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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 530 में से

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पृष्ठ 324

द्वितीयोंऽशः
जपलक्षणशरीरघटकत्वेन
'यदधीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते ।
अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥'
इत्यर्थज्ञानरहितशब्दोच्चारणस्य निन्दया पापानुमानाच्चार्थज्ञानमावश्यक-
मित्याह—
नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥ ५४ ॥
अर्थमजानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ ५५ ॥
(अर्थ-ज्ञान-शून्य अनुष्ठित जप की व्यर्थता)
अर्थ का सम्यक् ज्ञान हुए बिना शब्दोच्चारण कोई फल नहीं देता । (यथा)
अग्निशून्य भस्म में समर्पित हविष्य नहीं जल पाता ॥ ५४ ॥
अर्थ को न जानते हुए भी विविध प्रकार के शब्दमात्र का पाठ करने वालों
की उपमा चनदन के भार को ढोने वाले (किन्तु चन्दन के गुणों को न जानने
वाले) गर्दन से ही दी जा सकती है ॥ ५५ ॥
* प्रकाश *
चक्रीवान् गर्दभः । यद्यपि 'यथा खरश्चन्दनभारवाही' इति श्रुतौ खरस्यैवोप-
मानता, तथापि सादृश्यनिरूपकगुणाधिक्यवत एवोपमानत्वात् तदाधिक्यव्यञ्जनाय
प्रतीपालङ्कार इवोपमानोपमेययोर्व्यत्यासः ॥ ५४-५५ ॥
* सरोजिनी *
'नार्थ............फलति'—अर्थज्ञान के अभाव में किसी भी मन्त्र का जप
फलीभूत नहीं होता । चूँकि प्रत्येक मन्त्र-जापी अपने देवता के साक्षात्कार को ही