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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 530 में से

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द्वितीयोंऽशः २२३
अपना प्रधान लक्ष्य मानता है किन्तु मन्त्र अर्थ ही तो देवता होता है अतः मन्त्र
का अर्थ जाने बिना देवता का साक्षात्कार कैसे हो सकता है ? 'शाक्तानन्दतरंगिणी'
में कहा गया है—'मन्त्रार्थं देवतां रूपं चिन्तनं परमेश्वरि । वाच्यवाचक भावेन अभेदो
मन्त्रदेवयोः ॥'१ 'देवता' वाच्य है 'मन्त्र' वाचक है—'वाच्या हि देवता देवमन्त्रोहि
वाचकः स्मृतः ॥'२ वाचक के ज्ञात होने पर स्वतः वाच्य भी प्रसन्न होता है—
“वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव प्रसीदति ॥”
जिस-जिस मन्त्र का जो-जो देवता हो उसके आकार का चिन्तन करके ही—
अर्थात् मन्त्र का देवता रूप अर्थ समझकर एवं उसका ध्यान करके जप करना
चाहिए—
“यस्य यस्य च मन्त्रस्य उद्दिष्टा या च देवता ।
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जप माचरेत ॥”३
'कुलार्णवतन्त्र' में तो यहाँ तक कहा गया है कि जिस भी मन्त्र का जप
करना हो साधक को 'तन्निष्ठ' 'तद्गतप्राण' 'तच्चित्त' 'तत्परायण' होकर उस पदार्थ
का अर्थानुसंधान करते हुए मन्त्र का जप करना चाहिए४—
तन्निष्ठस्तद्गत प्राणस्तच्चित्तस्तत् परायणः ।
तत्पदार्थानुसंधानं कुर्वन्मन्त्रं जपेत् प्रिये ॥
आदि में मन्त्र के अर्थस्वरूप देवता का ध्यान करना चाहिए । इसके बाद
अंत में भी मन्त्र के अर्थस्वरूप देवता का ध्यान करना चाहिए एवं इस प्रकार
ध्यानपूर्वक मन्त्र जप करना चाहिए ।
आदौ ध्यानं ततोमन्त्रं ध्यानस्यान्ते मनुं जपेत् ।
ध्यान मन्त्रसमायुक्तः शीर्घ सिध्यति साधकः ॥५
“यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य” । खर की
उपमानता । सादृश्य निरूपकगुणाधिक्यवत् उपमान से तदाधिक्य के भाव की
अभिव्यञ्जना हेतु ‘प्रतीपालङ्कार’ का प्रयोग किया गया है जिसमें ‘इव’ शब्द द्वारा
उपमानोपमेयों के व्यत्यास को व्यक्त किया गया है ।
पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थाः परिज्ञेयाः ।
अर्थनादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥ ५६ ॥
(मन्त्रार्थों का परिज्ञान आवश्यक क्यों?)
पुरुषार्थों (धर्मार्थ काम मोक्ष) की आकांक्षा रखने वाले लोगों को (मन्त्रों के)
अर्थों का परिज्ञान होना चाहिए । (मन्त्रों के अर्थों के प्रति) तिरस्कार का
भाव रखने वालों के लिए अर्थ (अभीष्ट) की प्राप्ति नहीं प्रत्युत् अनर्थ की प्राप्ति
होती है ॥ ५६ ॥
१-५. शाक्तानन्द तरंगिणी