वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
प्रथम विश्राम: पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का वाच्यार्थ एवं अधिदैविक अर्थ
८४ वरिवस्यारहस्ये
नहीं हुआ तो कठोर अध्यवसाय करने पर भी वे कठपुतली के समान निष्फलचेष्ट
ही रहते हैं क्योंकि चिच्छक्ति के बल के स्पर्श न होने पर वे केवल वर्णमात्रा
अर्थात् जड़ अक्षरमात्र रह जाते हैं ।।"
‘हंसपारमेश्वर’ में कहा गया है कि—“केवल वर्णरूप मन्त्र ‘पशुभाव’ में स्थित
है । सुषुम्णामार्ग से उच्चारण करने पर वे ‘पशुपति’ हो जाते हैं ।
‘तत्त्वरक्षाविधान’ में कहा गया है कि—“आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रियाशून्य है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए । वहीं जप सफल होता है ।”
‘श्रीवैहायसी’ में कहा गया है कि नादोर्ध्वध्वनि से बोधित जप करना चाहिए ।
शक्ति के ताने-बाने से हुए मन्त्राक्षरों का ध्यान करना चाहिए । उक्त रीति से जप
करने पर ‘मन्त्र’ अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है ।
उत्पलाचार्य कहते हैं कि साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं । जब
शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप किया
जाता है तो वह लक्ष बार किए गए जप के समान हो जाता है ।
‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है—
“तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥”
‘मालिनीविजय’ का मत है कि—जिस अवस्था में जीत अन्याधार—विनिर्मुक्त
होकर स्वरूप में लीन होता है वही सम्पूर्ण मन्त्रों की उत्पत्ति का क्षेत्र है ।
‘चित्तं मन्त्रः’, ‘कथा जपः’—कहकर ‘शिवसूत्र’ में ‘मन्त्र’ एवं ‘जप’ की
अवधारणा को अत्यधिक वैज्ञानिक, यथार्थपरक, व्यावहारिक एवं बाह्याडम्बर तथा
बाह्याचार-विनिर्मुक्त करने का प्रयास किया गया है । भास्करराय ने भी यही प्रयास
किया है । ‘कुलार्णवतन्त्र’ में भी इसी दृष्टि को उपन्यस्त करते हुए साधकों से
प्रश्न किया गया है कि—
जिह्वादग्धा परान्नेन हस्तौ दग्धौ प्रतिग्रहात् ।
मनोदग्धं परस्त्रीभिः कार्यसिद्धिं कथं भवेत् ?॥
अर्थात् इन विपरीत परिस्थितियों में—‘मन्त्रसिद्धिं कथं भवेत् ?’
——— 🙤 ☸ 🙦 ———
विषयानुक्रमणिका
पृ०सं०
दो शब्द ५-९
प्राक्कथन ११-८४
उपोद्घात
१. भास्करराय और उनका आविर्भाव काल १२
२. भास्करराय की रचनाएँ १४
३. भास्करराय का जीवन-परिचय १५
४. भास्करराय की दार्शनिक दृष्टि २१
५. ‘वरिवस्यारहस्यम्’—एक विहंगमावलोकन २६
प्रथमोऽंशः
विषय श्लो० पृ०सं०
ग्रन्थकार का भगवान् नृसिंह से उनकी भक्ति-प्राप्ति
हेतु निवेदन १ १
ग्रन्थकार का विद्योपासक विद्वत्समाज के प्रति
आत्मनिवेदन २ २
प्रकाशस्वरूप परमशिव की महत्ता ३ ३
विमर्श शक्ति और उसकी महत्ता ४ ११
‘परिणामवाद’ एवं चतुर्विधा सृष्टि ५ २८
विमर्श शक्ति के परिज्ञान के उपाय ६ ६६
गायत्री के दो रूप ७ ७०
श्रीविद्या की गोपनीयता ८ ७६
कूटत्रय का स्वरूप ९-११ ८०
हल्लेखा का स्वरूप १२ ८९
नाद और उसका स्वरूप १३ ८९
८६ वरिवस्यारहस्ये
कूटत्रय में वर्ण संख्या १४ १२२
'कामकला', 'त्रिकोण' एवं 'हल्लेखा' का उच्चारणकाल १५-१६ १२३
नाद, वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूट
का मात्रा-काल १७-१८ १३७
मन्त्राक्षरों के उच्चारण-स्थान १९ १३८
प्रथम कूट एवं द्वितीय का स्वरूप २०-२१ १४०
नाद एवं बिन्दु का स्वरूप २२ १४७
अर्द्धचन्द्र एवं रोधिनी का स्वरूप २३ १४७
नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना
का स्वरूप २४-२७ १४७
नादोच्चारण की प्रक्रिया २८-३० १४७
कूटत्रय का उच्चारण-काल ३१ १६४
कूटत्रय में बीज चतुष्टय ३२ १६५
बीज चतुष्टय ३३-३४ १६५
ब्रह्मादिक देवत्रय एवं उनकी शक्तियों
की मन्त्राक्षररूपता ३५-३६ १६८
जागृतावस्था और रेफस्थ प्रकाश के
अंतर्संबंध का प्रतिपादन ३७ १८०
वप्नावस्था एवं मन्त्राक्षर 'ई' में स्थित प्रकाश के
अंतर्संबंध का विवेचन ३८ १८१
सुषुप्ति का स्वरूप ३९ १८२
तुरीयावस्था का स्वरूप ४० १८२
तुर्यातीतावस्था का स्वरूप ४१ १८४
बिन्दु एवं पञ्चशून्य-अन्तर्संबंध ४२ १८६
महाशून्य की भावना एवं 'प्राणविषुव' का स्वरूप ४३ १८६
'मन्त्रविषुव' का स्वरूप ४४ १९०
नाडिकाविषुव' का स्वरूप ४५-४६ १९२
प्रशान्तविषुव' का स्वरूप ४७ १९९
'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' का स्वस्वरूप ४८ २००
विषयानुक्रमणिका ८७
'तत्त्वविषुव' का स्वरूप ४९-५१ २०३
जप का लक्षण ५२ २०४
ग्रन्थ के पूर्वांश की समाप्ति की अनुज्ञप्ति ५३ २२०
द्वितीयोंऽशः
अर्थ-ज्ञान-शून्य अनुष्ठित जप की व्यर्थता ५४-५५ २२२
मन्त्रार्थों का परिज्ञान आवश्यक क्यों? ५६ २२३
अर्थों के विभिन्न भेद ५७-५९ २२५
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र के मन्त्राक्षरो के अर्थ
में साम्य का प्रतिपादन ६० २२९
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशीमन्त्र के वर्णों
की परस्पर वाचकता ६१ २३६
पञ्चदशी एवं गायत्री मन्त्र के वर्णों का अन्तर्संबन्ध ६२ २३९
कूटद्वय के शेष अक्षरों के उद्धार की प्रक्रिया एवं
गायत्री विद्या की अर्थ-पद्धति ६३ २४१
युगलत्रय, कूटत्रय एवं ईकारत्रय—एक विवेचन ६४-६५ २४१
मिथुनत्रय एवं कूटत्रय में अंतर्संबंध ६६ २४६
पञ्चदशाक्षरी विद्या का स्वस्वरूप ६७ २४८
परात्परशक्ति का सप्त शक्तियों एवं छत्तीस तत्त्वों से
तादात्म्यभाव ६८ २४८
अकार एवं हकार की ब्रह्मरूपता ६९ २५४
सिसृक्षुब्रह्म की सृजन-प्रक्रिया ७० २५४
'विसर्ग', 'काम' एवं 'रति' का स्वरूप ७१ २५५
शाब्दीसृष्टि एवं आर्थी सृष्टि का मूल कारण ७२ २५५
'भावार्थ' का स्वरूप ७३ २५५
ह क र स ल—वर्ण तथा इनका पञ्चभूतों से
सम्बन्ध एवं संप्रदायार्थ ७४ २६४
वर्णों द्वारा गुणोत्पत्ति एवं कामकला द्वारा
स्पर्शोत्पत्ति का प्रतिपादन ७५ २६८
८८ वरिवस्यारहस्ये
वर्ण एवं उनके अर्थ में तादाम्यभाव ७६ २७०
ककारत्रय एवं 'सकल', 'प्रलयाकला तथा
'विज्ञानाकल' की अभेदात्मकता ७७ २७२
अकार एवं जीवों में अभेदात्मकता तथा एकार
का विद्यागत महत्त्व ७८ २७३
बिन्दुत्रय के साथ रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव की
अभेदात्मकता तथा शान्ति, शक्ति एवं शम्भु की
नाद के साथ अभेदात्मकता ७९ २७५
महाविद्या एवं सैतिस तत्त्वों में अभेदात्मकता
का प्रतिपादन ८० २७६
सम्प्रदायार्थ का स्वरूप ८१ २८०
'निगर्भार्थ' का स्वरूप ८२ २८२
देवी की गणेशरूपता ८३ २८३
देवी की ग्रहरूपता का प्रतिपादन ८४ २८४
देवी की नक्षत्र-रूपता का प्रतिपादन ८५ २८५
देवी की योगिनीरूपता ८६ २८६
देवी की प्राण, जीव एवं राशि के साथ तदात्मकता ८७ २८८
श्रीविद्या की कूटत्रयात्मकता एवं वाक्चतुष्टयात्मकता ८८ २८९
श्रीविद्या की ग्रहरूपत्मकता एवं नक्षत्ररूपात्मकता ८९ २९०
श्रीविद्या की योगिनीरूपात्मकता एवं राशिरूपात्मिकता ९० २९२
पंचदशी विद्या एवं देवी में अभेदात्मकता ९१ २९४
श्रीचक्र की ग्रहरूपत्मकता ९२ २९६
श्रीचक्र की नक्षत्ररूपता ९३ २९८
श्रीचक्र की योगिनीरूपात्मकता ९४ २९८
श्रीचक्र की राशिरूपता का प्रतिपादन ९५ ३००
पंचदशीविद्या के वर्णों के साथ चक्रों की एवं
चक्रों के साथ देवी की अभिन्नता का प्रतिपादन ९६ ३०१
वर्णमाला एवं पीठों में समानता ९७ ३०७
गणप, ग्रह, भ आदि के साथ पचपन
पीठों की एकात्मता ९८ ३०८
विषयानुक्रमणिका ८९
विद्याक्षरों द्वारा चक्रोत्पत्ति-प्रक्रिया ९९-१०० ३१०
'गुरु' की देवी, विद्या, एवं चक्र के साथ अभिन्नता
एवं गणेश के साथ अभेदात्मकता का प्रतिपादन १०१ ३१२
'कौलिकार्थ' का स्वरूप १०२ ३१४
कुलकुण्डलिनी का स्वरूप एवं मूलस्थान १०३-१०६ ३१६
कुलकुण्डलिनी एवं श्रीविद्या का रहस्यार्थ १०७ ३२४
श्रीविद्या के 'महातत्त्वार्थ' का स्वरूप १०८-१०९ ३४३
'नामार्थ' एवं 'शब्दरूपार्थ' का स्वरूप ११० ३४४
देवी के नाम एवं मन्त्राक्षर १११-११२ ३४७
शक्तिसमूहार्थ का स्वरूप ११५ ३५१
प्रथमकूट के छः वर्णों, तीन दम्पतियों एवं
कामकला में अभिन्नता का प्रतिपादन ११६ ३५४
शाक्तार्थ का स्वरूप ११७-११८ ३५७
श्रीविद्या के सामरस्यार्थ का स्वरूप ११९ ३५८
सामरस्यार्थ का स्वरूप १२० ३६०
'ककार' एवं 'एकार' का अर्थ १२१ ३६१
मन्त्राक्षर 'क' 'ए' एवं 'ई' का अर्थ १२२ ३६३
लहरी, ह, क, ई, स, म कूटत्रय एवं ह्रीँ
आदि का रहस्यार्थ १२३-१३० ३६४
सिद्धों द्वारा स्थापित मन्त्रार्थों की व्याकरण द्वारा
पुष्टि की अनिवार्यता का प्रतिपादन १३१-१३२ ३६६
मन्त्र के 'समस्तार्थ' के स्वरूप का विवेचन १३३ ३६७
सगुणार्थ का स्वरूप १३४-१३६ ३६८
ह स क ह ल का अर्थ १३७-१३९ ३७०
तृतीयकूट एवं सगुणार्थ के स्वरूप का विवेचन १४० ३७१
मन्त्रगत 'ककार', 'एकार' एवं 'अकार' की त्रिदेवों
से तदात्मता का प्रतिपादन १४१ ३७१
पंचदशी मंत्रगत 'ह स क ह ल' के अर्थ का विवेचन १४३ ३७३
तृतीयकूट द्वारा जीवब्रह्मैक्य की स्थापना का प्रतिपादन १४४ ३७३
१० वरिवस्यारहस्ये
मन्त्रगत 'स क ल' पद का अर्थ १४५ ३७३
'स' 'क' 'ल'—मन्त्राक्षर का अर्थ १४६ ३७३
मन्त्रार्थ विषयक सर्वमान्यता का प्रतिपादन १४८ ३८०
भावार्थादिक अर्थ-प्रकारों का महत्त्व १४९ ३८१
मन्त्र के अर्थ के निर्णय के विषय में भगवान् शिव
के वचनों की निर्णायक भूमिका का प्रतिपादन १५० ३८२
शब्द के अर्थग्रह में ईश्वरेच्छा की भूमिका १५१ ३८२
वर्ण एवं उनके अर्थ का अन्तर्संबंध १५२ ३८२
अनेकार्थी शब्दों से विशेषार्थ-ग्रहण के कारक तत्त्व १५३ ३८३
मन्त्रार्थ की दिशा में विशेषक की अपेक्षा
सर्वबोध का प्रतिपादन १५४ ३८४
मन्त्र एवं वाक्य अन्तर्संबंध १५५ ३८५
मन्त्र-विनियोग की दो दिशाएँ १५६ ३८६
'निगमन' के प्रमाणार्थ मुख्योपाय १५७ ३८६
अलौकिक अपूर्व प्रयोजन १५८ ३८७
श्रीविद्या की उपासना के आन्तरिक अङ्ग १५९ ३८८
श्रीविद्या के बाह्य अङ्गों का विवेचन १६०-१६१ ३८८
श्रीविद्या की उपासना में आन्तरिक अङ्ग की प्रधानता १६२ ३९४
बाह्याडम्बरोपासना का खण्डन १६३ ३९६
कामकला बीज से मूलमन्त्र एवं मूलमन्त्र से शरीर के
बाह्य एवं आन्तरिक विकास का विवेचन १६४ ३९९
'श्रीविद्या' की गुरु-परम्परा से प्राप्ति की अनिवार्यता १६५ ४०१
गुरु-चरणों की वन्दना १६६ ४०२
प्रस्तुत ग्रन्थ-प्रणयन के पीछे गुरु-कृपा का प्रतिपादन १६७ ४११
श्लोकार्धानुक्रमणिका ४१५-४२१
—*—
॥ श्रीः ॥
श्रीभास्कररायमखिना प्रणीतं
वरिवस्यारहस्यम्
'प्रकाश'-संस्कृतव्याख्यानम् 'सरोजिनी'-
हिन्दीव्याख्यया च सहितम्
प्रथमोऽंशः
───※───
विद्यानां च मनूनां मनुसंख्यानां च विद्यानाम् ।
उपदेष्टा जयतितरां नरसिंहानन्दनाथगुरुः ॥ १ ॥
वरिवस्यारहस्याख्यो ग्रन्थो यः स्वेन¹ निर्मितः ।
तत्र दुर्घटशब्दानामर्थः संक्षिप्य कथ्यते ॥ २ ॥
'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्', 'आचार्यवान् पुरुषो वेद' इत्यादिश्रुत्या
गुरूपसदनस्य तत्त्वज्ञानजनकत्वात् प्रथमं सकलमन्त्राधिष्ठातृदेवतापररूपं गुरुं श्लेषेण
तद्दैवतं नरसिंहं च विघ्नविघाताय स्तुवन् सम्प्रदायं तदाज्ञयैव प्रवर्तयति—
प्रह्लादाभीष्टदाने विबुधसमुदयस्तूयमानापदाने-
ऽशेषक्षोणीभृदन्तः प्रविलसितपदाहोबलक्षेत्रगर्भात् ।
प्रादुर्भूते हिरण्यद्विरदमतिमदध्वान्ततन्त्रं निहन्तुं
धीरे सच्छास्त्रयोनौ मम भुवनगुरावस्तु भक्तिर्नृसिंहे ॥ १ ॥
(भगवान् नृसिंह से उनकी भक्ति की प्राप्ति हेतु निवेदन)
प्रह्लाद को स्वेच्छित पदार्थों का दान देने वाले, देव-समूह द्वारा संस्तुत विक्रम
वाले, समस्त नृपतियों के मध्य सुशोभित चरणों वाले, अहोबल संज्ञक क्षेत्र के
मध्य अहोवल की पत्नी के गर्भ से समुत्पन्न हिरण्यकशिपुरूपी मदान्ध हाथी की
हत्या करने में धैर्यवान्, श्रेष्ठ एवं शुभ शास्त्रों के मूल केन्द्र एवं समस्त भुवनों के
गुरु नृसिंह में मेरी भक्ति (सुदृढ़) हो ॥ १ ॥
१. यस्तेन (?)
२ वरिवस्यारहस्ये
- प्रकाश *
प्रह्लादाख्यो दैत्यः, तदभीष्टानां दानं यस्मात्; पक्षे प्रकृष्टो ह्लादो ब्रह्मानन्दः, तस्य,
अभीष्टानां धर्मार्थकामानां च दानं यस्मात्; तस्मिन् । विबुधानां देवानां पण्डितानां च
समुदायेन समुदायेन स्तूयमानमपदानं पूर्वचरित्रं यस्य तस्मिन् । ‘अपदानं कर्म वृत्तम्’
इत्यमरः । हिरण्याख्यो योग्यतया हिरण्यकशिपुः, नामैकदेशे नामग्रहणात्; स एव
द्विरदः, सिंहवध्यत्वात्; तम् । कीदृशं तम् ? अतिशयितमद एवाऽज्ञानपरिणामत्वाद्
ध्वान्तम्, तत्तन्त्रं तदधीनम्, मदपरवशमिति यावत्; पक्षे हिरण्यं धनोपलक्षणम्, द्विरदाः
सेनाङ्गोपलक्षणम्, मतिरसचच्छास्त्रज्ञानम्, तत्सम्बन्धी मदो येषां ॰ तेषां ध्वान्तानां
ध्वकारोऽन्ते येषां नाम्नि तेषां माध्वानां तन्त्रं शास्त्रं निहन्तुं शेषक्षोणीभृतः शेषाचल-
स्यान्तः प्रविलसितं शोभमानं पदं स्थानं यस्याहोबलाख्यक्षेत्रस्य, तस्य गर्भान् मध्यात्,
पक्षे, अशेषाणां समस्तानां क्षोणीभृतां राज्ञां मध्ये प्रविलसिते पदे चरणौ यस्य
अहोबलाख्यस्य पुरुषधौरेयस्य, तस्य क्षेत्रं पत्नी, तस्या गर्भात्, प्रादुर्भूते; धीरे
धैर्यशालिनि, पक्षे धियं रातीति धीरः पण्डितस्तस्मिन्; सतां शास्त्राणां योनिः कारणम्,
‘यस्य निःश्वसितं वेदाः’, ‘छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात्’ इत्यादि श्रवणात्; सच्छास्त्राण्येव
योनिर्ज्ञापकहेतुर्यस्येति वा, ‘तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि’ इति श्रवणात्, शास्त्रयो-
नित्वाधिकरणे द्वेधापि व्याख्यानात्; पक्षे सच्छास्त्राणां योनिः कर्ता, ग्रन्थकर्तेति यावत्;
तस्मिन् भुवनगुरौ नृसिंहे नरकेसरिणि, नृसिंहनामके च मम भक्तिरस्त्विति प्रार्थना ।
अत्रोपमेयोपमाया उपमाया अभेदस्य वा ध्वनिः । श्लेषोऽलङ्कारः । सोऽपि च
प्रकृतोभयविषयकः सभङ्गोऽभङ्गश्च । स्रग्धरा वृत्तम् ॥ १ ॥
आ प्राचः कामरूपाद् द्रुहिणसुतनदप्लावितादा प्रतीचो,
गान्धारात्१ सिन्धुसान्द्राद्रघुवरचरितादा च सेतोरवाचः ।
आ केदारादुदीचस्तुहिनगहनतः सन्ति विद्वत्समाजा,
ये ये तानेष यत्नः सुखयतु समजान् कश्चमत्कर्तुमीष्टे ॥ २ ॥
(ग्रन्थकार का विद्योपासक विद्वत्समाज के प्रति आत्म निवेदन)
प्राची दिशा में ब्रह्मपुत्र (नामक) नद से आप्लावित कामरूप तक, पश्चिम
दिशा में सिन्धु नदी से आप्लावित गान्धार देश तक, दक्षिण दिशा में भगवान्
राघवेन्द्र के द्वारा (यात्रा के समय) श्रमणीकृत सेतुबंध रामेश्वरम् धाम तक एवं उत्तर
दिशा में हिमाच्छादित केदारनाथ धाम तक (फैले हुए) विद्वानों (विद्योपासकों) के
जो-जो समाज विद्यमान हैं उन्हें मेरा यह ('वरिवस्यारहस्यम्' नामक ग्रन्थ-प्रणयन
रूप) अध्यवसाय आह्लादित करे । भला पशु-गण को कौन व्यक्ति चमत्कृत करने
की इच्छा करेगा? ॥ २ ॥ - प्रकाश *
कामरूपगान्धारौ देशौ । सेतुकेदारौ क्षेत्रे । द्रुहिणसुतब्रह्मपुत्र नदविशेषौ । विदुषां
विद्योपासकानां समाजाः, ‘न शिल्पादिज्ञानयुक्ते विद्वच्छब्दः प्रयुज्यते’ इत्यादिना
१. सिन्धुसार्द्राद्रघु०
प्रथमोऽंशः ३
विद्वच्छब्दस्योपासकपरतायास्त्रिशत्यां प्रदर्शनात् । समजाः पशुगणाः । 'पशूनां समजो
ऽन्येषां समाजः इत्यमरः ॥ २ ॥
- सरोजिनी *
आ प्राचः = पूर्व दिशा तक । कामरूप = कामरूप (आसाम) नामक
पूर्वोत्तर प्रदेश । द्रुहिणसुतनद = ब्रह्मपुत्र नामक नद । आप्लावित = बाढ़ के जल
से डूबा हुआ । (आप्लाव = जल की बाढ़) (आप्लव = आ + प्लु + अप् + ।
आप्लवन = आ + प्लु + ल्युट्) = डुबकी, गोता, स्नान, चारों ओर पानी का
छिड़काव ।) प्रतीचो = पश्चिम ।
गान्धार = भारत के पश्चिम दिशा का एक प्रदेश जो पहले भारत का एक
प्रदेश था । सिन्धु = सिन्धु नदी । केदार = हिमालयस्थ केदारनाथ नामक
शिवधाम । रघुवर = रघुनन्दन । चरित = भ्रमण किया हुआ, यात्रा किया हुआ ।
आसेतो = सेतुबन्ध रामेश्वरम् तक । अवाचः = दक्षिण दिशा । उदीची = उत्तर
दिशा । तुहिनगहनत = हिमाच्छादित । विद्वत्समाजा = विद्वानों का समुदाय ।
(भास्कर के मतानुसार—श्रीविद्योपासकों का समुदाय । “विदुषां विद्योपासकानां
समाजाः न 'शिल्पादिज्ञानयुक्ते विद्वच्छब्दः प्रयुज्यते'—इत्यादिना विद्वच्छब्दस्योपासक-
परतायास्त्रिंशत्यां प्रदर्शनात्”—आचार्य भास्करराय ।)१
आचार्य भास्करराय का कथन है कि त्रिशती में इस बात की पुष्टि की गई है
कि 'विद्वान' शब्द का अर्थ शिल्पादकि विज्ञान में निष्णात व्यक्ति नहीं है प्रत्युत्
'विद्वान' शब्द का अर्थ है—'श्रीविद्या के उपासक' । 'श्रीविद्या' का क्या अर्थ है?
'श्रीबीजात्मिका विद्या श्रीविद्येति रहस्यम्' ।२
समजाः = पशुगण । 'पशूनां समजोऽन्येषां समाजः' । (अमरकोश) आचार्य
भास्करराय ने 'विद्वत्समाज' शब्द का 'विद्योपासक समाज' के अर्थ में प्रयोग करके
समस्त वैदुष्य को श्रीविद्या की उपासना का पर्याय स्वीकार कर लिया है ।
स्पष्ट है कि आचार्य भास्करराय श्रीविद्योपासना को ही जीवन का परम पुरुषार्थ
एवं वास्तविक ज्ञानोपासना स्वीकार करते हुए उसे सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हैं ।
स जयति महान् प्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि ।
कथमिव तस्मिञ्ज्ञाते सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे ॥ ३ ॥
(प्रकाशस्वरूप परमशिव की महत्ता)
उस महिमामय प्रकाश (परमशिव) की जय हो जिसके दृष्टिगत होने पर अन्य
कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता । लेकिन फिर वेद में ऐसा क्यों कहा जाता है कि—
'उसके ज्ञात होने पर सब कुछ परिज्ञात हो जाता है'? ॥ ३ ॥
१. भास्करराय-'प्रकाश' २. 'लक्ष्मीधरा' (सौ०ल०टीका)
न (ndhena) -> सम्बन्धेन
ब्र (bra)
ह्म (hma)
णो (ṇo)
ऽ (avagraha)
पि (pi) -> ब्रह्मणोऽपि
भे (bhe)
द (da)
व (va)
त्त्व (ttva)
स्य (sya) -> भेदवत्त्वस्य
स (sa)
त्त्वा (ttvaa)
त् (t) -> सत्त्वात्
Now the next word:
स (sa)
द (da)
स (sa) ? Wait, look at that character!
Is it 'स'?
Wait, look at:
स - द् - द... no!
Wait, could it be:
सं (saṁ)
ब (ba)
न्धि (ndhi)
भ्या (bhyaa)
म् (m)???
LOOK AT IT!
स with anusvara? No, there is a letter:
First letter: स (sa) or सं?
Second letter: ब (ba) or द?
Third letter: न्धि (ndhi) with i-matra! LOOK AT THE I-MATRA!
Fourth: भ्यां (bhyaaṁ)!
Wait: "संबन्धिभ्यामभावो निरूप्यत इति"?!?!
YES! "सम्बन्धिभ्यामभावो निरूप्यते"!
An absence (abhāva) is defined by its relations / relata (sambandhibhyām - prati
प्रथमोऽंशः ५
नित्यत्वम्, मृद्घटयोरभेदेऽपि घटरूपेण ध्वस्तत्वं मृद्रूपेणाध्वस्तत्वं चेत्यादिवद्विरुद्ध-
धर्मनिरासादिकमूह्यमित्यादिकः शाम्भवानन्दकल्पलतायां विस्तरः ॥ ३ ॥
- सरोजिनी *
स = वह । समस्त प्राणियों की आत्मा के रूप में विद्यमान तथा निखिल
विश्व की अन्तरात्मा के रूप में परिज्ञात तथा प्रख्यात वे भगवान् परमशिव । जयति
= जय हो । सर्वोत्कर्षपूर्वक विद्यमान है (सर्वोत्कर्षेण वर्तते) । महान = महनीय ।
महिमामय । ‘विशङ्कटं पृथु बृहद्विशालं पृथुलं महत्’ (अमर कोश) । महपूजायाम्
(भ्वा०प०से०) । मह उत्सव तेजसोः (मेदिनी कोश) । प्रकाश = प्रकाश स्वरूप,
स्वप्रकाश, पराप्रकाशय । सर्वदा अनावृतात्मस्वरूप ज्योति—‘स्वरूपज्योतिरे वान्तः’
(आगम) ‘न तत्र सूर्यो भाति’ आदि (उपनिषद्) । यस्मिन् = जिस अधिष्ठान में ।
दृष्टे = दृष्टिगत होने पर । निर्विकल्पात्मक चरमवृत्ति के विषय बनने पर । न
दृश्यते किमपि = कुछ भी दिखाई नहीं देता । द्रष्टा के लिए कोई दृश्य रह ही
नहीं जाता । ‘कथमिव उच्यते वेदे ?’—फिर वेद में ऐसा क्यों कहा जाता है?
‘एक के जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है’—ऐसा वेदों में क्यों कहा
गया है ? इस आत्मविरोधी कथन की सङ्गति कैसे बैठेगी ?
आचार्य भास्करराय का कथन है कि इस ‘कथमिव उच्यते?’ वाक्यांश को
प्रस्तुत करने का उद्देश्य शाङ्कर विवर्तवाद का खण्डन करके परिणामवाद की
स्थापना करना है—‘विवर्तवादं वेदान्तिसम्मतं परिणामवादी दूषयति ।।’
आचार्य भास्कर कहते हैं¹—‘इच्छा करता हूँ’, ‘जानता हूँ’, इत्यादि वाक्यों में
उत्तम पुरुषान्तर्भासमान स्फुरणान्वयि ज्ञान ही ‘प्रकाश’ नामक ब्रह्म है । वह सर्वज्ञत्व,
सर्वेश्वरत्व, सर्वकर्तृत्व, पूर्णत्व, व्यापकत्व आदि शक्तियों से संवलित है । उसका
आनन्दरूपांश स्फुरण ही ‘परा अहंता’ ‘विमर्श’, पराललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरी
आदि कहा जाता है । विरूपाक्षपञ्चाशिका के विश्वशरीर स्कन्ध में कहा गया है कि
‘ईश्वरता कर्तृत्वं स्वतन्त्रता चित्स्वरूपता चेति ।’
‘एतेऽहंतायाः किल पर्यायः सद्भिरुच्यन्ते ।।’—अर्थात् पराहंता के ये
पर्यायवाची शब्द हैं ।
पराहंता के मध्य इदन्ता अस्फुरित है । ‘अहं’ एवं ‘इदम्’ के मध्य स्थित जो
पारस्परिक सम्बन्ध है उसमें अहं जनक है और ‘इदम्’ जन्य है—अहं द्रष्टा है और
इदं दृश्य है—अहं स्रष्टा है और इदं सृष्टि है ।² अहंता रूपशक्ति से विशिष्ट ब्रह्म
ही इस ‘इदं’ का सृजन करता है । यह दृश्य विवर्त, नहीं परिणाम है ।³
यह दृश्य उसी परासत्ता का परिणाम है—‘तच्च दृश्यं तत्परिणाम एव’
१-२. ‘प्रकाश’ नामक टीका
३. प्रकाश । ‘शिवादिक्षित्यन्तरूपेण परिणामत इत्यर्थः । यथा क्षीरं दध्याकारेण
परिणामते तथा चिच्छक्तिरेव सर्वाकारेण परिणामते ।’ (‘दीपिका’ अमृतानन्द)
६ वरिवस्यारहस्ये
क्योंकि शास्त्रों में इसकी पुष्टि भी की गई है—'तस्यां परिणतायां तु न कश्चित् पर
इष्यते ।।'१ श्रुतियों के साथ भी इस कथन का स्वारस्य है—'वाचारंभणं विकारः ।।'
शक्ति एवं शक्तिमान् या उपादान एवं उपादेय दोनों में अत्यन्त अभेद है । यहाँ
उपनिषदादि की भाँति भेदाभेद नहीं है । अतः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' वाक्य में
सामानाधिकरण्य दिखाकर 'इदं' एवं 'ब्रह्म' में अभेद प्रतिपादित किया गया है ।
'इदं' को 'विवर्त', नहीं कहा गया है । समस्त अद्वैतपरक श्रुतियाँ इसी दृष्टि की
अभिप्रायिका हैं । समस्त मूर्धन्य श्रुतियों एवं तन्त्रों द्वारा अद्वैत का ही प्रतिपादन
किया गया है । जो द्वैतभाव भासमान होता है वह यथार्थ नहीं है, क्योंकि उन
स्थलों में कार्यकारण में भेदांश की कल्पना की गई है ।
'नेह नानास्ति किञ्चन' वाक्य की उक्ति में भी केवल भेदांश का निषेध किया
गया है न कि प्रपञ्च का । 'एकमेवाद्वितीयम्' वाक्य में जिस 'द्वितीय' का निषेध
किया गया है वहाँ भी भेदवत्प्रपञ्चाभाव भी विशेषणाभाव प्रयुक्त मात्र ही है, इसीलिए
'भामती' में, 'हाटकमकुट' ग्रन्थ में भेद का ही हाटकन्यूनसत्ताकत्वं कहा गया है न
कि मकुट का, क्योंकि परिणाम में परिणामी का समानसत्ताकत्व विद्यमान है ।
'मायामात्रमिदं द्वैतम्' कहकर उपनिषदों में द्वैत या भेद का मिथ्यात्व प्रतिपादित
किया गया है । न कि अभेदवान का । इस प्रकार की अनेक युक्तियों द्वारा आचार्य
भास्करराय 'परिणामवाद' की स्थापना करते हैं और कहते हैं कि स्वयं वेद भी
'परिणामवाद' का ही प्रतिपादन करता है 'ततश्च श्रुतेरपि परिणामवाद एव संमतः
सिध्यति ।।'२
भास्करराय कहते हैं कि भगवान् व्यासदेव ने भी 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता-
नुपरोधात्' सूत्र में तथा 'आत्मकृते परिणामात्' सूत्रों में भी परिणामवाद का ही
प्रतिपादन किया है ।३ वेदान्तभाष्यकार भगवान् शङ्कराचार्य ने भी अपने शारीरक
भाष्य एवं उपनिषद-गीता-भाष्यों में विवर्तवाद का समर्थन करते हुए भी
'सौन्दर्यलहरी' में 'परिणामवाद' का ही समर्थन किया है—'मनस्त्वं व्योमस्त्वं' श्लोक
में 'त्वयि परिणतायाम्' कथन द्वारा आचार्य शङ्कर ने स्वाभिमत के रूप में
'परिणामवाद' की ही स्थापना की है 'परिणामवाद एवं स्फुटीकृतः ।।'४
रहस्यनामसहस्र में 'मिथ्याजगदधिष्ठाना' वाक्य द्वारा जो जगन्मिथ्यात्व का
प्रतिपादन किया हुआ दिखाई पड़ता है वह मिथ्यात्व-प्रतिपादन नहीं है प्रत्युत वह
स्वानतिरिक्तरूपत्व का कथन मात्र है । 'जगत'—घटादिरूपेण अनित्य है किन्तु
ब्रह्मरूपेण नित्य है । मृत्तिका एवं घट में अभेद तो है किन्तु मृत्तिका में घटरूपेण
ध्वस्तत्व है किन्तु घट की मृत्तिका के रूप में अपनी सत्ता अध्वस्त है ।५
प्रकाश—'परमशिव' प्रकाश है और 'विमर्श' उसका स्वस्वभाव है । वह
प्रकाशात्म है इसीलिए 'प्रकाश' है । अनावृत्तात्मस्वरूप ज्योति ही 'प्रकाश' है ।
१. वामकेश्वर तन्त्र २-४. प्रकाश
५. शाम्भवानन्दकल्पलता (प्रकाश में उद्धृत)
प्रथमोऽंशः ७
'प्रकाशः सर्वदा अनावृतात्मस्वरूप ज्योतिः' स्वभावरूप चिदात्मा महेश्वर ही
'प्रकाश' कहे गये हैं ।१
'प्रकाश' शब्द का प्रयोग अन्तस्थ सत्ता के उस स्वरूप के लिए किया जाता
है जो इसके आभास-जाल के अधिष्ठाता का कार्य करता है । 'ठीक उसी
प्रकार यथा बुद्धि किसी व्यक्ति के कल्पना-काल में उसकी कल्पनाओं का आधार
बनती है ।
वस्तुतः अखण्ड आत्मज्ञान ही 'प्रकाश' है जो कि स्वरूपतः ब्रह्म है—
'ज्ञानमेव प्रकाशाभिधं ब्रह्म ।।'२ अमृतानन्द ने ठीक ही कहा है कि—भूमि से लेकर
शिवपर्यन्त स्थित विश्व के अस्फुट आमर्शन का स्फुटीकार 'प्रकाश' है—तथा उस
विश्व का 'इदं' के रूप में अङ्गीभाव रूप आमर्शन 'विमर्श' है—"विश्वस्य
शिवादेर्भूभ्यन्तस्य प्रकाशामर्शने अस्फुटस्य स्फुटीकारः 'प्रकाशः' इदन्तया हृदयङ्गमी-
भावो विमर्श एवामर्शनम् ।।" (दीपिका) ॥
यह प्रकाशस्वरूप 'परमशिव' विमर्शाख्य अनन्योन्मुख स्वातंत्र्य स्वभाव से
अपनी 'पूर्णहन्ता' के आनन्द में अहर्निश स्पन्दमान रहता है । उसके आनन्दस्वभाव
की अभिव्यक्ति ही उसकी शक्ति का स्फार है—
'सर्व एवायं विश्वप्रपञ्च आनन्द शक्ति स्फारः ।।' (तन्त्रालोक) ।।
वही परमेश्वर अपनी माया शक्तिरूपिणी 'स्वातंत्र्यशक्ति' के द्वारा अपने को
अपने द्वारा सङ्कुचित सा अवभासित करता हुआ—१. 'विज्ञानाकल' २. 'प्रलयाकल'
एवं ३. 'सकल' बन जाता है (तदेवम् असौ भगवान् स्वमाया शक्त्याख्येन
अव्यभिचरित स्वातंत्र्य शक्तिमहिम्ना स्वात्मनैव आत्मानं सङ्कुचितमिव अवभासयन्
विज्ञानाकलः प्रलयाकलः सकलश्च संपद्यते ।)३ परमशिव ही प्रकाश है—
'तस्मात् प्रकाश एवासौ गीतो यः परमः शिवः ।।' (मा०वि०)
उसकी प्रकाशरूपता ही 'चिच्छक्ति' है; उसका स्वातन्त्र्य ही 'आनन्दशक्ति' है,
उसका चमत्कार ही 'इच्छाशक्ति' है, उसकी आमर्शत्मिकता ही 'ज्ञानशक्ति' है, और
उसका सर्वाकारयोगित्व ही क्रियाशक्ति है । १. तस्य प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः । २.
स्वातंत्र्यं आनन्दशक्तिः । ३. तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः ४. आमर्शत्मिकता ज्ञानशक्तिः।
५. सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः इति ।४
प्रकाशरूप परमेश्वर समस्त जगत् की आत्मा है । वह एक ओर तो सर्वमय
है तो दूसरी ओर सर्वोत्तीर्ण भी है । वह अनवच्छिन्न चिदानन्द विश्रान्त,
सर्वशक्तिखचित महेश्वर संविदात्मा है—"इह खलु निखिल जगदात्मा सर्वोत्तीर्णाश्च
सर्वमयश्च विकल्पा सङ्कुचित संवित्प्रकाशरूपः अनवच्छिन्नचिदानन्दविश्रान्तः प्रसरद-
१. (क) परात्रिंशिका तत्वसंदोह, (ख) प्र०हृदय, (ग) तन्त्रालोक, (घ) वरिवस्या०
२. वरिवस्यारहस्यम् ३-४. 'जन्ममरणविचार'
८ वरिवस्यारहस्ये
विरलविचित्रपञ्चवाहवाहिनीमहोदधिः, निरतिशय स्वातंत्र्य सीमनि प्रगल्भमानः
सर्वशक्तिखचित एक एव आस्ति संविदात्मामहेश्वरः ।१
प्रकाश एवं विमर्श—शैवशाक्तागम में शिव को प्रकाश एवं शक्ति को विमर्श
की आख्या प्रदान की गई है—उत्पलदेवाचार्यः (सम्बन्धसिद्धि)
१. 'भावभेदादि सम्बन्धमयेन वपुषोन्मिषन् ।
जयत्येकोऽपि विश्वत्मा प्रकाशः परमेश्वरः ।।'२
२. “स एव विमृशत्वेन नियतेन महेश्वरः ।
'विमर्श' एव देवस्य शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः ।।'' (प्र०का०१।८८)
३. 'आत्मविमर्शरूपा अनादिनिधना प्रभोः स्वभावभूता ।' (प्र०का०२।२)
४. 'स परमात्मा चिद्रूपो विमर्शाख्येनैव मुख्यस्वभावेन ।' (प्र०का०१।८८)
५. 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ।। (प्र०का०१।४२)
६. प्रकाशात्मा प्रकाश्योऽर्थो ना प्रकाशश्च सिद्ध्यति । (प्र०का०१।३४)
७. न च प्रकाशोभिन्नः स्यादात्यार्थस्य प्रकाशताः । (प्र०का०१।३३)
८. प्रकाशास्यात्म विश्रान्तिरहंभावोहि कीर्तितः । (अजड०२२)
९. इदमित्यस्य विच्छिन्न विमर्शस्य कृतार्थता ।
या स्वस्वरूपे विश्रान्ति विमर्शः सोऽहमित्ययम् ।। (अजड०१५)
१०. मुक्त्वान्यस्य प्रकाशस्य विमर्शरहितात्मनः । (अजड०१४)
११. एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी ।
जडाः प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः स्वपरात्मभिः ।। (अजड० १३)
१२. इत्थं स संविदघन एक एव शिवः स विश्वस्य परप्रकाशः । (पू०प्रत्य०)
१३. अकारः सर्ववर्णाग्र्यः 'प्रकाशः परमेश्वरः ।३
१४. सकल भुवनोदय स्थिति लय मय लीला विनोदनो द्युक्तः ।
अन्तर्लीन विमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ।।४
१५. परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे ।५
१. ज०म०वि०(भट्ट वामदेवाचार्य)
२. 'स्फुरणान्वयि ज्ञानमेव प्रकाशाभिधं ब्रह्म ।' तस्य चानन्दरूपांश एवस्फुरणां
पराहन्ता विमर्शः पराललिताभट्टारिका त्रिपुरसुन्दरीत्यादिपदैः व्यवह्रियते ।
(वरिवस्यारहस्य—भास्कराचार्य)
३. नान्दिकेश्वर काशिका ४-५. कामकलाविलास (पुण्यानन्दनाथ)
प्रथमोऽंशः ९
१६. भावि चराचर बीजं शिवरूपविमर्शनिर्मलादर्शः ।१
१७. तस्यादि ददौ स्वशक्त्यै कामेश्वर्यै विमर्शरूपिण्य ।२
१८. स्वाभाविकी स्फुरत्ता विमर्शविपुरस्य विद्यते शक्तिः ।३
१९. इह खलु भगवान् प्रकाशमूर्तिः परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य४
देवः प्रकाशकः महादेवो महाऽप्रकाशात्मा ।५ शिवस्य प्रकाशात्मनो दीपस्य
शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा ।६
२०. तस्य देवातिदेवस्य परबोधस्वरूपिणः ।
विमर्शः परमाशक्तिः सर्वज्ञ ज्ञानशालिनी ॥७
२१. स जयति महान् प्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि ।८
२२. नैसर्गिकस्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः । तद्योगादेव शिवो
जगदुत्पादयति पाति संहरति ।९
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ॥ ४ ॥
सावश्यं विज्ञेया यत्परिणामाद्भूदेषा ।
अर्थमयी शब्दमयी चक्रमयी देहमथ्यापि च सृष्टिः ॥ ५ ॥ (वरिवस्या०)
[चित्र: प्रकाश एवं विमर्श शक्ति वृत्त]
— प्रकाश
— विमर्श शक्ति
(बाह्य से आन्तरिक वृत्त:)
क्रिया शक्ति
ज्ञान शक्ति
इच्छा शक्ति
आनन्द शक्ति
चित् शक्ति
(केन्द्र 'चित् शक्ति' से बाहर की ओर अधोमुखी बाण / तीर)
१-२. कामकला०
३. सौभाग्यसुधोदय (अमृतानन्द योगी)
४-६. दीपिका (अमृतानन्द योगी)
७. 'कालिकाक्रम'
८-९. वरिवस्यारहस्य
१० वरिवस्यारहस्ये
'प्रकाश' द्वारा
आत्मनिष्ठ 'विमर्श' का
दर्शन
शब्दमयी सृष्टि
चक्रमयी सृष्टि
देहमयी सृष्टि
अर्थमयी सृष्टि
क्रिया शक्ति
ज्ञान शक्ति
इच्छा शक्ति
आनन्द शक्ति
चित् शक्ति
परमशिव
क्रियाशक्ति
ज्ञानशक्ति
इच्छाशक्ति
आनन्दशक्ति
चित्शक्ति
अव्यक्तजगत
प्रथमोऽंशः ११
इममेवार्थं श्लोकद्वयेनाह—
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ॥ ४ ॥
(विमर्श शक्ति और उसकी महत्ता)
इसकी (परमशिव रूप 'प्रकाश' की) शक्ति स्वाभाविक, स्फुरणात्मिका एवं
विमर्शरूपा है । उसके योग से ही शिव जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार किया
करता है ॥ ४ ॥
- प्रकाश *
इहोत्पादनादि त्रयं तिरोधानानुग्रहयोरुपलक्षणम् ॥ ४ ॥ - सरोजिनी *
‘नैसर्गिकी’ = स्वाभाविक, निसर्गजन्य, अकृत्रिम, सहज शक्ति के दो प्रमुख
भेद हैं—(१) नैसर्गिक (२) अनैसर्गिक । दाहकता अग्नि का, गन्ध पृथ्वी का रस
जल का, शब्द आकाश का, स्पर्श वायु का नैसर्गिक गुण है किन्तु अग्नि-संपर्क
से, प्रज्वलित लौहखण्ड में जलाने की शक्ति, मुखावयवों से निकलती ध्वनि या
शब्द की शक्ति उनके अपने गुण या अपनी शक्तियाँ नहीं हैं, प्रत्युत् दूसरों से
उधार ली हुई शक्तियाँ हैं अतः परिस्थितिजन्य हैं, क्षणिक हैं, संयोगज हैं, अतः
कृत्रिम हैं । इन्हें ही अनैसर्गिक शक्तियाँ कहेंगे । शिव में निहित शक्ति नैसर्गिक
शक्ति है क्योंकि वह परमशिव से अभिन्न है और उससे अविच्छेद्य है । सांख्यदर्शन
की मान्यता है कि ‘प्रकृति’ (शक्ति) पुरुष से भिन्न है । यद्यपि सृष्टि का कार्य
‘प्रकृति’ ही करती है और वह बिना पुरुष की सहायता के कर भी नहीं सकती
क्योंकि प्रकृति तथा पुरुष के संयोग से ही सृष्टि हो पाना संभव है अन्यथा नहीं—
‘पंग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः’ तथापि सांख्य की ‘प्रकृति’ प्रकाश के
‘विमर्श’ के समरूप नहीं हैं क्योंकि ‘प्रकृति’ पुरुष से अविच्छेद्य नहीं है—प्रत्युत्
विच्छेद्य है—
‘रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।
पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य निवर्तते प्रकृतिः ।।' (सां०का०५९)
‘विविक्तबोधात् सृष्टिनिवृत्तिः प्रधानस्य सूदवत् पाके ।' (सां०सू०)
जबकि ‘प्रकाश’ की शक्ति (प्रकाश’ की नैसर्गिक शक्ति होने के कारण) उससे
‘चन्द्रचन्द्रिकयोरिव’ अभिन्न है अतः उसका निसर्ग है—प्रकाश का स्वभाव है और
उसकी अन्तःशक्ति है—‘विचित्रजगन्निर्माणादि सामर्थ्यरूपा शक्तिः । न भिन्ना... ।
कल्पित भेदाभेदनिर्वचनीयतादात्म्यसम्बन्धः । १ सा हि ब्रह्माभिन्ना शक्तिः ।।
१. हयग्रीव—‘शाक्तदर्शनम्’ (प्र०अ०। प्र०१।२)
१२ वरिवस्यारहस्ये
(८।३।१५)¹ यह स्वाभाविकी है—‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान
बलक्रिया च ॥’
‘स्फुरत्ता’ = स्फुरणात्मिका । स्फुरणरूपा । शक्ति स्फुरणात्मिका है । ‘यदा
सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी । स्फुरत्तात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥’²
‘स्फुरत्ता’ का क्या अर्थ है? शक्ति सृष्टिरूपा है अतः पराशक्ति का विश्वसर्जन
व्यापार ही ‘स्फुरत्ता’ कहलाता है—‘विश्वसर्जनमेव पराशक्तिः स्फुरत्ता, तस्याः
सृष्टिरूपत्वात् ॥’³ ‘सेयं स्फुरतारूपा सृष्टिरेव क्रिया कृतिः यत्नः ।’⁴ शक्ति में यह
स्फुरता भी नैसर्गिक होती है क्योंकि वह स्वनिष्ठा होती है—‘आत्मनिष्ठां
स्फुरत्ताम्’⁵, ‘सा देवी स्वेच्छयास्वनिष्ठां स्फुरतां यदा पश्यति ।’⁶ स्फुरता भगवती का
अभिधान भी है—‘चितिः प्रत्यवमर्शात्मा, परावाक् स्वरसोदिता । स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं
तदैश्वर्यं परमात्मनः । सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी ॥’⁷
‘विमर्श’— स एव विमृशत्वेन नियतेन महेश्वरः ।
विमर्श एव देवस्य शुद्धेज्ञान क्रिये यतः ॥ (प्र०का०१।८८)
‘पूर्णता प्रत्यभिज्ञा’ में परमशिव की स्वातन्त्र्यलक्षणा, नैसर्गिकी, स्फुरत्तात्मा
पराशक्ति को ही ‘विमर्श’ कहा गया है—
‘नैसर्गिकी स्फुरत्तात्मा विमर्शाख्या परा प्रभोः ।
अक्रमा क्रमरूपेण शक्तिः स्वातन्त्र्यलक्षणा ॥’⁸
विमर्शमयी होने के कारण ही पराशक्ति को विमर्श भी कहा जाता है,
इसीलिए आचार्य क्षेमराज ने ‘प्रत्यभिज्ञाहृदयम्’ में चिति शक्ति को भगवती स्वतन्त्रा,
पराशक्ति, शिवभट्टारिका के साथ ही साथ उन्हें ‘अनुत्तरविमर्शमयी’ भी कहा है—
पराशक्तिरूपा चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा, अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टारिका-
भिन्ना ॥’⁹ परास्वात्मसंवित्ति में ही विमर्शत्व निहित है । ‘परायाः
स्वात्मसंवित्तेर्विमर्शत्वं न्यरूपयत् ॥’¹⁰
१. ‘विमर्श’ भगवान् का मुख्य स्वभाव है—
‘स परमात्मा चिद्रूपो विमर्शाख्ये नैव मुख्यस्वभावेन ।’¹¹
२. ‘विमर्श’ प्रकाश की अन्तर्लीन, वह अनुत्तरा अभिन्न शक्ति है जो कि
समस्त संसार की सृष्टि, स्थिति एवं संहार का मूलाधार है—सकलभुवनोदय
स्थितिलयमयलीला विनोदनोद्युक्तः। अन्तर्लीन विमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ॥¹²
१. शाक्तदर्शनम् (८।३।१५) २. योगिनीहृदय (९)
३. दीपिका (अमृतानन्दनाथ) ४-६. सेतुबन्ध (भास्करराय मखिन्)
७. प्रत्यभिज्ञाकारिका ८. पूर्णता प्रत्यभिज्ञा
९. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (क्षेमराज) १०. परात्रिंशिका तात्पर्य दीपिका
११. प्र०का० (१।८८) १२. कामकलाविलास
प्रथमोऽंशः १३
३. यह शिव की वह स्फुरणात्मिका एवं नैसर्गिक शक्ति है जिसकी सहायता
से भगवान् शिव जगत् की उत्पत्ति करते हैं, उसका पालन करते हैं एवं उसका
संहार करते हैं—
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ॥१
४. भगवान् परमशिव ‘प्रकाश’ ही का अपना स्वेच्छा, विभक्तरूप ही विमर्श
है—‘इह खलु भगवान् प्रकाशमूर्ति परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य ।’२
५. ‘विमर्श’ दीपकरूप प्रकाशात्मा शिव की विमर्शाख्या नामक प्रभा है—
‘शिवस्य प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा ।’३
६. परमात्मा का आनन्दरूपांश ही ‘स्फुरत्ता’ ‘परा’ ‘अहंता’ पराललिता
भट्टारिका, त्रिपुर सुन्दरी, एवं विमर्श है ।४
७. सृष्टि अवस्था में विश्वाकार होने से, स्थिति की अवस्था में विश्व का
प्रकाशन करने से एवं संहार की अवस्था में समस्त प्रपञ्च को आत्मसात करने से
शिव में जो अकृत्रिम अहंभाव है उसे ही ‘विमर्श शक्ति’ कहते हैं५—
‘विमर्शो नाम विश्वाकारेण विश्वाप्रकाशेन विश्वसंहारेण च अकृत्रिमाहम इति
विस्फुरणम् ।।' (पराप्रावेशिका)
८. विमर्श एक दर्पण है जिसमें पर शिवरूप प्रतिबिम्बित हुआ करता है 'पर
शिव रविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे ॥६
९. अवभासों का स्वभाव ही ‘विमर्श’ है—
‘स्वभावमवभासस्य विमर्श विदुरन्यथा’
१०. जो ‘सोऽहं’ इत्याकारक आत्मस्वरूपविश्रान्ति है वही ‘विमर्श’ है—‘या
स्वस्वरूपेविमर्शः सोऽहमित्ययम्’ (अजड०२२ । प्रत्यभिज्ञाकारिका) ॥ ‘विमर्श’
परमशिव का पूर्ण अहं (पूर्णाहन्ता) है ।
११. परमात्मा परमशिव की स्वनिगूढा, स्वातंत्र्यस्वरूपा, कामेश्वरीरूपा,
त्रिपुरसुन्दरीस्वरूपा, ललिताख्या पराशक्ति है वही विमर्श कहलाती है ।
१२. ‘प्रकाश’ और ‘विमर्श’ परस्पर सर्वथा अभिन्न है । एक के अभाव में भी
दूसरे की कल्पना असंभव है । इनमें अभिन्नभाव सम्बन्ध है—‘प्रकाशमानं न पृथक्
प्रकाशात् । स च प्रकाशो न पृथक् विमर्शात् ।।'७
१. वरिवस्यारहस्यम् २. दीपिका (अमृतानन्द)
३. अमृतानन्द—‘दीपिका’ ४. वरिवस्यारहस्यम्
५. कामकलाविलास ६. प्र०का० (१।४२)
७. विज्ञान भैरव विवृति (पृ० १२२)