वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ वरिवस्यारहस्ये
शक्तिरेकारेण महाभगगेन प्रसूते |
तस्मादेकार एव गृह्यते ।। |
३. 'ई' = सर्वान्तर्यामी, सर्वाधारशक्ति | 'भर्गो देवस्य धी' = सर्वान्तर्यामी,
| सर्वपोषकशिव ।। 'देव' = सर्वान्तर्यामी
| 'धी' = जगदाधार ।। भर्ग = शिव ।
| ब्रह्मा । आदिम तेज ।। 'धी' में भी
| ईकार स्थित है । 'ई' = तुरीय ।। 'धी'
| = तुरीय ।।
४. 'ल' = पृथ्वी ।। (लकार पृथ्वी | धीमहि ।। मही = पृथ्वी ।। 'मही'—
बीज है ।) ('भूमण्डल मेवोक्तं लकारेण' | महत्व के कारण या काठिन्य के कारण
—श्रुति) | पृथ्वी मही कही जाती है । = 'मही'
| = ५ भूतों का उपलक्षण ।।
५. 'ह्रीं' (माया) । ह = हृदय ।। ही | 'धियो योनः प्रचोदयात्' हम लोगों के
= प्रणव = ब्रह्मा-विष्णु-महेश = (अ) | ध्यान को निष्प्रपञ्च विषय में प्रेरित
(उ) (म) ।। 'हृदयागारवासिनी हृल्लेखा' | करें ।'
(श्रुति) 'इ गतौ' धातु + 'इट किट |
कटी गतौ' |
प्रथमकूट का अर्थ—समस्त जगत् की सृष्टि करने की इच्छा रखने वाला
सिसृक्षारूप कामेश्वर जगत्कारणरूपा कामेश्वरी, शिव, सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार,
पञ्चमहाभूतादि के रूप में परिणत, परवस्तु मात्र विषयक निर्विकल्पक ज्ञान जनक
निरञ्जन निर्गुण वेद-प्रोक्त लक्षणों से गम्य शक्ति के द्वारा अगम्य ब्रह्म विष्णु रुद्रात्मा
परतत्व है ।'
द्वितीय कूट एवं तृतीय कूट | गायत्री मन्त्र
पञ्चदशीमन्त्र |
१. 'ह' 'स' 'क' । | 'तत् सवितुः वरेणं'
२. 'ह' | 'भर्गो देवस्य धीः'
१. ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध स्मृताः ।। (गीता) 'तदिति ब्रह्म
शाश्वतम्' (श्रुति) तत् = 'ब्रह्म' ।। 'क' = ब्रह्म ।। 'कं ब्रह्म' (श्रुति) कामयत इति । कम
(औणादिक) + उः = काम ।। 'कामयते कामी जायते स एव निरंजनोऽकात्वेनोज्जृंभते-
कामोऽभिधीयते । तत्परिभाषायां कामः ककारं व्याप्नोति ।।' (श्रुति) 'काम' = कामेश्वर ।।
'सवितुः' = तु प्रत्यय ।। सवितां प्राणियों के प्रसव का कारण अर्थात् योनि । ऐसा होने
के कारण वह सामान्य तो है नही अतः 'वरेण्य' कहा गया । वरेण्य = श्रेष्ठा भजनीय ।
सविता = कामेश्वरी ।।