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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

प्रथमोऽंशः २०१
विस्तार और व्यापकता की दृष्टि से शब्द-स्तर (नाद-स्तर)
सृष्ट्युन्मुखीशब्द
धारा—
जीव और मन का शब्द ———————
वैराट पुरुष का शब्द ——————
माया और ब्रह्म शब्द —————
ब्रह्म शब्द ————
पारब्रह्म का शब्द ———
सोहं पुरुष का शब्द ——
सत्त पुरुष का शब्द —
(केन्द्र से बाहर की ओर प्रवाहित)
अननुमेय, अत्यन्त गुप्तशब्द —
बन्धन क्रम
भीतर से बाहर की ओर प्रवाहित
→ → → → →
सूक्ष्मता और अन्तर्मुखता की दृष्टि से शब्द-स्तर (नाद-स्तर)
जीव और मन का शब्द ———————
वैराट पुरुष का शब्द ——————
माया और ब्रह्म शब्द —————
ब्रह्म शब्द ————
पारब्रह्म का शब्द ———
प्रलयोन्मुखीशब्द धारा—
सोहं पुरुष का शब्द ——
(केन्द्र की ओर प्रवाहित)
सत्त पुरुष का शब्द —
अननुमेय, अत्यन्त गुप्तशब्द —
मुक्ति-क्रम
बाहर से भीतर की ओर प्रवाहित
← ← ← ← ←

२०२ वरिवस्यारहस्ये

  • प्रकाश *
    शक्तिस्थानादूर्ध्वं पुनरुज्जीवितस्य नादस्य सूक्ष्मतमस्य व्यापिकामुलङ्घ्य
    समनायां लयः शक्तिविषुवमित्यर्थः ॥ ४८ ॥
  • सरोजिनी *
    शक्तिविषुव काल विषुव—प्राण, आत्मा एवं मन के परस्पर योग की
    'प्राणविषुव' एवं नाद को अपनी निजी आत्मा समझकर भावना करना 'मन्त्रविषुव'
    कहलाता है । शक्तिमध्यगत नाद के समना पर्यन्त चिन्तन की 'शक्तिविषुव' कहते
    हैं । शक्ति में नादान्त पर्यन्त मन्त्रावयवों की लय भावना 'प्रशान्तविषुव' है ।
    कालातीत उन्मनापर्यन्त नाद के चिन्तन को 'कालविषुव' कहते हैं ।
    'शैवतन्त्र' में 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' की व्याख्या करते हुए कहा गया
    है—'शक्तिमध्यगतो नादः समनान्तं प्रसर्पति । तच्छक्तिविषुवं प्रोक्तमुन्मन्यां काल-
    संज्ञितम् ।।'१
    आचार्य भास्कर 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' को इस प्रकार परिभाषित करते
    हैं—'अथ लीयमानस्य दीपादेः सूक्ष्मीभूय पुनः स्थूलीभावदर्शनान्तदनुसारेण शक्तौ
    लीनस्य नादस्य पुनरुज्जीवनेन व्यापिकामुत्क्रम्य समनायां लय चिन्तनं शक्तिविषुवम् ।
    ततः पुनरुज्जीव्योन्मन्यांलयः 'कालविषुवः' ।२
    आचार्य अमृतानन्दनाथ 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' को परिभाषित करते हुए
    कहते हैं—तदूर्ध्वं शक्तेरूर्ध्वं समनान्तं नादस्य विचिन्तनं 'शक्तिविषुवं । तदूर्ध्वं
    समनाया अप्यूर्ध्वम् । 'नात्र काल कलाभानम्' इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या कालातीतो-
    न्मनान्तं नादस्य विचिन्तनं कालविषुवं ।।३
    'योगिनीहृदय' में 'शक्तिविषुव'—'कालविषुव' की इस प्रकार परिभाषा दी गई
    है—
    'विषुवशक्तिसंज्ञं तुदूर्ध्वं नाद चिन्तनम् ।
    तदूर्ध्वं कालविषुवमुन्मनान्तं महेश्वरि ।।'४
    शक्ति के मध्यगत नाद से समनापर्यन्त चिन्तन को 'शक्ति विषुव' कहते हैं ।
    यहाँ तक काल की क्रीड़ा है क्योंकि समना तक ही काल की सीमा है उसके आगे
    'उन्मना' में नहीं ।
    कालविषुव के बाद 'तत्त्वविषुव' अङ्गीकृत होता है । नाद ही तत्त्व का
    अभिव्यञ्जक है । लेकिन जब तक नाद का वास्तविक अन्त नहीं होता तब तक
    तत्त्व बोध नहीं होता । नादान्त तो दूर की बात शक्ति में या समना में भी नाद
    का अन्त नहीं होता । शाक्त योगी उन्मना को भी नाद का अन्त स्वीकार नहीं
    १. शैवतन्त्र २. भास्कराचार्य—सेतुबन्ध श्लो० १८७
    ३. अमृतानन्दनाथ—'योगिनीहृदयदीपिका' ४. योगिनीहृदय

प्रथमोऽंशः २०३
करते। उन्मना के ऊपर—उन्मना को भेद करने के साथ-साथ नाद लीन होता है।
उस स्थिति में तत्त्वबोध या आत्मसाक्षात्कार स्वभावतः होता है। अतः 'तत्त्वविषुव'
को ही चैतन्य का अभिव्यक्ति स्थान कहना सङ्गत है। ६ शून्यों, ५ अवस्थाओं
एवं ६ विषुवों से परे है—विश्व की परम विश्रान्ति या परम शिव की अवस्था।
उन्मना तक सभी मन्त्रावयव १०८१७ बार उच्चरित होने से नाद का अन्त एवं
तत्त्वज्ञान का उदय होकर परमपद की प्राप्ति होती है।
समनोर्ध्वं पुनरुज्जीवितस्यात्यन्तं सूक्ष्मतमस्य नादस्योन्मन्यां लयः कालविषुव-
मित्याह—
समनागतमुन्मन्यामेते द्वे शक्तिकालविषुवाख्ये ।
श्रीविद्याकूटावयवेषु ककारादिषून्मनान्तेषु ॥ ४९ ॥
अकुलादिकोन्मनान्तप्रदेशसंस्थेषु सकलेषु ।
अध्युष्ठनिमेषोत्तरसप्तदशाधिकशतत्रयत्रुटिभिः ॥ ५० ॥
उच्चरिते नादे सति तस्यान्ते तत्त्ववेदनं भवति ।
तदिदं चैतन्याभिव्यक्तिनिदानं तु तत्त्वविषुवाख्यम् ॥ ५१ ॥
('तत्त्वविषुव' का स्वरूप)
समना एवं उन्मनी में लयीभूत नाद की इन दोनों अवस्थाओं की आख्या
क्रमशः 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' है। ककार से लेकर उन्मना तक एवं अकुल
से लेकर उन्मना तक प्रदेशों में विद्यमान श्रीविद्याकूटों के भागों (अङ्गों) को व्याप्त
करके समस्त ३१७ त्रुटियों एवं साढ़े तीन निमेषों को व्याप्त करता हुआ नाद
तत्त्वज्ञान का कारण होता है। वह यह शुद्ध चैतन्य की अभिव्यक्ति का मूल हेतु
'तत्त्वविषुव' नाम वाला है ॥ ४९-५१ ॥

  • प्रकाश *
    उक्तेषु द्वात्रिंशत्पद्मेष्वधस्तनद्वयं चरमं चाकुलपद्मानि । शेषाणि कुलपद्मानि । तेषु
    यद्यपि मूलाधाराख्यात् कुलपद्मादेव विद्याक्षराणारम्भः, तथापि चक्रराजस्य
    सकलाख्यभावनाया अधस्तनसहस्रदलकमलमारभ्यैव 'अकुले विषुसंज्ञे च' इत्यादिना
    चतुःशत्यामुक्तत्वात् कुलाकुलविद्ययोरभेदेन श्रीविद्याया अपि तत आरम्भोक्तिस्तन्त्रेषु ।
    अध्युष्ठं सार्धत्रयम् । निमेषो लोचनस्पन्दकालः । तस्य त्रिसहस्रतमो ऽंशस्त्रुटिः,
    'स्वस्थे नरे समासीने यावत् स्पन्दति लोचनम् ।
    तस्य त्रिंशत्तमो भागस्तत्परः परिकीर्तितः ।
    तत्परस्य शतांशस्तु त्रुटिरित्यभिधीयते ॥'
    इति वचनात् । एवं च (१०८१७) अयुतोत्तराष्टशतोत्तरसप्तदशत्रुटिपर्यन्तं
    विद्यावयवस्थानसंलग्नतापूर्वकं नादोच्चारणे कृते सति, तत्त्वस्य स्वसंविदभेदस्य बोधो
    भवति । तदिदमुच्चारणं तत्त्वविषुवम् ॥ - ४९-५१ ॥

२०४ वरिवस्यारहस्ये

  • सरोजिनी *
    'योगिनीहृदय' में 'तत्त्वविषुव' इस प्रकार व्याख्या है—'मुनिचन्द्राष्टदशभि-
    स्त्रुटिभिर्नादवेदनम् । चैतन्यव्यक्तिहेतुश्च विषुवं तत्त्वसंज्ञितम् ॥ १८८ ॥ परं स्थानं
    महादेवि निसर्गानन्दसुन्दरम् ॥'१
    आचार्य अमृतानन्द 'तत्त्वविषुव' की व्याख्या करते हुए कहते हैं—अनन्तरोक्त-
    रीत्या चैतन्यस्य स्वात्मतत्त्वस्य व्यक्तेः प्रकाशस्य हेतुस्तत्त्वविषुवम् ।२ कोऽर्थः ।
    उन्मनोध्र्वेऽनन्तरोक्तसंख्यावत्त्रुटिभिर्नादलयात् स्वात्मानुसन्धानं तत्त्वविषुवम् ॥३
    'शैवतन्त्र' में कहा गया है—'स्वाधिकारे परे धाम्निविषुवं तत्त्वसंज्ञकम् ॥'४
    आचार्य भास्कर की व्याख्यानुसार 'तत्त्वविषुव' का स्वरूप इस प्रकार है—
    'अथायमेव नादो यद्यविच्छिन्नतया सार्धनिमेषत्रयोत्तरं सप्तदशाधिक शत त्रय त्रुटि
    परि

प्रथमोऽंशः २०५

  • प्रकाश *
    अवस्थादिचतुष्टये संख्याचतुष्टयस्य क्रमादन्वयः । नादत्रयस्य चक्रत्रयात्मकत्व-
    भावनं प्रागुक्तम् । चक्रसङ्केते त्वन्यदपि त्रयमुक्तम्—चक्रभावनं त्रिविधं सकलं निष्कलं
    सकलनिष्कलं चेति । अकुलसहस्रारं मूलाधारादिपञ्चकं सूक्ष्मजिह्वा भ्रूमध्यं बिन्दुस्थानं
    चेति नवसु स्थानेषु त्रैलोक्यमोहनादिचक्रनवकभावनं सकलम्, बिन्दाद्युन्मन्यन्तं
    तद्भावनं द्वितीयम्, महाबिन्दावेव तद्भावनं तृतीयमिति । मनोर्मन्त्रस्यार्थानिनुसंदधानस्य
    विद्याया अर्णनामक्षराणामष्टपञ्चाशतो मध्य आद्यकूटद्वितयबिन्दादिनवकद्वयप्रहाणेना-
    वशिष्टानां चत्वारिंशतोऽक्षराणामुच्चारणं जपो जपपदवाच्यमित्यर्थः ॥ ५२ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘अवस्था’—अवस्थायें पाँच हैं—(१) जाग्रत (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति (४)
    तुरीय, (५) तुरीयातीत । ‘शून्य’—प्रणव रूप मन्त्र के बारह अङ्गों में प्रति द्वितीय
    अङ्ग शून्य कहलाता है । ‘विषुवन्ति’—सात विषुव हैं । यथा—‘प्राणविषुव’,
    ‘मन्त्रविषुव’, ‘नाड़ीविषुव’, ‘प्रशान्तविषुव’, ‘शक्तिविषुव’, ‘कालविषुव’ एवं ‘तत्त्व-
    विषुव’ । ‘चक्र’ नौ हैं—(१) त्रैलोक्यमोहन (२) सर्वाशापरिपूरण (३) सर्वसंक्षोभण
    (४) सौभाग्यदायक (५) सर्वार्थसाधक (६) सर्वरक्षाकर (७) सर्वरोगहर (८)
    सर्वसिद्धिप्रद (९) सर्वानन्दमय चक्र ॥
    ‘चक्राणि’ = १. ‘सकल’ २. ‘निष्कलं’ ३. ‘सकलनिष्कलं’ ॥ अकुल
    सहस्रार, मूलाधारादिपञ्चक, सूक्ष्मजिह्वा, भ्रूमध्य बिन्दु स्थान—नौ स्थानों में—
    त्रैलोक्यमोहनादि चक्र नवक भावन तो ‘सकल’ हैं । बिन्दादि उन्मन्यन्त चक्रों में
    उनका भावन ‘निष्कलं’ है । महाबिन्दु में उनका भावन ‘सकलनिष्कलं’ है ।
    मन्त्रार्थानुसंधानपूर्वक ‘वर्णों’ (अक्षरों), का उच्चारण ‘जप’ कहलाता है किन्तु उसके
    साथ अवस्था, शून्य, विषुव एवं चक्रों का भी ध्यान रखना, आवश्यक होता है ।
    ‘अर्थाश्च’—मन्त्रार्थ के प्रकार पन्द्रह हैं—(१) प्रतिपाद्यार्थ (२) भावार्थ (३)
    संप्रदायार्थ (४) निगर्भार्थ (५) कौलिकार्थ (६) रहस्यार्थ (७) महातत्वार्थ (८)
    नामार्थ (९) शब्दरूपार्थ (१०) नामैकदेशार्थ (११) शाक्तार्थ (१२) सामरस्यार्थ
    (१३) समस्तार्थ (१४) सगुणार्थ (१५) महावाक्यार्थ ॥
    ‘जप’—‘योगिनीहृदय’ में भी जप-विधान है—‘पुष्पाञ्जलिं ततः कृत्वा जपं
    कुर्यात् समाहितः ॥’१ इस ‘जप’ का लक्षण क्या है? ‘समाहितो नियतेन्द्रियों
    नादरूपमन्त्रोच्चारणलक्षणं जपं कुर्यात् ॥’ ‘मन्त्र’ नादरूपात्मक है । अतः
    नादोत्थानपूर्वक मन्त्राक्षरों का उच्चारण ही ‘जप’ है ।२
    ‘योगिनीहृदय’ में जप-विधान में भी शून्यषट्क, अवस्थापञ्चक एवं विषुव
    सप्तक के योग को महत्व दिया गया है—
    १. योगिनीहृदय २. अमृतानन्द—‘दीपिका’

२०६
भास्कराचार्य के अनुसार मन्त्र-जप का स्वरूप
परब्रह्म
शब्दातीत स्तर
'शब्द ब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति'
← ध्वन्यात्मक नाम (मन्त्र)
ध्वन्यात्मक मन्त्र (नाद)
परावाक् (शब्द ब्रह्म) चेतन शब्द
पश्यन्ती वाक्
मध्यमा वाक्
मन्त्र के अङ्ग = 'नाद' (९ नादों की समष्टि = 'नाद'):
उन्मना
↑
समना
↑
व्यापिका
↑
शक्ति
↑
नादान्त
↑
नाद
↑
निरोधिका
↑
अर्धचन्द्र
↑
बिन्दु
पिण्डस्थ चक्र:
आज्ञाचक्र
↑
विशुद्धाख्यचक्र
↑
अनाहतचक्र
↑
मणिपूरचक्र
↑
स्वाधिष्ठानचक्र
↑
मूलाधारचक्र
मन का यन्त्र के साथ ऐक्य
मन का मन्त्र के साथ ऐक्य
मन का आत्मा के साथ ऐक्य
मन का गुरु के साथ ऐक्य
मन का देवता के साथ ऐक्य
मन का देवी के साथ ऐक्य
मन का मन्त्रार्थ के साथ ऐक्य
मन का नाद के साथ ऐक्य
मन का शून्य के साथ ऐक्य
मन का अवस्थाओं के साथ ऐक्य
मन का विषुवों के साथ ऐक्य
मन का चक्र के साथ ऐक्य
मन का प्राण के साथ ऐक्य
वर्णात्मक मन्त्र
बैखरीगत मन्त्र
(जड़ शब्द)
जप के विभिन्न स्तर:
निस्पन्द निःशब्द (परब्रह्म)
सस्पन्द | शब्दब्रह्म | सशब्द
↑
परावाक्
↑
पश्यन्ती
↑
मध्यमा
↑
वैखरी
↑
↑
↑
वैखरी विश्व विग्रहा → विश्व
ऊर्ध्वारोहण का स्तर
जप के विभिन्न स्तर →
अजपा जप
मानस जप
उपांशु जप
वैखरी जप
मन्त्र
↑
नाद
↑
वर्णोच्चारण

प्रथमोऽंशः २०७
‘शून्यषट्कं तथा देवि! ह्यवस्थापञ्चकं पुनः ॥ १०६ ॥
विषुवं सप्तरूपं च भावयन् मनसा जपेत् ॥¹
जप के अङ्ग
५ अवस्थाएँ ६ शून्य ७ विषुव ९ चक्र १५ मन्त्रार्थ वर्णोच्चारण
आदि विद्या के
आन्तरिक अङ्ग
विद्या के वर्णों की संख्या | उद्धार | काल (मात्रा) | उच्चारण | स्थान | प्रयत्न | रूप | विभिन्न आकार स्थितियाँ आदि
आदि विद्या के
बाह्य अङ्ग
ऋषि छन्द देवता विनियोग बीज शक्ति कीलक न्यास ध्यान नियम पूजा
‘मन्त्र’ = वाचक । देवता = (वाच्य) ॥
‘सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्रस्वरूपिणी’ (‘ललिता सहस्रनाम’) ‘परावाक्’
चैतन्यरूपा है—पराप्रत्यकचितिरूपा । पश्यन्ती परदेवता । मध्यमा वैखरी रूपा
भक्तमानस हंसिका ॥ (ल०स०) ‘मन्त्र’ अपने मूल स्वरूप में परावाक् के रूप में
रूपान्तरित हो जाते हैं इसीलिए मन्त्रों को चैतन्य की किरणें कहा गया है—
‘‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥’’ जहाँ चैतन्यत्व नहीं वहाँ मन्त्रत्व नहीं ।
१. ‘विज्ञान भैरव’ में जप की दृष्टि—‘विज्ञानभैरव’ में मन्त्राक्षरों के उच्चारण
की अखण्ड आवृत्ति को ही ‘जप’ का पर्याय स्वीकार न करके जप के वैज्ञानिक
स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है—
भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥ १४२ ॥²
१. योगिनीहृदय २. विज्ञान भैरव (शिव)

२०८ वरिवस्यारहस्ये
इस दृष्टि के अनुसार—'मैं ही ब्रह्म हूँ' मैं ही शिव हूँ, इस अनाहत नादरूपी
शब्द (सोऽहं, हंसः) की निरन्तर भावना ही 'जप' है ।
'स्वच्छन्दतन्त्र'१ में कहा भी गया है कि 'मैं इस जगत् का परम कारण परम
हंस, प्राणमय शिव हूँ'—इस प्रकार से अहर्निश स्वभावतः प्रवर्तमान अपने प्राणमय
अजपास्वरूप का विमर्श ही जप है । इसीलिए स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया है—
अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम् (४।३९९) । जपनीय मन्त्र भी स्वयं नादात्मक
ब्रह्म ही है । इसमें अपने अकृत्रिम अहमात्मक स्वरूप का निरन्तर परामर्श होता
रहता है—'स्वयं नादो मंत्रात्मा अकृत्रिमाहंविमर्शात्मा ।'
'श्रीकण्ठीसंहिता' में कहा गया है कि—'पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिध्यति
कदाचने' अर्थात् मन्त्र और मन्त्री (मन्त्र और मन्त्रजापक) तथा मन्त्र की अधिष्ठात्री
देवता—ये कभी पृथक् नहीं होते अतः इनको पृथक् मानकर जप करने से कभी
सिद्धि प्राप्त नहीं होती ।। जप का विषय नादात्मक मन्त्र ही है । इसमें साधक को
परम तत्त्व के साथ अपनी प्रत्यभिज्ञा की स्पष्ट प्रतीति होने लगती है ।
२. 'योगिनीहृदय दीपिका' में जप की दृष्टि२—इस ग्रन्थ के अनुसार इन्द्रियों
की बहिर्मुख प्रवृत्ति को रोककर आन्तर अनाहत नाद की निरन्तर भावना करना ही
जप' है —
“संयमेन्द्रिय सञ्चारं - प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्ता न तु बाह्य जपो जपः ॥”
ग्रन्थकार ने बाह्य जप को जप स्वीकार ही नहीं किया—'न तु बाह्य जपो
जपः । विकल्पात्मक विविध वर्णों के संघात से विनिर्मित मन्त्रों का बाह्योच्चारण
जप नहीं है ।
३. 'तन्त्रालोक' में जप की दृष्टि३—इस ग्रन्थ में कहा गया है कि 'तत्स्वरूपं
जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः ॥' अर्थात् 'उस परम कारण शिव का आत्मस्वरूप
ही जप है । भावाभाव (प्राणापान आदि गत्यात्मक) पद की सीमा को अतिक्रान्त
कर जाने की दशा (जहाँ चिदैक्य परामर्श हो) ही जप है—'“तस्य शिवस्य स्वरूपं
परावाक्स्वभावम् आत्मरूपम् अर्थात् भूयो भूयः परादृश्यमानं जपः अतएव
भावाभावपदच्युतः ॥ तन्मध्यस्फुरत्संवित्परामर्शमात्रसार इत्यर्थः ॥'४ शिव का
स्वात्मरूप परावाक् है । परावाक् का शाश्वत परामर्श ही जप है । इस परामर्श दशा
में भावाभावात्मक पद में स्थिति नहीं रहती प्रत्युत् मध्यावस्थान की दशा प्राप्त हो
जाती है । भाव एवं भावाभाव दोनों की स्थितियाँ सङ्कोचात्मक होती है अतः साधक
'इसका त्रोटन करता है और मध्य में विराजमान होता है । वहीं पर संवित् का
अमृत परामर्श होता है । यही अमृतात्मक परामर्श ही 'जप' है ।
१. स्वच्छन्दतन्त्र (४।३९९) २. योगिनीहृदय दीपिका (पृ० १९५)
३. तन्त्रालोक (१।९०) ४. जयरथ-'विवेक' (तन्त्रालोक टीका)

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Where is ण in the text?
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In line 6: निरोधनात् -> नात् has न and त्.
Line 8: पदच्युतः
Line 9: अनाहतनादमय -> ना
Line 10: दशाओं
Line 11: संविद् / संवित्
Line 12: विमर्शिनी -> र्शिनी
Line 13: अभिनवगुप्तपादाचार्य
Line 18: पहचान -> न
Line 22: परमकारणम् -> रणम् -> look at ण in परमकारणम्:
It is ण!
Now compare ण in

२१० वरिवस्यारहस्ये
अहोरात्र में २१ हजार छः सौ बार श्वास-प्रश्वास के माध्यम से जो श्वसन-क्रिया
सम्पादित करता है उसमें अपानवायु के साथ 'सकार' बाहर फेंकता है एवं 'हङ्कार'
के साथ प्राणवायु ग्रहण करता हुआ अहोरात्र 'हंसः' मन्त्र का जप किया करता
है—इस "हंसः हंसः हंसः हंसः" के स्वरूप वाले इस स्वाभाविक श्वासप्रश्वासात्मक
मन्त्र की आवृत्ति का नाम ही 'जप' है—यही मन्त्र उलट कर जपने से 'सोऽहं' बन
जाता है—
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः ।
हंस हंसेत्यतो मन्त्रं जपो जपति नित्यशः ॥
षट् शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः ।
जपो देव्या विनिर्दिष्टः सुलभो दुर्लभो जडैः ॥
यह जप स्वयमेव उच्चरित है—इसका कोई जापक नहीं है और न तो इस
जप का कोई प्रतिहन्ता ही है—
'नास्योच्चारयिता कश्चित्प्रतिहन्ता न विद्यते ।
स्वयमुच्चरते देवि प्राणिनामुरसि स्थितः ।।'
विश्वपूरण परभाव स्वस्वभाव में जो भावना (विमर्शना) भावित (संपादित) होती
है वही 'जप' है । यह जप अकृताहंविमर्शात्मा नाद है और इसका जप्य है
स्वात्मदेवता ।।
८. 'शिवसूत्रवार्तिक' में जप की दृष्टि—वार्तिककार वरदराज का कथन है
कि 'जनिपालनधर्मत्व के कारण' जिसे 'जप' कहा जाता है वह अकृत्रिम अहं के
आमर्श से परिप्लावित, स्वात्मावमर्शी, याथार्थ्यवादी, स्वात्मपरामर्श संपदा से युक्त
योगियों की 'स्वैरअभिलापात्मा कथा' है । वही योगीन्द्रविषया कथा 'जप' है—
अकृत्रिमाहमामर्शमयस्वात्मावमर्शिनः ।। १११ ।।
'या या स्वैराभिलापात्मा कथा याथार्थ्यवादिनः ।
भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।। ११२ ।।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ।। ११३ ।।
जनिपालनधर्मत्वाज्जप इत्यभिधीयते ।
अथेदृग्विधयोगीन्द्र विषयापि च या कथा ।। ११५ ।।
जपः सोऽपि जनस्योक्तो जनिपालन योगतः ।।"
'जयसंहिता' में कहा गया है कि "एक ही मन्त्रनाथ अन्तर और बाह्य दोनों
में उदित होकर एक हो जाता है तब उस 'जप' को लक्ष संख्या से भी अधिक
समझना चाहिए ।।" अर्थात् 'जप' मन्त्रनाथ के अन्तर एवं बाह्य में उदित होकर
एक हो जाने की प्रक्रिया की संज्ञा है ।
'तत्त्वरक्षाविधान' में कहा गया है कि "आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का '

प्रथमोंऽशः २११
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रियारहित है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग (मन्त्र जप) करना चाहिए वही मन्त्र सफल होता है ॥"
'श्रीवैहायसी' में कहा गया है कि—सन्धिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित
'जप' करना चाहिए । सूत्र में ग्रथित मणि के समान शक्ति के ताने बाने से
निर्मित मन्त्राक्षरों का ध्यान करते हुए जप करना चाहिए । वह शक्ति परम व्योम
में रहती है और परमामृत से समृद्ध है । उक्त रीति से 'जप' करने पर ही मन्त्र
अपने स्वरूप को प्रकट करता है अन्यथा अपने को गुप्त रखता है ।
'ध्यानं जपेन' (शाक्तदर्शन) कहकर आचार्य हयग्रीव ने कहा है कि जप का
ध्यान से एवं ध्यान का जप से सम्बंध है । आचार्य अगस्त्य ने जप का बंध-क्षय
से सम्बंध स्थापित करते हुए कहा है—'जपाद्बन्धो नश्यति ॥"
९. 'हंस पारमेश्वर' में जप की दृष्टि—'जप' वर्णों के उच्चारण की प्रक्रिया
नहीं है प्रत्युत् सुषुम्णा मार्ग में नादोच्चारण है । इसीलिए कहा गया है कि वर्णरूप
मन्त्र 'पशुभाव' में स्थित हैं और जब वे सुषुम्णामार्ग से उच्चरित होने लगते हैं तो
'पशुपति' बन जाते हैं"—
'पशुभावेस्थिता मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥
९. 'त्रिकसार' में जप की दृष्टि—'त्रिकसार' में कहा गया है कि चिच्छक्ति
के बल का स्पर्श न होने के कारण मन्त्रों के वर्ण जड़ अक्षर ही रहते हैं—
'चिच्छक्तिबला स्पर्शात् केवलं वर्णरूप मात्रा रूपत्वान्मन्त्रपुत्रिकाकरण निष्फल चेष्टा
भवन्ति ॥'१
वर्णातीत परतत्त्व के विदित हो जाने पर मन्त्राधिप भी मन्त्र के साथ मांत्रिक
के किङ्कर हो जाते हैं
विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किङ्करत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥२
तात्पर्य यह है कि चूँकि 'मन्त्र' चित्तत्त्व की रश्मियाँ हैं—
“मन्त्राश्चिन्मरीचयः”—अतः 'जप' जापक द्वारा चैतन्य तत्त्व के साथ तादात्म्यप्राप्ति
की एक प्रक्रिया है न कि जड़ अक्षरों की पुनरावृत्ति मात्र ॥
१०. 'स्पन्दप्रदीपिका' में जप की दृष्टि—आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्द प्रदीपिका'
में कहते हैं कि मन्त्र का 'बल' है निरावरण चित् का उल्लास । इसी बल को
लेकर मन्त्र सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । और उनमें
सर्वज्ञता आदि का बल समाविष्ट होता है 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः'
(स्पं० का २६)
१. स्पन्द प्रदीपिका २. त्रिकसार

२१२ वरिवस्यारहस्ये
'तद्बलं निरावरणचिदुल्लासरूपं परशक्त्याख्यमाक्रम्याधिष्ठाय मन्त्राः बीज पिण्ड
पद नामरूपा मननत्राणधर्मिणः सहजनादशक्त्युद्बोधदीप्तत्वात् । सर्वज्ञत्वादिना बलेन
श्लाघायुक्ता'—इसका अर्थ यह हुआ कि जब 'मन्त्र' नादशक्ति-उद्बोधित है तब
'जप' वह प्रक्रिया है जिसमें नादोत्थान हो एवं चित् का उल्लास हो ॥
११. योगसूत्रभाष्यकार व्यास की जप-दृष्टि—योगसूत्रकार पतंजलि कहते
हैं—'तज्जपस्तदर्थभावनम्' (१।२८) अर्थात् उस (प्रणव) का जप एवं उस प्रणव के
अर्थभूत परमात्मा की भावना करनी चाहिए ॥ ('प्रणवस्य जपः प्रणवाभिधेयस्य
चेश्वरस्य भावनम्')१ 'ओंकार को जपते हुए एवं ओंकार के अर्थ 'ईश्वर' की भावना
करते हुए योगी का चित्त एकाग्र होता है ।'२ 'विष्णुपुराण' में कहा गया है कि
ओंकार के पश्चात् योग-साधन एवं योग-साधन के पश्चात् जप करना चाहिए । जप
एवं योग की सिद्धि से परमात्मा का साक्षात्कार होता है—
“स्वाध्यायाद्योग मासीत योगात्स्वाध्याय मामनेत् ।
स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते ॥”
अर्थात् जपपूर्वक ईश्वरार्थभावना एवं भावनापूर्वक ओंकार का जप करना
चाहिए । ईश्वर-ध्यान से 'जप' को संपुटित करना चाहिए । सारांश—'जप' के बाद
योग एवं योग के बाद 'जप' विधेय है । ('भावन' = 'भावनं पुनः पुनश्चित्ते
निवेशनम्'—'तत्त्व वैशारदी' ।)३ प्रणव जप के साथ ब्रह्मध्यान (प्रणिधान) करना
चाहिए—'प्रणव जपेन सह ब्रह्मध्यानं प्रणिधानं' ।।४ प्रणवेन परंब्रह्म ध्यायीत नियतो
यतिः ।।” ईश्वर-प्रणिधान के दो भेद हैं—(१) 'अहं ब्रह्मास्मि', 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म',
तमेतमात्मानमोमिति ब्रह्मौणैकीकृत्य ब्रह्म चात्मनोमित्येकीकृत्य । (२) प्रकृति-पुरुष दोनों
का विलापन करके अपने अहं को ब्रह्मरूप समझना । (१) प्रथम प्रणिधान—
उपासना । (२) द्वितीय प्रणिधान—तत्त्वज्ञान ।।५
अर्धमात्रादि में जो प्रतिफलित चैतन्य है वही 'मन्त्र' है । इसीलिए
'मन्त्राश्चिन्मरीचयः' कहा गया है । 'जप करना' एवं 'जप होना'—इस द्विविध रूप
में जप द्विप्रकारी है—
१. 'जप करना'—वैखरी भूमि । वाचिक जप । उपांशु जप । मानसिक जप
२. 'जप होना'—(स्वाभाविक जप) (१) हृदय में जप, फिर (२) नाभि में
जप, फिर (३) मूलाधार में जप ।
(बाह्य जप में मन्त्राक्षरों का पृथक्-पृथक् उच्चारण रहता है—वह विकल्पमय
है—अतः वह मन्त्र नहीं है । मध्यमा में भूमि में मन्त्र नाद के साथ स्वतः ध्वनित
१-२. व्यास भाष्य ३. तत्त्व वैशारदी (वाचस्पति मिश्र)
४. योगवार्तिक (विज्ञान भिक्षु)
५. प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती-'जपसूत्रम्'—'भावन' का अर्थ भावना (चिन्तन करना)
नहीं है 'भावन' (होने देना) है ।

प्रथमोंऽशः २१३
हो उठता है । हृदय जप को ही मध्यमा मार्ग में प्रवेश समझना चाहिए क्योंकि इस
स्थिति में नाद अपने आप चलता रहता है । बाह्य जप में नाद-श्रुति नहीं होती ।
मध्यमा भूमि में जब नाद के साथ मन्त्र स्वभावतः ध्वनित होने लगे तब उसे
आन्तरिक जप समझना चाहिए ।) आभ्यन्तर नाद का उच्चारण होना ही जप का
प्रधान लक्षण है—
‘संयम्येन्द्रियग्रामं प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ॥’
‘जप के साथ मन्त्रावय व समूह में ६ शून्यों, ५ अवस्थाओं ७ विषुवों की
भावना भी करनी पड़ती है । ‘जप’—ध्वनि (व्यक्त एवं अव्यक्त) संख्या एवं भाव
(अर्थ) इन तीनों की त्रिपुरी है ।१
मन्त्र में चार बातें मुख्य हैं—(१) बीज (२) पिण्ड (३) पद (४) नाम ।
उनका धर्म है—मनन एवं त्राण । इन सभी का सम्बंध भी जप से है । जप के दो
प्रकार हैं—(१) बाह्य (२) आभ्यन्तर । बाह्यजप = वैखरीनाद का विलास ।
आभ्यन्तर जप = मध्यमा नाद का विलास ॥
‘शाक्तानन्दतरंगिणी’ में अक्षरों की आवृत्ति को ‘जप’ की आख्या दी गई है—
‘जपः स्यादक्षरावृत्तिः’ किन्तु जप की यह परिभाषा वास्तविक जप की नहीं है
क्योंकि वास्तविक जप की आवृत्ति करनी ही नहीं पड़ती प्रत्युत् उसकी आवृत्ति
अपने आप होती रहती है । .
जप के द्वारा देवता प्रसन्न होते हैं एवं उससे सिद्धि मिलती है—
“जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति ।
जपात्सिद्धिर्जपात्सिद्धिर्न संशयः ॥”
जप के भेद—‘स्वच्छन्दतन्त्र’ में जप के ६ भेद बताए गए हैं—(१) वाचिक
(२) मानस (३) यौगिक (४) योग वाचिक (५) योग मानसिक (६) वाङ्मानसिक
यौगिक ॥
१. जप का प्रथम रूप (वाचिक) = देवी का ध्यान करते हुए वाणी द्वारा
मन्त्रोच्चारण “वाचा केवलयोच्चार्य मन्त्र देवी विभाव्य च ।”
२. जप का द्वितीय रूप (मानस) = सावधान चित्त से देवी के रूप का
सम्यक् रीति से चिन्तन करते हुए मन्त्रानुसंधान ‘देव्या रूपं च संचित्य सावधानेन
चेतसा । मन्त्रस्याप्यनुसंधानं मानसं परिकीर्तितम् ॥’
३. जप का तृतीय रूप (यौगिक) = तीन स्थानों से क्रमशः तीन बीजों को
यथामार्ग चिन्तित करके उनका आरोहण करना ‘यौगिक जप’ है ।
१. जपसूत्रम् (प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती)

तृतीय विश्राम: नाद, बिन्दु, कला एवं मातृका-वर्ण मन्त्र-दर्शन

२१४ वरिवस्यारहस्ये
४. जप का चतुर्थ रूप (योग वाचिक) = लक्ष्य के भीतर मन को केन्द्रित
करके वाणी द्वारा जप करना योग वाचिक जप है ।
५. जप का पञ्चम रूप (योगमानसिक) = बीजानारोहण क्रम से मन के
द्वारा जप करना योग मानसिक जप है ।
६. जप का छठवाँ रूप (वाङ्मानसिक यौगिक) = यह अनुत्तम जप है ।
वाचिक जप—वाक् प्रवर्तन; मानस जप—श्री एवं योगसिद्धियों की प्राप्ति; वाङ्मानस
जप—वाग्ज्ञान, ऐश्वर्यसिद्धि अणिमादिक सिद्धियों की प्राप्ति ।१
जप और उसके अङ्ग—'एवमवस्था शून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्चषट् सप्त । न
व च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ।। 'जप' के साथ मन्त्रावयवों की
अनुविद्धता अपरिहार्य है । जैसे माला के मनकों को एकीकृत करने के लिए सूत्र
आवश्यक है उसी प्रकार भिन्न-भिन्न मन्त्राक्षरों को एकात्मता में पिरोने के लिए
मन्त्रावयव रूप सूत्र की आवश्यकता होती है । मन्त्रावयव रूप सूत्र में पिरोये
मन्त्राक्षरों का उच्चारण करना ही जप है इसीलिए भास्कराचार्य कहते हैं—
'एवमवस्था शून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्च षट् सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ।।'२
१. भास्कराचार्य के मत में जप के मूलभूत अङ्ग—आचार्य भास्कर कहते हैं
कि मन्त्राक्षरों के उच्चारण की आवृत्तियाँ मात्र ही 'जप' नहीं है बल्कि मन्त्रावयवों के
साथ मन्त्रोच्चारण 'जप' है उन्होंने मन्त्रावयवों को ही जप के अङ्ग के रूप में
स्वीकार किया है जो निम्न है—(१) छः शून्य (२) पाँच अवस्थायें (३) सात
विषुव (१८ अङ्ग) । सारांश यह है कि मन्त्र-जप के अवयवभूत अङ्ग निम्न हैं—
(क) मन्त्राक्षरों का 'उच्चारण'—'अणोच्चरणं तु जपः' (वरि० ५२)
(ख) मन्त्राक्षरों के 'अर्थचिन्तन' एवं मन्त्रार्थ—चिन्तन के साथ किया गया
मन्त्रोच्चारण—
“मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणां तु जपः ।।”
अर्थात् जप के साथ मन्त्रार्थ चिन्तन भी आवश्यक है । मन्त्रार्थ निम्न है—
'षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे । भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भाथैश्च कौलिकः ।
तथा सर्वरहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च । अक्षराथों हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।।'
'योगिनीहृदय' में मन्त्रार्थ के ये निम्न प्रकार है—(१) 'भावार्थ' (२) 'संप्रदायार्थ'
(३) 'निगर्भार्थ' (४) 'कौलिकार्थ' (५) 'सर्वरहस्यार्थ' (६) 'महातत्त्वार्थ' ।।३
२. आचार्य भास्करराय के मतानुसार मन्त्रार्थ—'योगिनीहृदय' में तो मात्र
मन्त्रार्थ के उक्त छः प्रकार ही बताए गए हैं किन्तु 'वरिवस्यारहस्यम्' में मन्त्र के
१. स्वच्छन्दतन्त्र २. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक ५२)
३. योगिनीहृदय

ेत".

Line 26:
है ।५ आचार्य वाचस्पति मिश्र कहते हैं कि 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' में 'तत्' का अर्थ
Wait, footnote marker '५' after "है ।".
"है ।५ आचार्य वाचस्पति मिश्र कहते हैं कि 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' में 'तत्' का अर्थ"

Line 27:
है—'तस्य प्रणवस्य'६ अर्थात् 'प्रणव का' । 'भावनं' का अर्थ है—'भावनं पुनः
Wait, footnote marker '६' after प्रणवस्य': "प्रणवस्य'६".
"है—'तस्य प्रणवस्य'६ अर्थात् 'प्रणव का' । 'भावनं' का अर्थ है—'भावनं पुनः"

Line 28:
पुनर्निश्चन्ते निवेशनम्' अर्थात् बार-बार चित्त में निवेशन ।७ प्रणव के जप के साथ
Wait, look at: "पुनर्निश्चन्ते" or "पुनर्निश्चेते"?
Let's zoom in on line 28:
"पु न र्नि श्च न्ते" or "पु न र्नि श्च े ते" or "पुनश्चित्ते"?
Wait! Let's examine the Sanskrit phrase:
In Vacaspati Mishra's Tattvavaisharadi on YS 1.28:

२१६ वरिवस्यारहस्ये
(ख) वाचस्पति मिश्र एवं विज्ञानभिक्षु का मत—वाचस्पति मिश्र कहते हैं
कि—'वाचकत्व' का अर्थ है प्रतिपादकत्व । अर्थात् 'तस्य वाचकः हि प्रणवः' में
'वाचक' पद—शब्द एवं अर्थ के स्वाभाविक संबंध को द्योतित करता है—
'स्वाभाविकः शब्दार्थयो संबंधः सङ्केतेन अस्मात् शब्दात् अयमर्थः ॥' यदि घर नहीं
है तो हजारों दीपों के प्रकाश से भी घर उपस्थित नहीं होगा इसी प्रकार ॐ एवं
उसके अर्थ (ईश्वरत्व) में जो सम्बंध है वह घर-दीपवत नहीं प्रत्युत् नित्य है ।१
अर्थात् मन्त्र एवं उसके मन्त्रार्थ में भी इसी प्रकार नित्य सम्बंध है । अतः मन्त्र के
साथ मन्त्रार्थ का चिन्तन न करना दोनों के नित्य सम्बंध की अवमानना है ।
आचार्य विज्ञानभिक्षु कहते हैं कि 'वाच्यवाचक भावं ज्ञात्वा' 'सह ब्रह्मध्यानं'
(वाच्य वाचक भाव ज्ञात करके एवं ब्रह्मध्यान के साथ) मन्त्र का जप करना
चाहिए ।।२ 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' एवं 'एकः समस्तं यदि हास्ति किंचित्तदत्त्युतो नास्ति
परं ततोऽन्यत् । सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेतदात्मस्वरूपं त्यज् भेदमोहम् ।। के
अनुसार प्रणवार्थ चिन्तन के साथ जप करना चाहिए ।।३
(ग) 'अवस्थाओं' एवं मन्त्रार्थों के ज्ञान के सहित मन्त्रोच्चारण जप है—
'अवस्थायें' क्या हैं? चेतना की निम्न अवस्थायें हैं—(१) जागृति (२) स्वप्न (३)
सुषुप्ति (४) तुरीय (५) तुरीयातीत ॥
(१) जाग्रत अवस्था—दस इन्द्रियों के द्वारा जागतिक व्यापार सम्पन्न कराने
वाली अवस्था ही 'जाग्रतअवस्था' है ।
(२) स्वप्नावस्था—जिस अवस्था में मन-बुद्धि-चित्त-अहङ्कार रूप आन्तर
करणचतुष्टय द्वारा व्यवहार सम्पन्न होता है उसे स्वप्नावस्था कहते हैं ।
(३) सुषुप्त्यवस्था—स्वप्न में विद्यमान अन्तःकारण की वृत्तियों का लय हो
जाने पर (इन्द्रियों के उपरमस्वरूप) जिस अवस्था का उदय होता है उसे सुषुप्ति
अवस्था कहते हैं ।
४. तुरीय अवस्था—स्वात्म चैतन्य के अभिव्यक्त के हेतुभूत नाद के
आविर्भाव को ही 'तुरीय' कहते हैं ।
५. तुरीयातीतावस्था—यह परमानन्दावस्था है । यह मन के वाणी के अतीत
अवस्था है । पञ्चावस्थाओं का अवस्थान इस प्रकार है—
(क) 'जाग्रतावस्था'—'अ'४ ⎤ 'अ' 'उ' एवं 'म' = जाग्रता, स्वप्न एवं
(ख) 'स्वप्नावस्था'—'उ'५ ⎥ सुषुप्ति के द्योतक हैं । अगले अवयव
⎦ 'तुरीय' एवं 'तुरीयातीत' के द्योतक हैं ।
१. योगवार्तिक (विज्ञानभिक्षु) २. तत्त्ववैशारदी
३. योगवार्तिक (विज्ञानभिक्षु)
४. इन्द्रियशक्यव्यवहतिरूपा या जागरावस्था
५. अन्तःकरणचतुष्कव्यवहारः स्वाप्निकावस्था

प्रथमोऽंशः २१७
(ग) ‘सुषुप्त्यवस्था’—‘म’१ ┐ सुषुप्ति भावना का स्थान भ्रूमध्य के बिन्दु
│ में हैं । यह बिन्दु हल्लेखा को ऊर्ध्व बिन्दु
┘ है ।
(घ) ‘तुरीयावस्था’२ ┐ अर्धचन्द्र, रोधिनी, और नाद इन तीन
┘ मन्त्रावयवों को तुरीयावस्था माननी चाहिए ।
(ङ) ‘तुरीयातीतावस्था’३ ┐ नादान्त से शक्ति, व्यापिनी एवं समना में
│ तथा उन्मना में तुरीयातीतावस्था है । उन्मना
┘ से परे कोई अवस्था है ही नहीं ।
अर्धमात्रा आदि में प्रतिकलित चैतन्य ही ‘मन्त्र’ है । मन की मात्रा जितनी ही
प्रसृत होती है मन का उतना ही अंश क्षुद्रतर होता जाता है और उसी अनुपात में
उतना ही चिदालोक शुभ्रतर होता जाता है । ‘बिन्दु’ मात्रा से मात्राहीन में जाने का
द्वार है । यहाँ ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुरी एकाकार है—यह निरालम्ब भाव का स्थान
है । मात्रा-भङ्ग के कारण अर्द्धमात्रा का उदय होता है ।
(घ) ‘अवस्था’, ‘मन्त्रार्थ’ के साथ ‘शून्य’-ज्ञान सहित मन्त्रोच्चारण ‘‘जप’’
है—‘जप’ का एक अङ्ग शून्य-ज्ञान भी है । बीजमन्त्र (ओंकार) के १२ अवयव
हैं । ज्योतिर्मय एकाकारता ही ‘शून्य’ है । द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम दशम एवं
द्वादश अवयव ‘शून्य’ कहलाते हैं । इनमें प्रथम पाँच शून्य ‘अवान्तर शून्य’ एवं
छठवाँ ‘महाशून्य’ कहलाता हैं ।
अ, उ, म, बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी समना
एवं उन्मना—प्रणवरूप महामन्त्र के ये ही बारह अवयव हैं । इनमें से प्रति द्वितीय
अवयव ‘शून्य’ कहलाता है । प्रथम पाँच शून्यों को तो निराकार कहना समीचीन
नहीं किन्तु छठवाँ शून्य निराकार है । भास्कर कहते हैं कि—तृतीय कूट के रेक,
बिन्दु, रोधिनी, नादान्त एवं व्यापिका में पाँच शून्यों की भावना करनी चाहिए और
उन्मनी में रूप शून्य महाशून्य की भावना करनी चाहिए ।। रेफ, बिन्दु, निरोधिनी,
नादान्त एवं नादान्त में पञ्च शून्यों की भावना करनी चाहिए । (दीपिका पृ०
३१२) । पाँचवे के बाद छठवें शून्य के रूप में उन्मनी को ग्रहण करना चाहिए ।
यह महाशून्य है और निराकार है । (दीपिका पृ० ३१२) जब तक मन जाग्रत
नहीं होता तब तक मन्त्र का मन्त्रत्व उदित ही नहीं होता सुषुम्ना का स्रोत चैतन्य
का प्रवाह है । मन को जगाकर ऊर्ध्वमुखी सुषुम्ना की धारा में डालना होगा । मन
को चेतन करके उठाना होगा । यह जाग्रत मन ही मन्त्र है इसीलिए ‘चित्तं मन्त्रः’
१. आन्तरवृत्तेर्लयतो लीनप्रायस्य जीवस्य । वेदनमेव सुषुप्तिश्चिन्तया तार्तीय बिन्दौ
सा ।—वरिवस्यारहस्यम्
२. तुर्यावस्था चिदभिव्यञ्जक नादस्य वेदनं प्रोक्तम् ।।
३. आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् । तुर्यातीतावस्था सा
नादान्तादिपञ्चके भाव्या ।।—वरिवस्यारहस्यम्

२१८ वरिवस्यारहस्ये
(शिवसूत्र) कहा गया है । मन का भागांश इस प्रकार है— (१) बिन्दु में १/२
मात्रा (२) अर्द्धचन्द्र में १।४ मात्रा (३) निरोधिनी में १।८ मात्रा (४) नाद में
१।१६ मात्रा (५) नादान्त में १।३२ मात्रा (६) शक्ति में १।६४ मात्रा (७)
व्यापिनी में १।१२८ (८) समना में १।१२८ मात्रा = बिन्दु से समना तक की
समस्त मात्राओं का जोड़ १ मात्रा है ।
(ङ) अवस्था, मन्त्रार्थ-विज्ञान, शून्य-ज्ञान एवं विषुवसप्तक के साथ
मन्त्रोच्चारण करना जप है ।
इन विषुवों का निम्न इस प्रकार है—(१) 'प्राणविषुव' (२) मन्त्रविषुव (३)
नाड़ीविषुव (४) प्रशान्तविषुव (५) शक्तिविषुव (६) कालविषुव (७) तत्त्वविषुव ॥
१. प्राणविषुव—प्राण, आत्मा एवं मन के संयोग को 'प्राणविषुव' कहते हैं ।१
२. मन्त्रविषुव—प्रथम कूट के नाद एवं व्यष्टि-समष्टि भेद से अनाहत से
आरम्भ करके ब्रह्मरन्ध्र तक उत्पन्न होने वाले नाद एवं चारों बीज तथा आत्मा की
नादमयी विभावना को 'मन्त्र विषुव' कहते हैं ।
३. नाड़ीविषुव—मूलाधार से उठने वाले नाद के उच्चारण से ब्रह्मरन्ध्र तक
षट्चक्रों की द्वादश ग्रन्थियों को सुषुम्ना के मार्ग से ही ग्रन्थियों का भेदन करता
हुआ नाडी, नाद एवं वर्णों का संयोग 'नाडिका विषुव' कहा जाता है ।
४. प्रशान्तविषुव—रेफ एवं कामकला (ई) एवं बिन्दु से आरम्भ करके ह्रीं के
नादान्त तक एक सूक्ष्मतर नाद उत्पन्न होता है । इस सूक्ष्मनाद का शक्ति के साथ
विलय की 'प्रशान्त विषुव' कहा जाता है ।
५. शक्तिविषुव—शक्ति के साथ लीन इस नाद की भावना को 'समना' में
लीन करनी चाहिए । इसे 'शक्तिविषुव' कहा जाता है—
समनागतमुन्मन्याभेते द्वे शक्तिकाल विषुवाख्ये ॥२
इसमें, शक्त्यन्तर्गतनादं समनायां भावयेल्लीनाम् ॥३
६. कालविषुव—उक्त नाद की भावना समना एवं उन्मनी में करना 'काल
विषुव' कहलाता है ।४
७. तत्त्वविषुव—ककार से उन्मना तक एवं अकुल से उन्मना तक प्रदेशों में
स्थित श्रीविद्याकूटों के अवयवों को व्याप्त करते हुए समस्त ३१७ त्रुटियों एवं साढे
तीन निमेषों को व्याप्त करता हुआ 'नाद' तत्त्व ज्ञान का कारण होता है । यह
शुद्ध चैतन्य की अभिव्यक्ति का मूल हेतु 'तत्त्व विषुव' कहलाता है ।५
१. प्राणात्ममानसानां संयोगः प्राणविषुवाख्याः ॥ (वरिवस्यारहस्यम् १।४३)
२. योगः प्राणात्म मनसां विषुवं प्राणसंज्ञितम् । (योगिनीहृदयम्)
३-५. वरिवस्यारहस्यम्

प्रथमोऽंशः २१९
(च) 'अवस्था', 'मन्त्रार्थ', 'शून्य', 'विषुव' के साथ 'चक्रों के ज्ञान के साथ
मन्त्रोच्चारण करना 'जप' है ।
अकुल सहस्रार-मूलाधार-स्वाधिष्ठान-मणिपूरक-अनाहत-विशुद्धाख्य । सूक्ष्म
जिह्वा; भ्रूमध्य एवं बिन्दुस्थान—इन नौ स्थानों में त्रैलोक्यमोहन आदि चक्रनवक
का भावन करना भी जप का एक अङ्ग है—
१. अकुल सुषुम्नामूल अरुण सहस्रदल कमल में—त्रिपुराधिष्ठित त्रैलोक्यमोहन
चक्र की भावना करना ।¹
२. वह्नि के आधाररूप चतुर्दल कमल में—त्रिपुरेशी से अधिष्ठित
सर्वाशापरिपूरक चक्र की भावना करना ।²
३. शाक्त स्वाधिष्ठान स्थित षड्दल कमल में—त्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित
सर्वसंक्षोभण चक्र की भावना करना ।³
४. नाभि प्रदेश में स्थित दशदलकमल में त्रिपुरवासिनी देवी से अधिष्ठित
सर्वसौभाग्यदायक चक्र की भावना करना ।⁴
५. अनाहत प्रदेश के द्वादशदल कमल में त्रिपुरा श्रीसमधिष्ठित सर्वार्थसाधक
चक्र की भावना करना ।⁵
६. विशुद्धचक्र के षोडशदल कमल में त्रिपुरमालिनी से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर
चक्र की भावना करना ।⁶
७. लम्बिकाग्र में तालूमूल के अष्टदलकमल में त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित
सर्वरोगहर चक्र की भावना करना ।
८. भ्रूद्वय के मध्य द्विदल पद्म में त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रद चक्र
की भावना करना ।⁷
९. इन्द्रात्मक ललाट के बिन्दु में महात्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय
चक्र की भावना करना⁸ ही जप के साथ 'चक्रभावन' की पद्धति है ।
चक्रभावना का यह विधान 'योगिनीहृदय' में भी प्रतिपादित किया गया है—
“अकुलादिषुपूर्वोक्त स्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥'⁹
आचार्य भास्कर का कथन है कि—'सङ्केतपद्धति' आदि ग्रन्थों में 'चक्रभावन'
के तीन प्रकार कहे गए हैं—(१) सकल (२) निष्कल (३) सकल निष्कल ॥
शून्य—'विज्ञानभैरव' के ३२वें श्लोकं में 'शून्यषट्क' एवं ४४वें श्लोक में
शून्य त्रय की भावना का उल्लेख है इसी प्रकार—'योगिनीहृदय' में भी 'शून्यषट्क'
एवं 'शून्यत्रय' का उल्लेख किया गया है—'शून्यषट्कं तथा देवि ह्यवस्था पञ्चकं
पुनः' 'शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरतः प्रिये ॥' शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं
१-९. अमृतानन्दनाथ—दीपिका

२२० वरिवस्यारहस्ये
विभावयेत ॥ (३।१७६-१७७) 'स्वच्छन्दतन्त्र' (४।२८९-२९६) में भी शून्यषट्कं
का उल्लेख पाया जाता है । योगिनीहृदयदीपिका में अमृतानन्दनाथ ने कहा कि छः
शून्यों के स्वरूप को 'विज्ञानभैरव' के ३२वें श्लोक से जानना चाहिए ।
'स्वच्छन्दतन्त्र' के अनुसार—(१) ऊर्ध्वशून्य (२) अधःशून्य (३) मध्य
शून्य-शून्यत्रय हैं । क्षेमराज ने—(१) शक्तिपद को—ऊर्ध्वशून्य (२) हृदय को अधः
शून्य एवं (३) कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र को 'मध्यशून्य' माना है एवं
'व्यापिनी' में चतुर्थ, 'समना' में पञ्चम एवं 'उन्मना' में 'षष्ठ शून्य' माना है ।
उन्होंने इन सभी सहेतुक शून्यों का त्याग करके 'सप्तम शून्य' (परमसूक्ष्म शून्य) में
लीन होने का विधान किया है । उन्होंने कहा कि शून्य दो प्रकार के हैं—(१)
अभावा