह (२) र (३) ई (४) बिन्दु । ये तो स्पष्ट वर्ण हैं किन्तु व्यापक दृष्टि से
देखें तो इसके बारह अवयव हैं—(१) ह (व्योम) (२) र (अग्नि) (३) ई
(वामलोचना) (४) बिन्दु (ं) (५) अर्धचन्द्र (६) रोधिनी (७) नाद (८) नादान्त
(९) शक्ति (१०) व्यापिका (११) समना (१२) उन्मनी । (ह्रीं में नौ नाद भी
अंतर्निविष्ट हैं । अतः इसकी अनन्त महिमा है ।)
५. अथर्वशीर्ष में भी 'ह्रीं' का अर्थ रहस्यात्मक दृष्टि से उद्घाटित किया गया
है जो निम्नानुसार है—
'वियदीकार संयुक्तं वीतिहोत्र समन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्याबीजं सर्वार्थ-
साधकम् ।।' 'देवी बीज' = 'ह्रीं' ।। इस देवी बीज का स्वरूप देखिए—
१. 'वियदीकार संयुक्तं' अर्थात् = 'वियत्' (आकाश) से युक्त एवं 'ईकार' से
युक्त । (वियत् + ईकार से युक्त ।)—अर्थात् 'ह एवं ई' से युक्त ।।
२. 'वीतिहोत्र समन्वितम्'—वीतिहोत्र (अग्नि) से संयुक्त ।। अर्थात् 'र' वर्ण से
युक्त ।
३. 'अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं'—अर्धेन्दु ( ँ ) से सुशोभित देवी-बीज ।।
सारांश—ह + ई + र + ँ (बिन्दु) से युक्त अर्थात् = 'ह्रीं' ।।
इसी गुप्त रीति से 'नवार्ण मन्त्र' को भी व्यक्त किया गया है यथा—
“वाङ्माया ब्रह्मभूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् ।
सूर्योऽवामश्रोत्र बिन्दु संयुक्तष्टा तृतीयकः ।।
नारायणेन संमिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः ।
विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ।।''१
अर्थात्—वाक् ('ऐं'), माया ('ह्रीं'), ब्रह्मसू = काम ('क्लीं') 'षष्ठं' (छठवां
व्यञ्जन) = अर्थात् 'चा', 'सूर्य' ('म'), 'अवाम श्रोत्र' = दक्षिणवर्ती कान ('उ'),
'बिन्दु' (अर्थात् अनुस्वार) से संयुक्त (अर्थात् म + उ + अनुस्वार से संयुक्त अर्थात्
'मुं'), 'संयुक्तष्टातृतीयकः'—टकार से तृतीय (अर्थात् 'ड'), 'नारायणेन संमिश्रो' =
'नारायण' (आ) से मिश्रित अर्थात् = ड + आ = 'डा', 'वायु' (मरुत = 'य'),
'अधर' ('ऐ') से युक्त अर्थात् 'यै' 'विच्चेनवार्णकोऽर्थ' अर्थात् अन्त में 'विच्चे'
पद । उपर्युक्त समस्त वर्णों को सङ्गति में बैठाने पर पूरा मन्त्र इस प्रकार बनेगा—
'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।' (नवार्ण मन्त्र) ।।
मन्त्रों को सीधे-सीधे न लिखकर इस प्रकार रहस्यात्मक रीति से उद्घाटित
करने के पीछे तर्क यह था कि कोई अपात्र व्यक्ति इस मन्त्र को न पा जाय
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१. श्रीदेव्यथर्वशीर्षम्