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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 530 में से

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पृष्ठ 338

२३६ वरिवस्यारहस्ये
‘गायत्र्यर्थस्त्रिपुरोपनिषदिकथितस्तथैव भागवते’१
उन्होंने ‘योगिनीहृदय’ एवं ‘सङ्केतपद्धति’ के भी अनेक उद्धरण प्रस्तुत किये
हैं। ‘योगिनीहृदय’, ‘देवीभागवत’, ‘सङ्केतपद्धति’, ‘वामकेश्वर तन्त्र’, ‘नित्या
षोडशिकार्णव’ एवं अमृतानन्दनाथ को अनेक बार उल्लेखित करके वे उन्हें अपने
पक्ष का समर्थक प्रदर्शित करते हुए दिखाते हैं ।
वे यह भी कहते हैं कि पुराकाल में गायत्री चरणत्रय मात्रवाली थी । यथा—
‘सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि । बुद्धिं या नः प्रचोदयात्’२ आचार्य
भास्करराय का कथन है कि उपर्युक्त देवी भागवत के श्लोक के अनुसार गायत्री का
प्रतिपाद्यत्व, आद्या श्रीविद्या के ब्रह्मरूपत्व के प्रतिपादन में ही निहित है ‘अंत्र
ह्याद्यायाः श्रीविद्याया एवं ब्रह्मरूपत्व गायत्र्यादिप्रतिपाद्यत्वं’३ भास्करराय अपनी पुष्टि में
निम्न श्लोक भी प्रस्तुत करते हैं—‘हयग्रीव ब्रह्मविद्या वृत्रवधस्तथा । गायत्र्या च
समारंभस्त द्वै भागवतं विदुः ॥’४
सर्वान्तर्यामि दधद्भगों देवस्य धीति तुर्यार्थः ।
पृथ्वी मही लकारस्तृतीयतुर्याङ्घ्रिबोधिका माया ॥ ६१ ॥
(गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र के वर्णों की परस्पर वाचकता)
(पञ्चदशी मन्त्र का तृतीय वर्ण जो) वर्णमाला के चतुर्थ वर्ण (ई) का प्रतीक
है ‘भगों देवस्य धी’ का वाचक है । इसका अर्थ है—सर्वान्तर्यामी एवं सर्वपोषक
शिव ।। ‘लकार’ पृथ्वी का वाचक है । माया (हीं) (गायत्री के) तृतीय एवं चतुर्थ
चरण का वाचक है ॥ ६१ ॥

  • सरोजिनी *
    ‘पञ्चदशी मन्त्र’ का तृतीय वर्ण वर्णमाला का चतुर्थाक्षर ‘ई’ है ।
    | पञ्चदशी मन्त्र | गायत्रीमन्त्र | समता |
    | :--- | :--- | :--- |
    | ‘ई’ | ‘भर्गो देवस्य धी’ | दोनों मन्त्र एकार्थक |
    | | | हैं—दोनों एक दूसरे के |
    | | | अर्थ के द्योतक हैं ।। |
    | अर्थ सर्वान्तर्यामी सर्वाधार | अर्थ—सर्वान्तर्यामी | पञ्चदशी के ‘ई’ एवं |
    | शिव | एवं सर्वपोषक शिव | गायत्री मन्त्र के ‘भर्गो |
    | ‘तस्माद्भगों देवस्य धीत्ये- | —(गा०मं०) | देवस्य धी’ दोनों का |
    | वमीकारः’ श्रुति = ‘ई’ | ‘ईकारस्याप्येतावानर्थः | एक ही अर्थ है । |
    | | (—भास्कर) | |
    १. वरिवस्यारहस्यम् २. देवीभागवत पुराण
    ३. भास्करराय—‘प्रकाश’ ४. वरिवस्यारहस्यम्