वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 333, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः २३१
सर्वन्तरभूतं तुरीयाक्षरमीकारं पदानां मध्यवर्तीत्येवं व्याख्यातं भर्गोरूपं व्याचक्षते ।
तस्माद् भर्गो देवस्य धीत्येवमीकाराक्षरं गृह्यते ॥ १२ ॥
महीत्यस्य व्याख्यानं महत्वं जडत्वं काठिन्यं विद्यते यस्मिन्नक्षरे तन्महि । लकारः
परंधाम । कठिन्याढ्यं ससागरं सपर्वतं सप्तद्वीपं सकाननममुज्जवलद्रूपं मण्डल मेवोक्तं
लकारेण । पृथ्वी देवी महीत्यनेन व्याचक्षते ॥ १३ ॥
‘धियो यो नः प्रचोदयात्’—परमात्मा सदाशिव आदिभूतः परः स्थाणुभूतेन
लकारेणे ज्योतिलिङ्गात्मानं धियो बुद्धयः परे वस्तुनि ध्यानेच्छारहिते निर्विकल्पके
प्रचोदयात् पैरदित्युच्चारं रहितं चेतसैव चिन्तयित्वा भावयेदिति ॥ १४ ॥
परो रजसेऽसावदोमिति तदवसाने पर ज्योतिरमलं हृदि दैवतं चैतन्यं चिल्लिङ्गं
हृदयागारवासिनी हृल्लेखेत्यादिना स्पष्टं वाग्भवकूटं पञ्चाक्षरं पञ्चभूतजनकं पञ्चकलामयं
व्यापठ्यत इति । य एवं वेद ॥ १५ ॥
| १. “क”—‘ककार’ = कामेश्वर | गायत्री मन्त्र का ‘तत्’ समानार्थक ॥ |
| २. 'ए'—'एकार' = कामेश्वर (महा- | 'सवितुर्वरेण्यं' = 'सावित्री' = त्रिपुरा |
| कुण्डलिनीदेवी मूलाधार के त्रिकोण | शक्ति ॥ (मूलाधार में त्रिपुरा के निवास |
| जो कि 'ए' के आकृति का होता | का प्रमाण भी पाया जाता है ।) |
| है) में व्यष्टिरूप में कुण्डलिनी | |
| शक्ति के स्वरूप में निवास करती | |
| है । त्रिकोण शक्ति कुण्डलिनी | |
| एकार के द्वारा सभी को जन्म | |
| देती है । अतः 'सावित्री' है । | |
| 'एकार'—'एकार' सभी कारणों का | 'वरेण्य'— |
| कारण है । इसीलिए अन्य | |
| सत्ताओं से वरिष्ठ होने के कारण | |
| 'वरेण्य' है । जो इस प्रकार | |
| समझता है वह भी 'वरेण्य' है । | |
| ३. 'ई'—'ई' | 'भर्गो देवस्य धी'—'धी' में धकार = |
| | धारण '