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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 530 में से

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पृष्ठ 326

२२४ वरिवस्यारहस्ये

  • प्रकाश *
    एतेनार्थज्ञानस्य नित्यत्वमुक्तं भवति ॥ ५६ ॥
  • सरोजिनी *
    भास्करराय कहते हैं कि जो व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की आकांक्षा
    रखते हैं उन्हें अपने आकांक्षा की इस पूर्ति के लिए मन्त्रों के अर्थों को जानना
    अत्यावश्यक है । जो लोग मन्त्रार्थ के प्रति उपेक्षा दृष्टि रखते हैं उन्हें
    स्वाभीष्ट-प्राप्ति की बात तो दूर अनर्थों का सामना करना पड़ता है । आचार्य
    भास्कर श्लोकान्तर से इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं कि चन्दन की लकड़ियों का
    बोझ लादे हुए गधा जिस प्रकार चन्दन के बोझ मात्र को जानता है चन्दन के गुणों
    को नहीं अतः उसे चन्दन को बोझ की दृष्टि से देखने के कारण चन्दन से कष्ट
    ही प्राप्त होता है और चन्दन का अर्थ—'बोझ' (दुःख, पीड़ाकारक वस्तु) ही
    समझ में आता है उसे चन्दन के शीतलत्व, सुगंधि, मनमोहकता एवं मनः प्रसादत्व
    का गुण प्राप्त नहीं । होता ठीक उसी प्रकार मन्त्रार्थ ज्ञान-शून्य शब्दसङ्गठित मन्त्र
    के जाप से अनर्थ-ही प्राप्त होता है कोई लाभ प्राप्त नहीं होता—
    “नार्थ ज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
    भस्मनि वह्नि विहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥ ५४ ॥
    अर्थमजानानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
    उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ ५५ ॥”१
    यह मन्त्रार्थविहीन मन्त्रों का उच्चारण भास्करराय की दृष्टि में उ
    ‘शब्दस्योच्चारण’ मात्र है । यह ऐसा प्रयास है यथा—वह्निविहीन भस्म में हवि
    डालना—‘भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥’ इसके अतिरिक्त उसकी
    दशा गधे की भाँति है—‘‘यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ॥’’
    निष्कर्ष—‘यद धीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते ।
    अनग्नाविव शुष्कौधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥’
    जो व्यक्ति मन्त्रार्थ—विरमित मन्त्र का जप करता है वह दरिद्रता, विपत्ति एवं
    नरक तीनों को आमंत्रित करता है—
    श्रोत्रादीनां ज्ञानाभावे मन्त्रजापं करोति यः ।
    दारिद्र्यं च विपत्ति च नरकं प्राप्नुयातु सः ॥२
    ‘यामल’ में कहा गया है कि ‘‘मन्त्र का अर्थ देवता है’’ और ‘‘मन्त्र एवं
    देवता में वाच्यवाचकभावेन अभेद है’’—‘‘मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि ।
    वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ॥’’३ ‘मन्त्र’ वाचक है और ‘देवता’ वाच्य है

१. वरिवस्यारहस्यम् २-३. शाक्तानन्द तरंगिणी