वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ वरिवस्यारहस्ये
ऐक्यानुसन्धान ही मन्त्र का 'कौलिकार्थ' है। 'रहस्यार्थ'—मूलाधारस्थ कुण्डलिनीरूपा
विद्या ही साधक की स्वात्मा है—इस रूप की भावना का नाम ही 'रहस्यार्थ' है।
'महातत्त्वार्थ' = निष्कल अणु से अणुतर, तथा महान् से महत्तर, निर्लक्ष्य,
भावातीतः, व्योमातीत परमतत्त्व के साथ प्रकाशानन्द रूप में विश्वातीतः एवं विश्वमय
निज गुरु के द्वारा प्रबोधित निर्मलस्वभाव स्वकीय आत्मा का ऐक्यानुप्रवेश
'महातत्त्वार्थ' है। इन समस्त अर्थों के परिज्ञान से पाशात्मक विकल्प जाल सम्यक्
प्रकार से निवृत्त हो जाते हैं ।१
१. 'भावार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—अम्बा (देवी) मन्त्र एवं
जगत् में अभेद का प्रतिपादन 'भावार्थ' है—'तेनाम्बामनुजगतामभेद एवात्र
भावार्थः ॥'२
२. 'सम्प्रदायार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—कार्य एवं कारण, वाच्य
एवं वाचक, ब्रह्म एवं जगत् में अभेद होने के समान ही जगत् एवं विद्या
में भेदाभाव का प्रतिपादन ही 'संप्रदायार्थ' है।
'योगिनीहृदय' में षड्विध अर्थ—'योगिनीहृदय' में निम्न छः प्रकार के मन्त्रार्थों
का विवेचन किया गया है जो निम्न है—"षड्विधस्तं तु देवेशि ! कथयामि
तवानघे। भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भार्थश्च कौलिकः रहस्यार्थो गहातत्वार्थ एव च ।
अथराथों हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।।" (१५, १६) १. भावार्थ २. सम्प्रदायार्थ
३. निगर्भार्थ ४. कौलिकार्थ ५. सर्वरहस्यार्थ ६. महातत्त्वार्थ ।। (मन्त्र सङ्केत) ।।
'नामार्थ' 'शब्दरूपार्थ' 'नामैकदेशार्थ' 'शाक्तार्थ' 'सामरस्यार्थ' 'समस्तार्थ'
'सगुणार्थ' एवं 'महावाक्यार्थ'—ये आठ अर्थ भास्करराय के स्वकल्पित नये अर्थ हैं
जो कि 'योगिनीहृदय' में उल्लिखित नहीं है ।
जगत् एवं विद्या में अभेद है—यही 'संप्रदायार्थ' है३—
“जन्यजनकयोर्भेदाभावाद वाच्यस्य वाचकेनापि ।
ब्रह्मणो जगतो जगति च विद्याभेदस्तु संप्रदायार्थः ।। ८१ ।।”
३. 'निगर्भार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—'निगर्भार्थ' का स्वरूप इस
प्रकार है—"सर्वातिशायी सत्त्व परमशिव में एकात्मकता या अन्य पदार्थों
का अभाव (निष्कलत्ता), अपने दीक्षा गुरु एवं उस परमशिव में अभेद
तथा उस (गुरु) की कृपावश अपने एवं उस परमशिव में अभेद-दर्शन ही
निगर्भार्थ है"—
१. भारतीय संस्कृति और साधना (प्र०ख०) (पृ० ३३९-३४०)
२. 'अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।'
कूटत्रयात्मिका देवी समष्टि व्यष्टि रूपिणीम् ।
आद्यां शक्ति भावयन्तो भावार्थमिति मन्वते ।। २५ ।। (योगिनीहृदय)
३. तथा मन्त्राः समस्ताश्च विद्यायामन्त्र संस्थिताः ।। ४७ ।। (योगिनीहृदय)
गुरुक्रमेण संप्राप्तः संप्रदायार्थ ईरितः ।।