वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः २३९
| ३. 'सं' 'क' (तृतीय कूट) | उन्हीं तीन पदों एवं ६ वर्णों का बोध कराते हैं । |
| ४. द्वितीयएवं तृतीय कूटों के शेष वर्णों का उद्धार उपर्युक्त रीति से ही करना चाहिए ॥ | (त्रिपुरोपनिषद एवं देवी भागवत पुराण में गायत्री विद्या का ऐरम ही अर्थ किया गया है । ) |
| ५. द्वितीय कूटस्थ वर्णत्रय त्रिपदी गायत्री के समतुल्य है । | गायत्री त्रिपदी है । पदत्रय युक्ता है 'तत् = ब्रह्म । शिव ॥ 'तदिति परमात्मा' (श्रुति) |
| 'स'—गायत्री के 'सविता' का बोधक है । | 'स': सवितुः ॥ |
| 'क' ............ | 'वरेण्य' |
| 'ह' (तुर्य हकार) ......... | 'भर्गो देवस्य धी' का बोधक । धीत्यन्त गायत्री के अर्थ अर्थ-बोधक । |
| 'स क' (तृतीय कूट) | पञ्चमहाभूतादि एवं आत्मा |
| लकार एवं ह्रीं | |
आद्या श्रीविद्या ब्रह्म है । यही पञ्चदशीमन्त्र एवं गायत्री मन्त्र दोनों में
प्रतिपादित है । 'सर्वचैतन्यां तामाद्यां विद्यां च धीमहि । बुद्धिं या नः प्रचोदयात् ।'
यह भी समतुल्य दृष्टि रखने के कारण ध्यातव्य है ।
पञ्चदशीमन्त्र के वाग्भवकूट का अर्थ—आचार्य भास्करराय इसका समष्टिगत
अर्थ बताते हुए कहते हैं—
“एवं चायमर्थो गायत्र्याः प्रथमकूटस्य च संपन्नः—सर्वजगत्सिसृक्षारूप
कामनावान् कामेश्वरः जगत्कारणरूपा कामेश्वरी” शिवः सर्वान्तर्यामी सर्वाधारः
पञ्चमहाभूताद्यात्मना परिणतः परवस्तुमात्र विषयक निर्विकल्पकज्ञानजनको निरञ्जनो
निर्गुणो वेदैर्लक्षणया गम्यः शक्त्या त्वगम्यो ब्रह्म विष्णु रुद्रात्मा परतत्वमिति ॥”१
द्वितीयतृतीयकूटयोरर्थमाह—
त्रिपदी त्रिवर्णबोध्या तुर्यस्तदुपरीषदक्षरीगमकः ।
अथ तार्तीये वर्णद्वितयं त्रिपदीषदक्षरीगमकम् ॥ ६२ ॥
(पञ्चदशी एवं गायत्री मन्त्र के वर्णों का अन्तर्संबन्ध)
अक्षरत्रय (ह स क) द्वारा (गायत्री मन्त्र के) तीन वर्णों (तत् सवितुः वरेण्यं)
को (उनके वाचक के रूप में) जानना चाहिए । चतुर्थाक्षर (ह) परवर्ती छः वर्णों
(भर्गो देवस्य धी) का बोधक है ॥ तृतीय कूट के वर्णद्वय (स क) उन्हीं तीन पदों
एवं छः वर्णों को सङ्केतित करते हैं ॥ ६२ ॥
- प्रकाश *
त्रिपदी गायत्रीस्थं पदत्रयं विद्याद्वितीयकूटस्थवर्णत्रयेण बोध्यम् । त्र्यवयवका
वर्णास्त्रिवर्णाः । 'त्रिगुणसचिवः', 'नवरसरुचिराम्', इत्यादिवत् समासः । तत्पदार्थो