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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

तृतीय विश्राम: नाद, बिन्दु, कला एवं मातृका-वर्ण मन्त्र-दर्शन

२१४ वरिवस्यारहस्ये
४. जप का चतुर्थ रूप (योग वाचिक) = लक्ष्य के भीतर मन को केन्द्रित
करके वाणी द्वारा जप करना योग वाचिक जप है ।
५. जप का पञ्चम रूप (योगमानसिक) = बीजानारोहण क्रम से मन के
द्वारा जप करना योग मानसिक जप है ।
६. जप का छठवाँ रूप (वाङ्मानसिक यौगिक) = यह अनुत्तम जप है ।
वाचिक जप—वाक् प्रवर्तन; मानस जप—श्री एवं योगसिद्धियों की प्राप्ति; वाङ्मानस
जप—वाग्ज्ञान, ऐश्वर्यसिद्धि अणिमादिक सिद्धियों की प्राप्ति ।१
जप और उसके अङ्ग—'एवमवस्था शून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्चषट् सप्त । न
व च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ।। 'जप' के साथ मन्त्रावयवों की
अनुविद्धता अपरिहार्य है । जैसे माला के मनकों को एकीकृत करने के लिए सूत्र
आवश्यक है उसी प्रकार भिन्न-भिन्न मन्त्राक्षरों को एकात्मता में पिरोने के लिए
मन्त्रावयव रूप सूत्र की आवश्यकता होती है । मन्त्रावयव रूप सूत्र में पिरोये
मन्त्राक्षरों का उच्चारण करना ही जप है इसीलिए भास्कराचार्य कहते हैं—
'एवमवस्था शून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्च षट् सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ।।'२
१. भास्कराचार्य के मत में जप के मूलभूत अङ्ग—आचार्य भास्कर कहते हैं
कि मन्त्राक्षरों के उच्चारण की आवृत्तियाँ मात्र ही 'जप' नहीं है बल्कि मन्त्रावयवों के
साथ मन्त्रोच्चारण 'जप' है उन्होंने मन्त्रावयवों को ही जप के अङ्ग के रूप में
स्वीकार किया है जो निम्न है—(१) छः शून्य (२) पाँच अवस्थायें (३) सात
विषुव (१८ अङ्ग) । सारांश यह है कि मन्त्र-जप के अवयवभूत अङ्ग निम्न हैं—
(क) मन्त्राक्षरों का 'उच्चारण'—'अणोच्चरणं तु जपः' (वरि० ५२)
(ख) मन्त्राक्षरों के 'अर्थचिन्तन' एवं मन्त्रार्थ—चिन्तन के साथ किया गया
मन्त्रोच्चारण—
“मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणां तु जपः ।।”
अर्थात् जप के साथ मन्त्रार्थ चिन्तन भी आवश्यक है । मन्त्रार्थ निम्न है—
'षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे । भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भाथैश्च कौलिकः ।
तथा सर्वरहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च । अक्षराथों हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।।'
'योगिनीहृदय' में मन्त्रार्थ के ये निम्न प्रकार है—(१) 'भावार्थ' (२) 'संप्रदायार्थ'
(३) 'निगर्भार्थ' (४) 'कौलिकार्थ' (५) 'सर्वरहस्यार्थ' (६) 'महातत्त्वार्थ' ।।३
२. आचार्य भास्करराय के मतानुसार मन्त्रार्थ—'योगिनीहृदय' में तो मात्र
मन्त्रार्थ के उक्त छः प्रकार ही बताए गए हैं किन्तु 'वरिवस्यारहस्यम्' में मन्त्र के
१. स्वच्छन्दतन्त्र २. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक ५२)
३. योगिनीहृदय

ेत".

Line 26:
है ।५ आचार्य वाचस्पति मिश्र कहते हैं कि 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' में 'तत्' का अर्थ
Wait, footnote marker '५' after "है ।".
"है ।५ आचार्य वाचस्पति मिश्र कहते हैं कि 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' में 'तत्' का अर्थ"

Line 27:
है—'तस्य प्रणवस्य'६ अर्थात् 'प्रणव का' । 'भावनं' का अर्थ है—'भावनं पुनः
Wait, footnote marker '६' after प्रणवस्य': "प्रणवस्य'६".
"है—'तस्य प्रणवस्य'६ अर्थात् 'प्रणव का' । 'भावनं' का अर्थ है—'भावनं पुनः"

Line 28:
पुनर्निश्चन्ते निवेशनम्' अर्थात् बार-बार चित्त में निवेशन ।७ प्रणव के जप के साथ
Wait, look at: "पुनर्निश्चन्ते" or "पुनर्निश्चेते"?
Let's zoom in on line 28:
"पु न र्नि श्च न्ते" or "पु न र्नि श्च े ते" or "पुनश्चित्ते"?
Wait! Let's examine the Sanskrit phrase:
In Vacaspati Mishra's Tattvavaisharadi on YS 1.28:

२१६ वरिवस्यारहस्ये
(ख) वाचस्पति मिश्र एवं विज्ञानभिक्षु का मत—वाचस्पति मिश्र कहते हैं
कि—'वाचकत्व' का अर्थ है प्रतिपादकत्व । अर्थात् 'तस्य वाचकः हि प्रणवः' में
'वाचक' पद—शब्द एवं अर्थ के स्वाभाविक संबंध को द्योतित करता है—
'स्वाभाविकः शब्दार्थयो संबंधः सङ्केतेन अस्मात् शब्दात् अयमर्थः ॥' यदि घर नहीं
है तो हजारों दीपों के प्रकाश से भी घर उपस्थित नहीं होगा इसी प्रकार ॐ एवं
उसके अर्थ (ईश्वरत्व) में जो सम्बंध है वह घर-दीपवत नहीं प्रत्युत् नित्य है ।१
अर्थात् मन्त्र एवं उसके मन्त्रार्थ में भी इसी प्रकार नित्य सम्बंध है । अतः मन्त्र के
साथ मन्त्रार्थ का चिन्तन न करना दोनों के नित्य सम्बंध की अवमानना है ।
आचार्य विज्ञानभिक्षु कहते हैं कि 'वाच्यवाचक भावं ज्ञात्वा' 'सह ब्रह्मध्यानं'
(वाच्य वाचक भाव ज्ञात करके एवं ब्रह्मध्यान के साथ) मन्त्र का जप करना
चाहिए ।।२ 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' एवं 'एकः समस्तं यदि हास्ति किंचित्तदत्त्युतो नास्ति
परं ततोऽन्यत् । सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेतदात्मस्वरूपं त्यज् भेदमोहम् ।। के
अनुसार प्रणवार्थ चिन्तन के साथ जप करना चाहिए ।।३
(ग) 'अवस्थाओं' एवं मन्त्रार्थों के ज्ञान के सहित मन्त्रोच्चारण जप है—
'अवस्थायें' क्या हैं? चेतना की निम्न अवस्थायें हैं—(१) जागृति (२) स्वप्न (३)
सुषुप्ति (४) तुरीय (५) तुरीयातीत ॥
(१) जाग्रत अवस्था—दस इन्द्रियों के द्वारा जागतिक व्यापार सम्पन्न कराने
वाली अवस्था ही 'जाग्रतअवस्था' है ।
(२) स्वप्नावस्था—जिस अवस्था में मन-बुद्धि-चित्त-अहङ्कार रूप आन्तर
करणचतुष्टय द्वारा व्यवहार सम्पन्न होता है उसे स्वप्नावस्था कहते हैं ।
(३) सुषुप्त्यवस्था—स्वप्न में विद्यमान अन्तःकारण की वृत्तियों का लय हो
जाने पर (इन्द्रियों के उपरमस्वरूप) जिस अवस्था का उदय होता है उसे सुषुप्ति
अवस्था कहते हैं ।
४. तुरीय अवस्था—स्वात्म चैतन्य के अभिव्यक्त के हेतुभूत नाद के
आविर्भाव को ही 'तुरीय' कहते हैं ।
५. तुरीयातीतावस्था—यह परमानन्दावस्था है । यह मन के वाणी के अतीत
अवस्था है । पञ्चावस्थाओं का अवस्थान इस प्रकार है—
(क) 'जाग्रतावस्था'—'अ'४ ⎤ 'अ' 'उ' एवं 'म' = जाग्रता, स्वप्न एवं
(ख) 'स्वप्नावस्था'—'उ'५ ⎥ सुषुप्ति के द्योतक हैं । अगले अवयव
⎦ 'तुरीय' एवं 'तुरीयातीत' के द्योतक हैं ।
१. योगवार्तिक (विज्ञानभिक्षु) २. तत्त्ववैशारदी
३. योगवार्तिक (विज्ञानभिक्षु)
४. इन्द्रियशक्यव्यवहतिरूपा या जागरावस्था
५. अन्तःकरणचतुष्कव्यवहारः स्वाप्निकावस्था

प्रथमोऽंशः २१७
(ग) ‘सुषुप्त्यवस्था’—‘म’१ ┐ सुषुप्ति भावना का स्थान भ्रूमध्य के बिन्दु
│ में हैं । यह बिन्दु हल्लेखा को ऊर्ध्व बिन्दु
┘ है ।
(घ) ‘तुरीयावस्था’२ ┐ अर्धचन्द्र, रोधिनी, और नाद इन तीन
┘ मन्त्रावयवों को तुरीयावस्था माननी चाहिए ।
(ङ) ‘तुरीयातीतावस्था’३ ┐ नादान्त से शक्ति, व्यापिनी एवं समना में
│ तथा उन्मना में तुरीयातीतावस्था है । उन्मना
┘ से परे कोई अवस्था है ही नहीं ।
अर्धमात्रा आदि में प्रतिकलित चैतन्य ही ‘मन्त्र’ है । मन की मात्रा जितनी ही
प्रसृत होती है मन का उतना ही अंश क्षुद्रतर होता जाता है और उसी अनुपात में
उतना ही चिदालोक शुभ्रतर होता जाता है । ‘बिन्दु’ मात्रा से मात्राहीन में जाने का
द्वार है । यहाँ ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुरी एकाकार है—यह निरालम्ब भाव का स्थान
है । मात्रा-भङ्ग के कारण अर्द्धमात्रा का उदय होता है ।
(घ) ‘अवस्था’, ‘मन्त्रार्थ’ के साथ ‘शून्य’-ज्ञान सहित मन्त्रोच्चारण ‘‘जप’’
है—‘जप’ का एक अङ्ग शून्य-ज्ञान भी है । बीजमन्त्र (ओंकार) के १२ अवयव
हैं । ज्योतिर्मय एकाकारता ही ‘शून्य’ है । द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम दशम एवं
द्वादश अवयव ‘शून्य’ कहलाते हैं । इनमें प्रथम पाँच शून्य ‘अवान्तर शून्य’ एवं
छठवाँ ‘महाशून्य’ कहलाता हैं ।
अ, उ, म, बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी समना
एवं उन्मना—प्रणवरूप महामन्त्र के ये ही बारह अवयव हैं । इनमें से प्रति द्वितीय
अवयव ‘शून्य’ कहलाता है । प्रथम पाँच शून्यों को तो निराकार कहना समीचीन
नहीं किन्तु छठवाँ शून्य निराकार है । भास्कर कहते हैं कि—तृतीय कूट के रेक,
बिन्दु, रोधिनी, नादान्त एवं व्यापिका में पाँच शून्यों की भावना करनी चाहिए और
उन्मनी में रूप शून्य महाशून्य की भावना करनी चाहिए ।। रेफ, बिन्दु, निरोधिनी,
नादान्त एवं नादान्त में पञ्च शून्यों की भावना करनी चाहिए । (दीपिका पृ०
३१२) । पाँचवे के बाद छठवें शून्य के रूप में उन्मनी को ग्रहण करना चाहिए ।
यह महाशून्य है और निराकार है । (दीपिका पृ० ३१२) जब तक मन जाग्रत
नहीं होता तब तक मन्त्र का मन्त्रत्व उदित ही नहीं होता सुषुम्ना का स्रोत चैतन्य
का प्रवाह है । मन को जगाकर ऊर्ध्वमुखी सुषुम्ना की धारा में डालना होगा । मन
को चेतन करके उठाना होगा । यह जाग्रत मन ही मन्त्र है इसीलिए ‘चित्तं मन्त्रः’
१. आन्तरवृत्तेर्लयतो लीनप्रायस्य जीवस्य । वेदनमेव सुषुप्तिश्चिन्तया तार्तीय बिन्दौ
सा ।—वरिवस्यारहस्यम्
२. तुर्यावस्था चिदभिव्यञ्जक नादस्य वेदनं प्रोक्तम् ।।
३. आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् । तुर्यातीतावस्था सा
नादान्तादिपञ्चके भाव्या ।।—वरिवस्यारहस्यम्

२१८ वरिवस्यारहस्ये
(शिवसूत्र) कहा गया है । मन का भागांश इस प्रकार है— (१) बिन्दु में १/२
मात्रा (२) अर्द्धचन्द्र में १।४ मात्रा (३) निरोधिनी में १।८ मात्रा (४) नाद में
१।१६ मात्रा (५) नादान्त में १।३२ मात्रा (६) शक्ति में १।६४ मात्रा (७)
व्यापिनी में १।१२८ (८) समना में १।१२८ मात्रा = बिन्दु से समना तक की
समस्त मात्राओं का जोड़ १ मात्रा है ।
(ङ) अवस्था, मन्त्रार्थ-विज्ञान, शून्य-ज्ञान एवं विषुवसप्तक के साथ
मन्त्रोच्चारण करना जप है ।
इन विषुवों का निम्न इस प्रकार है—(१) 'प्राणविषुव' (२) मन्त्रविषुव (३)
नाड़ीविषुव (४) प्रशान्तविषुव (५) शक्तिविषुव (६) कालविषुव (७) तत्त्वविषुव ॥
१. प्राणविषुव—प्राण, आत्मा एवं मन के संयोग को 'प्राणविषुव' कहते हैं ।१
२. मन्त्रविषुव—प्रथम कूट के नाद एवं व्यष्टि-समष्टि भेद से अनाहत से
आरम्भ करके ब्रह्मरन्ध्र तक उत्पन्न होने वाले नाद एवं चारों बीज तथा आत्मा की
नादमयी विभावना को 'मन्त्र विषुव' कहते हैं ।
३. नाड़ीविषुव—मूलाधार से उठने वाले नाद के उच्चारण से ब्रह्मरन्ध्र तक
षट्चक्रों की द्वादश ग्रन्थियों को सुषुम्ना के मार्ग से ही ग्रन्थियों का भेदन करता
हुआ नाडी, नाद एवं वर्णों का संयोग 'नाडिका विषुव' कहा जाता है ।
४. प्रशान्तविषुव—रेफ एवं कामकला (ई) एवं बिन्दु से आरम्भ करके ह्रीं के
नादान्त तक एक सूक्ष्मतर नाद उत्पन्न होता है । इस सूक्ष्मनाद का शक्ति के साथ
विलय की 'प्रशान्त विषुव' कहा जाता है ।
५. शक्तिविषुव—शक्ति के साथ लीन इस नाद की भावना को 'समना' में
लीन करनी चाहिए । इसे 'शक्तिविषुव' कहा जाता है—
समनागतमुन्मन्याभेते द्वे शक्तिकाल विषुवाख्ये ॥२
इसमें, शक्त्यन्तर्गतनादं समनायां भावयेल्लीनाम् ॥३
६. कालविषुव—उक्त नाद की भावना समना एवं उन्मनी में करना 'काल
विषुव' कहलाता है ।४
७. तत्त्वविषुव—ककार से उन्मना तक एवं अकुल से उन्मना तक प्रदेशों में
स्थित श्रीविद्याकूटों के अवयवों को व्याप्त करते हुए समस्त ३१७ त्रुटियों एवं साढे
तीन निमेषों को व्याप्त करता हुआ 'नाद' तत्त्व ज्ञान का कारण होता है । यह
शुद्ध चैतन्य की अभिव्यक्ति का मूल हेतु 'तत्त्व विषुव' कहलाता है ।५
१. प्राणात्ममानसानां संयोगः प्राणविषुवाख्याः ॥ (वरिवस्यारहस्यम् १।४३)
२. योगः प्राणात्म मनसां विषुवं प्राणसंज्ञितम् । (योगिनीहृदयम्)
३-५. वरिवस्यारहस्यम्

प्रथमोऽंशः २१९
(च) 'अवस्था', 'मन्त्रार्थ', 'शून्य', 'विषुव' के साथ 'चक्रों के ज्ञान के साथ
मन्त्रोच्चारण करना 'जप' है ।
अकुल सहस्रार-मूलाधार-स्वाधिष्ठान-मणिपूरक-अनाहत-विशुद्धाख्य । सूक्ष्म
जिह्वा; भ्रूमध्य एवं बिन्दुस्थान—इन नौ स्थानों में त्रैलोक्यमोहन आदि चक्रनवक
का भावन करना भी जप का एक अङ्ग है—
१. अकुल सुषुम्नामूल अरुण सहस्रदल कमल में—त्रिपुराधिष्ठित त्रैलोक्यमोहन
चक्र की भावना करना ।¹
२. वह्नि के आधाररूप चतुर्दल कमल में—त्रिपुरेशी से अधिष्ठित
सर्वाशापरिपूरक चक्र की भावना करना ।²
३. शाक्त स्वाधिष्ठान स्थित षड्दल कमल में—त्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित
सर्वसंक्षोभण चक्र की भावना करना ।³
४. नाभि प्रदेश में स्थित दशदलकमल में त्रिपुरवासिनी देवी से अधिष्ठित
सर्वसौभाग्यदायक चक्र की भावना करना ।⁴
५. अनाहत प्रदेश के द्वादशदल कमल में त्रिपुरा श्रीसमधिष्ठित सर्वार्थसाधक
चक्र की भावना करना ।⁵
६. विशुद्धचक्र के षोडशदल कमल में त्रिपुरमालिनी से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर
चक्र की भावना करना ।⁶
७. लम्बिकाग्र में तालूमूल के अष्टदलकमल में त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित
सर्वरोगहर चक्र की भावना करना ।
८. भ्रूद्वय के मध्य द्विदल पद्म में त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रद चक्र
की भावना करना ।⁷
९. इन्द्रात्मक ललाट के बिन्दु में महात्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय
चक्र की भावना करना⁸ ही जप के साथ 'चक्रभावन' की पद्धति है ।
चक्रभावना का यह विधान 'योगिनीहृदय' में भी प्रतिपादित किया गया है—
“अकुलादिषुपूर्वोक्त स्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥'⁹
आचार्य भास्कर का कथन है कि—'सङ्केतपद्धति' आदि ग्रन्थों में 'चक्रभावन'
के तीन प्रकार कहे गए हैं—(१) सकल (२) निष्कल (३) सकल निष्कल ॥
शून्य—'विज्ञानभैरव' के ३२वें श्लोकं में 'शून्यषट्क' एवं ४४वें श्लोक में
शून्य त्रय की भावना का उल्लेख है इसी प्रकार—'योगिनीहृदय' में भी 'शून्यषट्क'
एवं 'शून्यत्रय' का उल्लेख किया गया है—'शून्यषट्कं तथा देवि ह्यवस्था पञ्चकं
पुनः' 'शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरतः प्रिये ॥' शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं
१-९. अमृतानन्दनाथ—दीपिका

२२० वरिवस्यारहस्ये
विभावयेत ॥ (३।१७६-१७७) 'स्वच्छन्दतन्त्र' (४।२८९-२९६) में भी शून्यषट्कं
का उल्लेख पाया जाता है । योगिनीहृदयदीपिका में अमृतानन्दनाथ ने कहा कि छः
शून्यों के स्वरूप को 'विज्ञानभैरव' के ३२वें श्लोक से जानना चाहिए ।
'स्वच्छन्दतन्त्र' के अनुसार—(१) ऊर्ध्वशून्य (२) अधःशून्य (३) मध्य
शून्य-शून्यत्रय हैं । क्षेमराज ने—(१) शक्तिपद को—ऊर्ध्वशून्य (२) हृदय को अधः
शून्य एवं (३) कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र को 'मध्यशून्य' माना है एवं
'व्यापिनी' में चतुर्थ, 'समना' में पञ्चम एवं 'उन्मना' में 'षष्ठ शून्य' माना है ।
उन्होंने इन सभी सहेतुक शून्यों का त्याग करके 'सप्तम शून्य' (परमसूक्ष्म शून्य) में
लीन होने का विधान किया है । उन्होंने कहा कि शून्य दो प्रकार के हैं—(१)
अभावा

प्रथमोऽंशः २२१

  • प्रकाश *
    इति श्रीनृसिंहानन्दनाथचरणाराधकेन भास्कररायापरनाम्ना भासुरानन्दनाथेनोन्मीते
    वरिवस्यारहस्ये तत्प्रकाशे च प्रथमोऽंशः
  • सरोजिनी *
    गुरोः करुणावशतः—गुरु की अनुकम्पा के कारण ॥ ग्रन्थकार प्रस्तुत
    ग्रन्थ-रचना का के कर्तृत्व एवं प्रणयन-गौरव का श्रेय स्वयं नहीं लेना चाहता प्रत्युत्
    इसे अपने गुरु को समर्पित करना चाहता है । इसका कारण क्या है? प्रथम
    कारण तो यह है कि ऐसा करके शिष्य गुरु द्वारा प्रयन्त ज्ञान के ऋण से मुक्त हो
    जाता है दूसरे अपने कर्तृत्व में गुरु के शक्ति-सञ्चार को अनुभव करने से
    ग्रन्थकार की अहङ्कार विमुक्त चेतना और अधिक निर्मल, व्यापक, सूक्ष्म, एवं
    शक्तिशाली होती जाती है । इसके अतिरिक्त 'गुरु' शब्द मङ्गलवाची भी है
    क्योंकि—'गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेफः पापस्य दाहकः । उकारः शम्भुरित्युक्त
    स्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ॥'१
    एक बात यह है कि प्रत्येक साधक ग्रन्थकार इष्टदेवता को प्रसन्न करना
    चाहता है । इस दृष्टि से देखें तो भी गुरु के प्रति निष्ठा आवश्यक है क्योंकि—
    गुरुप्रीति समुत्पन्ने देवता प्रीतिमाप्नुयात् ।
    देवताप्रीतिमापन्ने मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥२
    “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
    अतएव महेशानि साक्षाद् ब्रह्ममयो गुरुः ॥'३
    ॥ इस प्रकार वरिवस्यारहस्य के प्रथमोऽंश की डॉ० श्यामाकान्त द्विवेदी कृत
    'सरोजिनी' नामक हिन्दी टीका पूर्ण हुई ॥
    ―― * ――
    १. यामल २-३. कुलार्णव—शाक्तानन्द तरंगिणी

द्वितीयोंऽशः
जपलक्षणशरीरघटकत्वेन
'यदधीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते ।
अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥'
इत्यर्थज्ञानरहितशब्दोच्चारणस्य निन्दया पापानुमानाच्चार्थज्ञानमावश्यक-
मित्याह—
नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥ ५४ ॥
अर्थमजानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ ५५ ॥
(अर्थ-ज्ञान-शून्य अनुष्ठित जप की व्यर्थता)
अर्थ का सम्यक् ज्ञान हुए बिना शब्दोच्चारण कोई फल नहीं देता । (यथा)
अग्निशून्य भस्म में समर्पित हविष्य नहीं जल पाता ॥ ५४ ॥
अर्थ को न जानते हुए भी विविध प्रकार के शब्दमात्र का पाठ करने वालों
की उपमा चनदन के भार को ढोने वाले (किन्तु चन्दन के गुणों को न जानने
वाले) गर्दन से ही दी जा सकती है ॥ ५५ ॥
* प्रकाश *
चक्रीवान् गर्दभः । यद्यपि 'यथा खरश्चन्दनभारवाही' इति श्रुतौ खरस्यैवोप-
मानता, तथापि सादृश्यनिरूपकगुणाधिक्यवत एवोपमानत्वात् तदाधिक्यव्यञ्जनाय
प्रतीपालङ्कार इवोपमानोपमेययोर्व्यत्यासः ॥ ५४-५५ ॥
* सरोजिनी *
'नार्थ............फलति'—अर्थज्ञान के अभाव में किसी भी मन्त्र का जप
फलीभूत नहीं होता । चूँकि प्रत्येक मन्त्र-जापी अपने देवता के साक्षात्कार को ही

द्वितीयोंऽशः २२३
अपना प्रधान लक्ष्य मानता है किन्तु मन्त्र अर्थ ही तो देवता होता है अतः मन्त्र
का अर्थ जाने बिना देवता का साक्षात्कार कैसे हो सकता है ? 'शाक्तानन्दतरंगिणी'
में कहा गया है—'मन्त्रार्थं देवतां रूपं चिन्तनं परमेश्वरि । वाच्यवाचक भावेन अभेदो
मन्त्रदेवयोः ॥'१ 'देवता' वाच्य है 'मन्त्र' वाचक है—'वाच्या हि देवता देवमन्त्रोहि
वाचकः स्मृतः ॥'२ वाचक के ज्ञात होने पर स्वतः वाच्य भी प्रसन्न होता है—
“वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव प्रसीदति ॥”
जिस-जिस मन्त्र का जो-जो देवता हो उसके आकार का चिन्तन करके ही—
अर्थात् मन्त्र का देवता रूप अर्थ समझकर एवं उसका ध्यान करके जप करना
चाहिए—
“यस्य यस्य च मन्त्रस्य उद्दिष्टा या च देवता ।
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जप माचरेत ॥”३
'कुलार्णवतन्त्र' में तो यहाँ तक कहा गया है कि जिस भी मन्त्र का जप
करना हो साधक को 'तन्निष्ठ' 'तद्गतप्राण' 'तच्चित्त' 'तत्परायण' होकर उस पदार्थ
का अर्थानुसंधान करते हुए मन्त्र का जप करना चाहिए४—
तन्निष्ठस्तद्गत प्राणस्तच्चित्तस्तत् परायणः ।
तत्पदार्थानुसंधानं कुर्वन्मन्त्रं जपेत् प्रिये ॥
आदि में मन्त्र के अर्थस्वरूप देवता का ध्यान करना चाहिए । इसके बाद
अंत में भी मन्त्र के अर्थस्वरूप देवता का ध्यान करना चाहिए एवं इस प्रकार
ध्यानपूर्वक मन्त्र जप करना चाहिए ।
आदौ ध्यानं ततोमन्त्रं ध्यानस्यान्ते मनुं जपेत् ।
ध्यान मन्त्रसमायुक्तः शीर्घ सिध्यति साधकः ॥५
“यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य” । खर की
उपमानता । सादृश्य निरूपकगुणाधिक्यवत् उपमान से तदाधिक्य के भाव की
अभिव्यञ्जना हेतु ‘प्रतीपालङ्कार’ का प्रयोग किया गया है जिसमें ‘इव’ शब्द द्वारा
उपमानोपमेयों के व्यत्यास को व्यक्त किया गया है ।
पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थाः परिज्ञेयाः ।
अर्थनादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥ ५६ ॥
(मन्त्रार्थों का परिज्ञान आवश्यक क्यों?)
पुरुषार्थों (धर्मार्थ काम मोक्ष) की आकांक्षा रखने वाले लोगों को (मन्त्रों के)
अर्थों का परिज्ञान होना चाहिए । (मन्त्रों के अर्थों के प्रति) तिरस्कार का
भाव रखने वालों के लिए अर्थ (अभीष्ट) की प्राप्ति नहीं प्रत्युत् अनर्थ की प्राप्ति
होती है ॥ ५६ ॥
१-५. शाक्तानन्द तरंगिणी

२२४ वरिवस्यारहस्ये

  • प्रकाश *
    एतेनार्थज्ञानस्य नित्यत्वमुक्तं भवति ॥ ५६ ॥
  • सरोजिनी *
    भास्करराय कहते हैं कि जो व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की आकांक्षा
    रखते हैं उन्हें अपने आकांक्षा की इस पूर्ति के लिए मन्त्रों के अर्थों को जानना
    अत्यावश्यक है । जो लोग मन्त्रार्थ के प्रति उपेक्षा दृष्टि रखते हैं उन्हें
    स्वाभीष्ट-प्राप्ति की बात तो दूर अनर्थों का सामना करना पड़ता है । आचार्य
    भास्कर श्लोकान्तर से इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं कि चन्दन की लकड़ियों का
    बोझ लादे हुए गधा जिस प्रकार चन्दन के बोझ मात्र को जानता है चन्दन के गुणों
    को नहीं अतः उसे चन्दन को बोझ की दृष्टि से देखने के कारण चन्दन से कष्ट
    ही प्राप्त होता है और चन्दन का अर्थ—'बोझ' (दुःख, पीड़ाकारक वस्तु) ही
    समझ में आता है उसे चन्दन के शीतलत्व, सुगंधि, मनमोहकता एवं मनः प्रसादत्व
    का गुण प्राप्त नहीं । होता ठीक उसी प्रकार मन्त्रार्थ ज्ञान-शून्य शब्दसङ्गठित मन्त्र
    के जाप से अनर्थ-ही प्राप्त होता है कोई लाभ प्राप्त नहीं होता—
    “नार्थ ज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
    भस्मनि वह्नि विहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥ ५४ ॥
    अर्थमजानानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
    उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ ५५ ॥”१
    यह मन्त्रार्थविहीन मन्त्रों का उच्चारण भास्करराय की दृष्टि में उ
    ‘शब्दस्योच्चारण’ मात्र है । यह ऐसा प्रयास है यथा—वह्निविहीन भस्म में हवि
    डालना—‘भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥’ इसके अतिरिक्त उसकी
    दशा गधे की भाँति है—‘‘यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ॥’’
    निष्कर्ष—‘यद धीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते ।
    अनग्नाविव शुष्कौधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥’
    जो व्यक्ति मन्त्रार्थ—विरमित मन्त्र का जप करता है वह दरिद्रता, विपत्ति एवं
    नरक तीनों को आमंत्रित करता है—
    श्रोत्रादीनां ज्ञानाभावे मन्त्रजापं करोति यः ।
    दारिद्र्यं च विपत्ति च नरकं प्राप्नुयातु सः ॥२
    ‘यामल’ में कहा गया है कि ‘‘मन्त्र का अर्थ देवता है’’ और ‘‘मन्त्र एवं
    देवता में वाच्यवाचकभावेन अभेद है’’—‘‘मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि ।
    वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ॥’’३ ‘मन्त्र’ वाचक है और ‘देवता’ वाच्य है

१. वरिवस्यारहस्यम् २-३. शाक्तानन्द तरंगिणी

द्वितीयोऽंशः २२५
‘वाच्या हि देवता देवमन्त्रो हि वाचकः स्मृतः । वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव
प्रसीदति ।।’’ इसीलिए भगवान शिव पार्वती को सावधान करते हुए कहते हैं—
“मन्त्रार्थं परमेशानि सावधानावधारय”१ ‘योगशास्त्र’ में अर्थभावन के साथ ही जप
का विधान किया गया है—‘तज्जपस्तदर्थभावनम्’२
ते चार्थस्तन्त्रोपनिषद्ग्रन्थभेदेन नानाविधाः शिवेनोक्ताः । तांश्च संजिघृक्षुरु-
द्दिशति—
अथातः पूर्णगायत्र्याः प्रतिपाद्योऽर्थ आदिमः ।
भावार्थः संप्रदायार्थो निगर्भार्थस्तुरीयकः ॥ ५७ ॥
कौलिकार्थो रहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च ।
नामार्थः शब्दरूपार्थश्चार्थो नामैकदेशगः ॥ ५८ ॥
शाक्तार्थः सामरस्यार्थः समस्तसगुणार्थकौ ।
महावाक्यार्थ इत्यर्थाः पञ्चदश्याः स्वसंमिताः ॥ ५९ ॥
(अर्थों के विभिन्न भेद)
इसलिए इसके अनन्तर सर्वप्रथम पूर्ण गायत्री (चरणचतुष्टयसम्पन्ना गायत्री
मन्त्र) के प्रतिपाद्य अर्थ फिर भावार्थ, संप्रदायार्थ, चौथा निगर्भार्थ, कौलिकार्थ,
रहस्यार्थ, महातत्त्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ, सामरस्यार्थ,
समस्तार्थ, सगुणार्थ एवं महावाक्यार्थ—अर्थात् उतने अर्थ जितने कि पञ्चदशी मन्त्र
के अपने वर्ण हैं—की मीमांसा की जाएगी ॥ ५७-५९ ॥

  • प्रकाश *
    अथानन्तरम्, अत उक्तरीत्या अर्थज्ञानस्यावश्यकत्वात्, अर्थाः कथ्यन्त इति
    शेषः । पूर्णगायत्र्याश्चतुर्थचरणसहितायाः । स्व आत्मीया वर्णाः तैः संमिताः, तत्संख्या-
    समानसंख्याकाः । पञ्चदशेति यावत् । अथ वा, संप्रदायार्थप्रकरणे कादिविद्यायां
    सप्तत्रिंशद्वर्णाः स्फुटीकरिष्यन्ते, तत्संमिता अर्था इत्यर्थः ॥ ५७-५९ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘भावार्थ’—मन्त्र के अवयवभूत अक्षर का अर्थ ही ‘भावार्थ’ है । ‘संप्रदायार्थ’
    = (परमेश्वर ही मन्त्रों के मूल हैं) अतः गुरुमुख से स्वीय मन्त्र का उद्भव एवं
    उसका अवतरण-क्रम या परम्परा का ज्ञान मन्त्र का ‘संप्रदायार्थ’ है । ‘निगर्भार्थ’—
    परमेश्वर, गुरु एवं निजात्मा का ऐक्यानुसन्धान ही निगर्भार्थ है । ‘कौलिकार्थ’ =
    (निष्कल परमेश्वर का जिन्होंने स्वात्मरूप में साक्षात्कार किया है वही गुरु है । अतः
    गुरु एवं परमेश्वर अभिन्न हैं 1) चक्र, देवता, विद्या, गुरु एवं साधक का
    १. शाक्तानन्द तरंगिणी २. योगसूत्र
    १५ वरि.

२२६ वरिवस्यारहस्ये
ऐक्यानुसन्धान ही मन्त्र का 'कौलिकार्थ' है। 'रहस्यार्थ'—मूलाधारस्थ कुण्डलिनीरूपा
विद्या ही साधक की स्वात्मा है—इस रूप की भावना का नाम ही 'रहस्यार्थ' है।
'महातत्त्वार्थ' = निष्कल अणु से अणुतर, तथा महान् से महत्तर, निर्लक्ष्य,
भावातीतः, व्योमातीत परमतत्त्व के साथ प्रकाशानन्द रूप में विश्वातीतः एवं विश्वमय
निज गुरु के द्वारा प्रबोधित निर्मलस्वभाव स्वकीय आत्मा का ऐक्यानुप्रवेश
'महातत्त्वार्थ' है। इन समस्त अर्थों के परिज्ञान से पाशात्मक विकल्प जाल सम्यक्
प्रकार से निवृत्त हो जाते हैं ।१
१. 'भावार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—अम्बा (देवी) मन्त्र एवं
जगत् में अभेद का प्रतिपादन 'भावार्थ' है—'तेनाम्बामनुजगतामभेद एवात्र
भावार्थः ॥'२
२. 'सम्प्रदायार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—कार्य एवं कारण, वाच्य
एवं वाचक, ब्रह्म एवं जगत् में अभेद होने के समान ही जगत् एवं विद्या
में भेदाभाव का प्रतिपादन ही 'संप्रदायार्थ' है।
'योगिनीहृदय' में षड्विध अर्थ—'योगिनीहृदय' में निम्न छः प्रकार के मन्त्रार्थों
का विवेचन किया गया है जो निम्न है—"षड्विधस्तं तु देवेशि ! कथयामि
तवानघे। भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भार्थश्च कौलिकः रहस्यार्थो गहातत्वार्थ एव च ।
अथराथों हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।।" (१५, १६) १. भावार्थ २. सम्प्रदायार्थ
३. निगर्भार्थ ४. कौलिकार्थ ५. सर्वरहस्यार्थ ६. महातत्त्वार्थ ।। (मन्त्र सङ्केत) ।।
'नामार्थ' 'शब्दरूपार्थ' 'नामैकदेशार्थ' 'शाक्तार्थ' 'सामरस्यार्थ' 'समस्तार्थ'
'सगुणार्थ' एवं 'महावाक्यार्थ'—ये आठ अर्थ भास्करराय के स्वकल्पित नये अर्थ हैं
जो कि 'योगिनीहृदय' में उल्लिखित नहीं है ।
जगत् एवं विद्या में अभेद है—यही 'संप्रदायार्थ' है३—
“जन्यजनकयोर्भेदाभावाद वाच्यस्य वाचकेनापि ।
ब्रह्मणो जगतो जगति च विद्याभेदस्तु संप्रदायार्थः ।। ८१ ।।”
३. 'निगर्भार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—'निगर्भार्थ' का स्वरूप इस
प्रकार है—"सर्वातिशायी सत्त्व परमशिव में एकात्मकता या अन्य पदार्थों
का अभाव (निष्कलत्ता), अपने दीक्षा गुरु एवं उस परमशिव में अभेद
तथा उस (गुरु) की कृपावश अपने एवं उस परमशिव में अभेद-दर्शन ही
निगर्भार्थ है"—
१. भारतीय संस्कृति और साधना (प्र०ख०) (पृ० ३३९-३४०)
२. 'अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।'
कूटत्रयात्मिका देवी समष्टि व्यष्टि रूपिणीम् ।
आद्यां शक्ति भावयन्तो भावार्थमिति मन्वते ।। २५ ।। (योगिनीहृदय)
३. तथा मन्त्राः समस्ताश्च विद्यायामन्त्र संस्थिताः ।। ४७ ।। (योगिनीहृदय)
गुरुक्रमेण संप्राप्तः संप्रदायार्थ ईरितः ।।

द्वितीयोऽंशः २२७
“परमशिवे निष्कलता तदभिन्नत्वं स्वदेशिकेन्द्रस्य ।
तत्करुणातः स्वस्मिन्नपि तदभेदो निगर्भार्थः ॥”
४. ‘कौलिकार्थ’—वरिवस्यारहस्यम् के अनुसार—माता, विद्या, चक्र स्वगुरु
एवं स्वयं में—(इस प्रकार पाँचों में) अभेदभावना ही मन्त्र का पञ्चनामपि
भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ १०२ ॥१
५. ‘रहस्यार्थ’—कुण्डलिनी साक्षात् विद्या एवं माता से अभिन्न है । इससे
अपने को अभिन्न देखना ही श्रीविद्या का रहस्यार्थ है—
“साक्षाद्विद्यैवैषा न ततोभिन्ना जगन्माता ।
अस्याः स्वाभिन्नत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थः ॥ १०७ ॥”
६. ‘महातत्त्वार्थ’—वाणी, मन एवं इन्द्रियों द्वारा अगम्य (३६ तत्त्वों से
अतीत) महान से महत्तर, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, व्योम से भी ऊपर स्थित,
विश्व से अभिन्न, चित् एवं आनन्दस्वरूप परब्रह्म में अपने आपको उस
(ब्रह्म के साथ) अभेद की प्राप्ति के लिए नियुक्त करना चाहिए, यह
श्रीविद्या का ‘महातत्त्वार्थ’ है—
“ब्रह्मणि परे नियोज्यः स्वात्मा तद्भेदसंप्राप्त्यै ।
एष भहातत्त्वार्थः श्रीविद्यायाः शिवेनोक्तः ॥ १०९ ॥”
७. ‘नामार्थ’—एवं ‘शब्दरूपार्थ’—यह विद्या स्वयं अपने घटक अक्षरों द्वारा
व्यक्त अर्थों से अभिन्न है । उसका स्वरूप उसका प्रत्येक अक्षर है ।
श्रीविद्या के ‘नामार्थ’ एवं ‘शब्दरूपार्थ’ का यही स्वरूप है—
“तत्तद्वर्णार्थेयं तत्तद्वर्णस्वरूपेयम् ।
इति तु श्रीविद्याया नामार्थः शब्दरूपार्थः ॥”
८. नामैकदेशार्थ—कल्याणी एकाक्षरी, ईशित्री, ललिता आदि देवी के तीन
सौ नामों का तात्पर्य मन्त्र के आदि अक्षरों द्वारा व्यक्त होता है नाम के

१. कौलिकं कथयिष्यामि चक्रदेवतयोरपि ॥ ५१ ॥ (योगिनीहृदय)
विद्यागुर्वात्मनामैक्यं तत्प्रकारः प्रदर्श्यते ॥
‘चक्र-देवता-गुरु-विद्या-साधकानामैक्यानुसन्धानं कौलिकार्थः ॥ (दीपिका) ॥
शिव-गुर्वात्मैक्यगोचरानुसंधानात्मको निगर्भार्थः ॥ (दीपिका) ‘श्रीचक्रं श्रीमाता श्रीविद्या
श्रीगुरुरात्मा चेति पंचानामैक्यं कौलिकार्थ इत्युच्यते । (सेतुबन्ध : भास्करराय)
२. महातत्त्वार्थ इति यत्तच्च देवि ! वदामि ते ।
निष्कले परमे सूक्ष्मे निर्लक्ष्ये भाववर्जिते ॥ ७३ ॥ (योगिनीहृदय)
व्योमातीते परे तत्त्वे प्रकाशानन्द विग्रहे ।
विश्वोत्तीर्णे विश्वमये तत्त्वे स्वात्मनियोजनम् ॥ ७४ ॥ (योगिनीहृदय)
परमशिवरूपे निजगुरु प्रबोधित निर्मलस्वभाव स्वात्मनि ।
योजनं तदेकतानुप्रवेशो महातत्त्वार्थः । (अमृतानन्दनाथः—दीपिका)

२२८ वरिवस्यारहस्ये
एक देश (अंश) के ग्रहण द्वारा समस्त नाम ग्रहण का बोध' लोक
प्रसिद्ध है । अतः समस्त नाम का अर्थ नाम के एक अंश का अर्थ
हुआ ॥ १११-११२ ॥ “नामैकदेशमात्रे नामग्रहणस्य लोकसिद्धत्वात् ।
नामोपस्थितिगम्यः प्रोक्तो नामैकदेशार्थः ॥”
९. 'शाक्तार्थ'—शाक्तों की मान्यतानुसार प्रत्येक अक्षर में शक्ति है तथा
अक्षरों एवं वामा, इच्छा तथा अन्य शक्तियों में अभेद है—यही 'शाक्तार्थ'
है ।१
१०. सामरस्यार्थ—'क' एवं 'ह' तथा 'ल' एवं 'स' का अर्थ है—'शक्ति' ॥
हल्लेखा (ह्रीं) का अर्थ शिव एवं शक्ति का सामरस्य रूप परब्रह्म
है ॥ ११९ ॥ उक्त तीनों कूटों में से प्रत्येक का अर्थ है । “शिव एवं
शक्ति के सामरस्य के कारण ब्रह्म ही शिव एवं शक्ति दोनों ही है ।”
यह विद्या का 'सामरस्यार्थ' है ॥ १२० ॥२
११. 'समस्तार्थ'—श्रीविद्या के 'समस्तार्थ' के अन्तर्गत अनेक पदों एवं गुणों
का समास समस्त पुरुषार्थों के साधन का संक्षिप्त एवं सार कथन आता
है ।३
१२. 'सगुणार्थ'—समस्त गुण गण के कथन द्वारा विद्या का सगुणार्थ व्यक्त
होता है—'इत्थं गुण गण कथनाद्विद्याया एष सगुणार्थः ॥'४
१३. 'महावाक्यार्थ'—'ह' 'स' आनन्द, 'क' सत्य, 'ह' अनन्त एवं 'ल'
ज्ञान है । इस प्रकार तटस्थ एवं स्वरूप लक्षणों द्वारा ब्रह्म का निर्णय
करके (यह विद्या) तुरीय कूट के द्वारा ब्रह्म एवं जीव का तादात्म्य
(अभिन्नता अभेदात्मकता) स्थिर करती है । 'स' 'क' 'ल' पद जीव का
वाचक है जिसकी जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति नामक तीन कलायें हैं ।
शक्ति बीज 'ह्रीं' ब्रह्म का वाचक है । उक्त दोनों में सामानाधिकरण्य होने
के कारण उनके द्वारा लक्षित शुद्ध वस्तुएँ अभिन्न हैं । तृतीय कूट होने
के कारण उनके द्वारा लक्षित शुद्ध वस्तुएँ अभिन्न हैं । तृतीय कूट के
'स' 'क' 'ल' पदों का अभिप्राय है—यह सब ब्रह्म है ।' इस प्रकार जीव
एवं ब्रह्म के स्वरूप का लाक्षणिक वाक्यों द्वारा वर्णन करके उनका अभेद
स्थिर किया गया । यही 'महावाक्यार्थ' है ।
“अथातः”—'अथ' = इसके अनन्तर (अर्थात् उक्त रीति से अर्थ ज्ञान के
अवश्यिकत्व के द्वारा अर्थों पर प्रकाश डाला जा रहा है ।) पूर्ण गायत्री = चतुर्थ
चरण सहित गायत्री । 'स्व' = आत्मीय आत्मीय वर्ण । 'संमिताः' = उन-उन वर्णों
से संमित । अर्थात् तत्संख्या समान संख्यक (१५) ॥ या संप्रदायार्थ के प्रकरण में
समागत-'कादिविद्या' में सप्तत्रिंश (३७) वर्णों से स्फुरीकृत किया जायेगा और उस
दिशा में अर्थ होगा—'तत्संमित' ॥
१-४. वरिवस्यारहस्यम्

द्वितीयोंऽशः २२९
त्रिपुरोपनिषदि प्रतिपादितं गायत्र्यर्थमाह—
कामयते स ककारः कामो ब्रह्मैव तत्पदस्यार्थः ।
सवितुर्वरेण्यमिति वै सवितुः श्रेष्ठं द्वितीयवर्णार्थः ॥ ६० ॥
(गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र के मन्त्राक्षरो के अर्थ में साम्य का प्रतिपादन)
जो कामना करता है वह कामेश्वर ही 'ककार' है । 'तत्' पद का अर्थ है—
ब्रह्म । द्वितीयाक्षर ('पञ्चदशी मन्त्र' का द्वितीयाक्षर) 'ए' 'सवितुर्वरेण्यम्' का अर्थ
देता है जो कि जन्मदात्री कामेश्वरी का वाचक है ॥ ६० ॥

  • प्रकाश *
    'ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः' इति स्मृतेः, 'तदिति ब्रह्म
    शाश्वतम्' इति श्रुतेश्च तत्पदार्थो ब्रह्म । तदेव च ककारार्थः, 'कं ब्रह्म' इति श्रुतेः ।
    कामयत इत्यर्थो वा । कमेरीणादिको डः । 'कामयते कामी जायते स एव निरञ्जनो
    ऽकामतवेनोज्जृम्भते... कामोऽभिधीयते, तत्परिभाषया कामः ककारं व्याप्नोति' इति
    श्रुतेः । कामेश्वर इति तु पर्यवसितम् । सवितुरिति तृप्रत्ययान्तम् 'पुरा वत्सानामपाकर्ता:'
    इत्यादि-कल्पसूत्रीयप्रयोगवत् । प्राणिप्रसवकारणम् । योनिरिति यावत् । तच्च नान्य-
    साधारणमित्यतो वरेण्यमिति श्रेष्ठं भजनीयमित्यर्थः । तेन पदद्वयेनापि जगद्योनित्वं
    लब्धम् । तेन च कामेश्वरीत्यर्थः । स एव चार्थ एकारस्य, तस्य त्रिकोणत्वात् । तथा च
    श्रुतिः—'सवितुर्वरेण्यमिति षूञ् प्राणिप्रसवे, सविता प्राणिनः सूते' इत्युपक्रम्य
    'त्रिकोणा शक्तिरेकारेण महाभगेन प्रसूते तस्मादेकार एव गृह्यते' इत्यादि ।
    'यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयात्मकम् ।
    ब्रह्माण्डादि कटाहान्तं जगदद्यापि दृश्यते ॥'
    इति वामकेश्वरतन्त्रे स्पष्टं दृश्यते' । सर्वेति । सर्वान्तर्यामित्वं देवपदस्यार्थः, 'देवो
    मध्यवर्ती' इति श्रुतेः । सोर्डस् । धत्त इति धीः । दधत् । जगदाधार इत्यर्थः, 'धरो
    धीत्येवं धार्यते' इति श्रुतेः । भर्ग इति स्पष्टार्थः । सर्वान्तर्यामी सर्वाधारः शिव इति
    पर्यवसितम् । ईकारस्याप्येतावानर्थः । 'भर्गो देवस्य' इत्याद्युपक्रम्य तुरीयमक्षरं
    सर्वान्तर्भूतम् । तुरीयाक्षरं पदानां मध्यवर्तित्वेन व्याख्यातम् 'तस्माद्भर्गो देवस्य
    धीत्येवमीकारः' इति श्रुतेः । तुर्यार्थः, मन्त्र तु तृतीयस्यापि मातृकाक्रमे तुरीयत्वाद्दी-
    कारस्यार्थ इत्यर्थः । मही पृथिवी महत्त्वात् काठिन्याच्च । पञ्चमहाभूतानामुपलक्षणमेतत् ।
    'मृद्धट:' इतिवदेकविभक्तिमत्त्वरूपसामानाधिकरण्यस्य तदात्मना परिणतत्वमर्थः ।
    अयमेव च पृथिवीबीजस्य लकारस्यार्थः, महीत्यस्य व्याख्यानमुपक्रम्य 'ससागरं
    सपर्वतम्' इत्यादिना भूमण्डलं प्रतिपाद्य 'भूमण्डलमेवेक्तं लकारेण' इति श्रुतेः ।
    तृतीयेति गायत्र्यास्तृतीयोऽङ्घ्रिः 'धियो यो नः प्रचोदयात्' इति । अस्मदादीनां धियो
    ध्यानादिरहिते वस्तुनि निष्प्रपञ्चे विषये प्रेरयतीत्यर्थः । परतत्त्वविषयकज्ञानजनक इति
    यावत् । तुरीयाङ्घ्रिः 'परोरजसे सावदोम्' इति । रजसः परं परे रजसे । सोः शे
    इत्यादेशः । रजेऽतीतम् । निर्मलमिति निर्गुणमिति वार्थः, रजःशब्दस्य धूलीवाचक-
    त्ववद् गुणत्रयोपलक्षकत्वसंभवात् । त्रिगुणातीतमिति यावत् । न पुनः पर इत्यत्र

२३० वरिवस्यारहस्ये
भिन्नपदत्वभ्रमः कार्यः, सुब्रह्मण्यानिगदे 'परोरजास्ते पञ्चमः पादः' इति प्रयोगात्।
सावदोमित्यस्य सवदोऽवदश्च यः प्रणवः। वक्तुं शक्यो वक्तुमशक्यश्चेत्यर्थः। शब्दैः
शक्तिमर्यादया न बोध्यः, शक्यतावच्छेदकधर्ममात्रस्य परतत्त्वे विरहात्। लक्षणया तु
बोध्यः, सत्यज्ञानादिपदशक्यविशिष्टतादात्म्यसंबन्धशालित्वात्। 'यतो वाचो निवर्तन्ते'
इति श्रुतेः, 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः, 'लक्ष्यार्था लक्षणागम्या' इत्यादिसमृतेश्च। प्रणवार्थः
परतत्त्वमकारोकारमकारैर्ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मकम्। एतावानप्यर्थो हल्लेखायाः। हकारस्य
हृदयमर्थः। तत्र ई गतेत्यर्थः। 'इट्किट्कटी गतौ' इत्यत्र प्रश्लिष्टोऽयं धातुः। अत
एव 'हृदयागारवासिनी हल्लेखा' इति श्रुतिः। एवं चायमर्थो गायत्र्याः प्रथमकूटस्य च
संपन्नः—सर्वजगत्सिसृक्षारूपकामनावान् कामेश्वरः, जगत्कारणरूपा कामेश्वरी, शिवः
सर्वान्तर्यामी सर्वाधारः पञ्चमहाभूताद्यात्मना परिणतः परवस्तुमात्रविषयकनिर्विकल्पक-
ज्ञानजनको निरञ्जनो निर्गुणो वेदैर्लक्षणया गम्यः शक्त्या त्वगम्यो ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मा
परतत्त्वमिति॥ ६०-६१॥

  • सरोजिनी *
    (क)—वाग्भवकूट एवं गायत्री मन्त्र में समन्वय—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र एवं
    गायत्री मन्त्र—अर्थात् दोनों में एकात्मता, एकार्थता, एकोद्देश्यता एवं अभिन्नता है—
    इसका प्रतिपादन उपनिषदों में भी किया गया है।—त्रिपुराताप न्युपनिषद 'पञ्चदशी'
    के वाग्भवकूट के साथ गायत्री मन्त्र के समन्वय की पुष्टि निम्न रूप से करता है—
    “महामनुसमुद्भवं तदिति ब्रह्म शाश्वतं परो भगवान् निर्लक्षणो निरञ्जनो
    निरूपाधिराधिरहितो देव उन्मीलते पश्यति विकास्ते चैतन्यभावं कामयत इति स एको
    देवः शिवरूपी दृश्यत्वेन विकास्ते यतिषु यज्ञेषु योगिषु कामयते कामं जायते। स
    एष निरञ्जनोऽकामतवेनोज्जृंभते अ क च ट त प य शान् सृजते। तस्मादीश्वरः
    कामोऽभिधीयते। तत्परिभाषया कामः ककारं व्याप्नोति। काम एवेदं तत्तदिति ककारो
    गृह्यते। तस्मात्तत्पदार्थ इति य एवं वेद॥ 'क' = कामेश्वर॥ 'तत्' (गायत्री मन्त्र
    का एक पद) = परमात्मा।
    'ए' = 'पञ्चदशाक्षरी मन्त्र' का 'ए' वर्ण एवं गायत्री मन्त्र
    “ए” = कामेश्वरी॥ (पञ्चदशाक्षरी)
    “सवितुर्वरेण्यं”—(गायत्री मन्त्र)—सवितुर्वरेण्यमितिषूङ्प्राणिप्रसवे सविता
    प्राणिनः सूते प्रसूते शक्तिः सूते ॥ ८ ॥ त्रिपुरा शक्तिराद्येयं त्रिपुरा परमेश्वरी।
    महाकुण्डलिनी देवी जातवेदसमण्डलम् ॥ ९ ॥ योऽधीते सर्वं व्याप्यते। त्रिकोण
    शक्तिरेकारेण महाभागेन प्रसूते। तस्मादेकार एवा गृह्यते ॥ १० ॥
    “वरेण्यं” श्रेष्ठं भजनीयमक्षरं नमस्कार्यम्। तस्माद्वरेण्य मेकाराक्षरं गृह्यत इति
    य एवं वेद ॥ ११ ॥
    “भर्गो देवस्य धीमहि”—इत्येव व्याख्यास्यामः। धकारो धारणा॥ धियैव
    धार्यते भगवान् परमेश्वरः। भर्गो देवो मध्यवर्ति तुरीयमक्षरं साक्षात्तुरीयं सर्व

द्वितीयोंऽशः २३१
सर्वन्तरभूतं तुरीयाक्षरमीकारं पदानां मध्यवर्तीत्येवं व्याख्यातं भर्गोरूपं व्याचक्षते ।
तस्माद् भर्गो देवस्य धीत्येवमीकाराक्षरं गृह्यते ॥ १२ ॥
महीत्यस्य व्याख्यानं महत्वं जडत्वं काठिन्यं विद्यते यस्मिन्नक्षरे तन्महि । लकारः
परंधाम । कठिन्याढ्यं ससागरं सपर्वतं सप्तद्वीपं सकाननममुज्जवलद्रूपं मण्डल मेवोक्तं
लकारेण । पृथ्वी देवी महीत्यनेन व्याचक्षते ॥ १३ ॥
‘धियो यो नः प्रचोदयात्’—परमात्मा सदाशिव आदिभूतः परः स्थाणुभूतेन
लकारेणे ज्योतिलिङ्गात्मानं धियो बुद्धयः परे वस्तुनि ध्यानेच्छारहिते निर्विकल्पके
प्रचोदयात् पैरदित्युच्चारं रहितं चेतसैव चिन्तयित्वा भावयेदिति ॥ १४ ॥
परो रजसेऽसावदोमिति तदवसाने पर ज्योतिरमलं हृदि दैवतं चैतन्यं चिल्लिङ्गं
हृदयागारवासिनी हृल्लेखेत्यादिना स्पष्टं वाग्भवकूटं पञ्चाक्षरं पञ्चभूतजनकं पञ्चकलामयं
व्यापठ्यत इति । य एवं वेद ॥ १५ ॥
| १. “क”—‘ककार’ = कामेश्वर | गायत्री मन्त्र का ‘तत्’ समानार्थक ॥ |
| २. 'ए'—'एकार' = कामेश्वर (महा- | 'सवितुर्वरेण्यं' = 'सावित्री' = त्रिपुरा |
| कुण्डलिनीदेवी मूलाधार के त्रिकोण | शक्ति ॥ (मूलाधार में त्रिपुरा के निवास |
| जो कि 'ए' के आकृति का होता | का प्रमाण भी पाया जाता है ।) |
| है) में व्यष्टिरूप में कुण्डलिनी | |
| शक्ति के स्वरूप में निवास करती | |
| है । त्रिकोण शक्ति कुण्डलिनी | |
| एकार के द्वारा सभी को जन्म | |
| देती है । अतः 'सावित्री' है । | |
| 'एकार'—'एकार' सभी कारणों का | 'वरेण्य'— |
| कारण है । इसीलिए अन्य | |
| सत्ताओं से वरिष्ठ होने के कारण | |
| 'वरेण्य' है । जो इस प्रकार | |
| समझता है वह भी 'वरेण्य' है । | |
| ३. 'ई'—'ई' | 'भर्गो देवस्य धी'—'धी' में धकार = |
| | धारण '

२३२ वरिवस्यारहस्ये

| ५. 'ह्रीं'—(गायत्री के तुरीय पद एवं | 'धियो यो नः प्रचोदयात्' जो हमारी |
| हृल्लेखा में समन्वय) | 'धियो' (ध्यानेच्छाशून्य निर्विकल्प |
| | परमात्मा के प्रति) प्रेरित करे। उस |
| | अनिर्वचनीय ज्योतिर्लिंग आत्मा के प्रति |
| | ब्रह्माकार परिणत चित्त द्वारा 'सोऽहं' के |
| | रूप में कल्पित करना चाहिए ॥ |

(ख) 'कामकूट' का 'गायत्री' के साथ समन्वय—अथ तु परं कामकलाभूतं
कामकूटमाहुः । तत् सवितुर्वरेण्यमित्यादिद्वात्रिंशदक्षरीं पठित्वा तदिति परमात्मा
सदाशिवोऽक्षरं विमलं निरूपाधितादात्म्यप्रतिपादनेन हकाराक्षरं शिवरूपं अनक्षरमक्षरं
व्यालिख्यत इति तत्परागव्यावृत्तिमादाय शक्तिं दर्शयति ॥ १६ ॥¹

द्वितीयोंऽशः २३३
१. ‘गायत्री’ वेदमाता है और वैदिक मन्त्र है । इसके साथ ही साथ
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र भी वैदिक मन्त्र है क्योंकि—‘कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा
हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा.... विश्वमातादिविद्योम ।। एक वैदिक मन्त्र है और
वह पञ्चदशाक्षरी मन्त्र ही है ।
२. गायत्री मन्त्र और पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का अर्थ एवं उसका अभिप्राय एक ही
है । भिन्न-भिन्न शब्दों में एक ही मन्त्र को उद्घाटित किया गया है यथा—इस मन्त्र
का अर्थ देखिए—
‘कामोयोनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला माययां च पुरुच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् ।।१
‘कामो’ = (‘क’), योनिः (‘ए’), कमला (‘ई’), वज्रपाणि (इन्द्र) = (‘ल’),
गुहा (ह्रीं), ‘ह’, ‘स’, मातरिश्वा-वायु (‘क’), अभ्र (‘ह’), इन्द्र (‘ल’) पुनः ‘गुहा’
= (‘ह्रीं’), ‘स’ ‘क’ ‘ल’ ‘माया’ (ह्रीं),—यह सर्वात्मिका जगन्माता की मूल विद्या
है और यह ब्रह्मरूपिणी है । (यही पञ्चदशाक्षरी मन्त्र है ।)
‘शिवशक्त्यभेदरूपा, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिका, सरस्वती-लक्ष्मी-गौरीरूपा’
अशुद्ध-मिश्र-शुद्धोपासनात्मिका, समरसीभूत शिवशक्त्यात्मक ब्रह्मस्वरूप का निर्विकल्प
ज्ञान प्रदान करने वाली, सर्वतत्त्वात्मिका महात्रिपुरसुन्दरी’—यही है पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
का भावार्थ ।
यह मन्त्र समस्त मन्त्रों का मुकुटमणि है और मन्त्र शास्त्र में ‘पञ्चदशी’ ‘कादि
श्रीविद्या’ के नाम से प्रख्यात है । इसका केवल एक ही अर्थ नहीं प्रत्युत् अनेक
अर्थ हैं ।
३. पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का एक ही अर्थ नहीं है प्रत्युत् अनेक अर्थ हैं—
‘योगिनीहृदय’ नामक ग्रन्थ में इसके छः अर्थ बताये गए हैं—(१) भावार्थ (२)
संप्रदायार्थ (३) निगर्भार्थ (४) कौलिकार्थ (५) सर्वरहस्यार्थ (६) महातत्त्वार्थ ।।२
‘सेतुबंध’ ‘प्रकाश’ आदि में इसके और भी अर्थ बताए गए हैं । भास्करराय
ने ‘वरिवस्यारहस्यम्’ में इसके निम्न पन्द्रह अर्थ बताए हैं जो निम्न हैं३—
(१) प्रतिपाद्यार्थ (२) भावार्थ (३) संप्रदायार्थ (४) निगर्भार्थ (५) कौलिकार्थ
(६) रहस्यार्थ (७) महातत्त्वार्थ (८) नामार्थ (९) शब्दरूपार्थ (१०) नामैकदेशार्थ
(११) शाक्तार्थ (१२) सामरस्यार्थ (१३) समस्तार्थ (१४) सगुणार्थ (१५)
महावाक्यार्थ ।।
४. ‘ह्रीं’ या हल्लेखा अतिगुप्त है और यह ओंकार का ही दूसरा नाम है ।४
१. श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् २. ‘योगिनीहृदय’ (मन्त्रसंकेत १५-१६)
३. वरिवस्यारहस्यम् (द्वि०अंश ५७-५९)—भास्कराचार्य
४. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक १२-१३)