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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 530 में से

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२३२ वरिवस्यारहस्ये

| ५. 'ह्रीं'—(गायत्री के तुरीय पद एवं | 'धियो यो नः प्रचोदयात्' जो हमारी |
| हृल्लेखा में समन्वय) | 'धियो' (ध्यानेच्छाशून्य निर्विकल्प |
| | परमात्मा के प्रति) प्रेरित करे। उस |
| | अनिर्वचनीय ज्योतिर्लिंग आत्मा के प्रति |
| | ब्रह्माकार परिणत चित्त द्वारा 'सोऽहं' के |
| | रूप में कल्पित करना चाहिए ॥ |

(ख) 'कामकूट' का 'गायत्री' के साथ समन्वय—अथ तु परं कामकलाभूतं
कामकूटमाहुः । तत् सवितुर्वरेण्यमित्यादिद्वात्रिंशदक्षरीं पठित्वा तदिति परमात्मा
सदाशिवोऽक्षरं विमलं निरूपाधितादात्म्यप्रतिपादनेन हकाराक्षरं शिवरूपं अनक्षरमक्षरं
व्यालिख्यत इति तत्परागव्यावृत्तिमादाय शक्तिं दर्शयति ॥ १६ ॥¹