वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
१५२ वरिवस्यारहस्ये
‘बिन्दु’ की चार शब्दात्मिका शक्तियाँ हैं । इन वृत्तियों के भेद से ही जीवों में
ज्ञान का भेद रहता है । इसका अतिक्रम करके ही साधक शिवत्व प्राप्त करता है ।
बिन्दु की शब्दात्मिका वृत्तियाँ निम्न हैं—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४)
वैखरी । कुछ लोग पश्यन्ती को ही ‘अक्षर बिन्दु’ कहते हैं । अधिकांशः तांत्रिक
आचार्य ‘परावाक्’ से ही इच्छा-ज्ञान-क्रिया के रूप में स्थित त्रिबिन्दु का उद्भव
मानते हैं । त्रिबिन्दु से ही ५ पञ्चाशत मातृकाओं का उद्भव होता है । इनमें स्वर
वर्णों में ‘बीज’ (शिवांश) स्थित है तो व्यञ्जनों में (योनि शक्त्यांश) स्थित हैं ।
सारा विश्व इसी वर्णमाला से आबद्ध है ।
सृष्टि के मूल में ‘बिन्दु’ अवस्थित है । परमशिव के स्वातंत्र्य के कारण
स्पन्दन जब इस बिन्दु का स्पर्श करता है तो यह बिन्दु रेखारूप में परिणत हो
जाता है । इन तीन रेखाओं के संयोग से जो त्रिकोण उत्पन्न होता है वही सृष्टि
का मूल योनिरूप है जो इस प्रकार है—
त्रिकोण का केन्द्र ‘बिन्दु’ है ∇
‘नाद’ का स्वरूप—शिव और शक्ति का प्रथम विकास ‘नाद’ के रूप में ही
माना गया है ।¹ सर आर्थर एवलॉन कहते हैं "From the union of Śiva and
Śakti arrises creative ideation This union and mutual relalion is
called"—‘नाद’ अर्थात् शिव एवं शक्ति के संयोग से जो सृष्टि की कल्पना की
गई है उसमें शिव-शक्ति का संयोग एवं उन दोनों का पारस्परिक सम्बंध ‘नाद’
कहलाता है । जब शिव और शक्ति स्थिर शक्ति से क्रियात्मक रूप में रूपान्तरित
होने लगते हैं तभी नाद का उदय होता है । उनमें विकास की चेतना जाग्रत होती
है इसीलिए नाद क्रियारूप माना जाता है । इसी नाद से विश्व का विकास होता
है । शिव-शक्ति में नादोद्भव तब होता है जब उसमें विकास की चेतना जागती है ।
तात्विक धरातल पर जिसे ‘सदाख्यतत्त्व’ कहते हैं मन्त्रक्षेम में उसे ही ‘नाद’ कहा
जाता है ।² जिस प्रकार शिव-शक्ति से ‘सदाख्यतत्त्व विकसित होता है उसी प्रकार
क्रियाशक्ति रूप पर नाद (ब्रह्म) से ‘नाद’ विकसित होता है । ‘प्रयोगसार’ में कहा
गया है कि—‘‘हे देवि ! अंतरात्मा नाद के रूप में प्रस्फुटित होती है वही वायु
(जीवों में प्राणवायु) से पैरित होकर अक्षरों का रूप धारण करती है ।’’
तन्त्र शास्त्र के मन्त्र पक्ष में ‘नाद’ एवं ‘बिन्दु’ अहं एवं इदं के प्रतीक के
रूप में प्रयुक्त हुए हैं ।³ कतिपय तन्त्रग्रन्थों में ‘नाद’ को विराट शक्ति के रूप में
१. तन्त्राज़ देयर फिलॉसफी एण्ड औकल्ट सीक्रेट्स (डी०एन० बोस) पृ० ११९
२. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११२, ११४)
३. आर्थर एवेलॉन ‘सर्पेण्ट पावर’ (पृ० ३४)
प्रथमोऽंशः १५३
स्वीकार करके उसे सृष्टि-विकास का केन्द्र माना गया है ।¹ कतिपय तन्त्रों के
अनुसार सच्चिदानन्द सगुण परमात्मा शिव से शक्ति का एवं शक्ति से नाद-बिन्दु
की उत्पत्ति हुई है । इसी बिन्दु से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है ।² अन्य
द्वैतवादी तांत्रिकों के मतानुसार 'शिव' एवं 'शक्ति' नामक दो तत्त्व हैं । शिव शक्ति
में प्रवेश करता है और बाद में बिन्दु का रूप धारण कर लेता है । बिन्दु का
प्रथम विकास 'नाद' के रूप में होता है और फिर सृष्टि का विकास होता है ।³
कुछ भेदवादी तांत्रिक शिव एवं शक्ति को समवाय सम्बन्ध से संयुक्त एक तत्त्व
तथा बिन्दु का दूसरा तत्त्व मानते हैं ।⁴ बौद्धतन्त्रों में 'बिन्दु' ज्ञान के प्रतीक एवं
हठयोगिक ज्योति के रूप में कल्पित किया गया है ।⁵ शैव तन्त्रों में 'नाद' 'बिन्दु'
को शिव-शक्ति के परिकल्पित स्वीकार किए गए हैं । बौद्ध तांत्रिकों ने इन्हें प्रज्ञा
एवं उपाय का वाचक भी माना है । तांत्रिक एवं हठयौगिक ग्रन्थों में (क) 'बिन्दु'
को—रसना, सूर्य, रवि, प्राण, शमन, काली, यमुना, रज, पुरुष, नाद एवं व्यञ्जन
(ख) 'नाद' को—ललना, चन्द्रा, शशि, अपान, घमन, अली, गङ्गा, शुक्रा, तमस्
अभाव, प्रकृति, ग्राहक एवं स्वर के रूप में गृहीत किया गया है ।⁶
'कौलज्ञाननिर्णय' में एक स्थल पर बिन्दु को महालिङ्ग की शक्ति एवं दूसरे
स्थल पर उसे शिव की सृजन-शक्ति कहा गया है । इसमें बिन्दु से ही नादोत्पत्ति
बताई गई है । योग उपनिषदों में 'बिन्दु' मन⁷ वायु⁸ बुद्धि⁹ एवं महेश्वर¹⁰ के अर्थ
में स्वीकार किया गया है ।
'शारदातिलक' के अनुसार—शब्दब्रह्मरूपिणी कुण्डलिनी से शक्ति, शक्ति से
ध्वनि, ध्वनि से नाद, नाद से निरोधिका, निरोधिका से अर्द्धेन्दु, अर्द्धेन्दु से बिन्दु
की उत्पत्ति होती है । 'शक्ति' = शुद्ध सत्त्व में प्रविष्ट चित्, रजोनुबिद्ध एवं सत्व
प्रविष्ट चित् शक्ति = 'ध्वनि' तमोनुविद्ध चित् शक्ति = 'नाद' । तमसप्राचुर्याचित्
शक्ति = निरोधिका । सत्वप्राचार्या चित् शक्ति = 'अर्द्धेन्दु' । सत्व + तमस से
विशिष्ट होने पर वही चित् शक्ति 'बिन्दु' कहलाती है । बिन्दु का स्थान सहस्रार
है । बिन्दु ही शब्दब्रह्म है । मन्त्र में नाद एवं बिन्दु दोनों प्रतिष्ठित हैं । इनमें
'नाद' नीचे एवं 'बिन्दु' ऊपर स्थित होता है । 'नाद' रूपा कुण्डलिनी मूलाधार में
(नीचे) एवं 'बिन्दु' रूपी शब्द ब्रह्म (ऊपर) सहस्रार में रहते हैं । ये ही दोनों शक्ति
एवं शिव हैं और इनका सम्मिलत कराना ही तान्त्रिकों का लक्ष्य है ।
नाद के कई स्वरूप हैं यथा—
(क) 'महानाद' या नादान्त = शब्दब्रह्म का प्रथम क्रियात्मक विकास
१-२. तन्त्राज़ देयर फिलॉसफी एण्ड औकल्ट सीक्रेट्स (पृ० १०७)
३. कलेक्टेड वर्क्स आफ आर० जी० भण्डारकर, पृ० २१९
४. गोपीनाथ कविराज—'तान्त्रिक दृष्टि' ५-६. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
७. योगकुण्डल्योपनिषद ८. योगशिखोपनिषद
९-१०. ध्यानबिन्दूपनिषद
१५४ वरिवस्यारहस्ये
(ख) 'नाद' = नादान्त की पूर्वावस्था । जो विश्व को नादान्त से भरे हुए हैं ।
'निरोधिनी'—नाद की वह अवस्था निरोधिनी है जिसमें बिन्दु का विकसित
करने की क्षमता निहित हो ।१ नाद की अत्यन्त सूक्ष्म अवस्थायें हैं उनमें 'निष्कल
उन्मनी' अन्यतम हैं । 'उन्मनी' निराकार निरुच्चार, निरूप एवं विशेषणशून्य वह
अव्यक्तवस्था है जो अवाङ्मनसगोचरा है । यह अनुत्पन्न निष्पन्द वाक् है । यह
कारणरूपा शक्ति की अवस्था है । इस अवस्था में काल, कला एवं देवता आदि
का भान नहीं होता ॥ “उन्मनी is Nirākār and Niruchchār (निराकार, निरुच्चार)
roundless and without ulternate defind by any adjective, being for
beyound mind and speech and universe"२ यह निर्वाणपद है एवं निर्विकल्प
निरञ्जन शिवशक्ति है ।३
बिन्दु से नादाविर्भाव—कतिपय तांत्रिकों का कथन है कि बिन्दु से भी नादों
का उदय होता है जो निम्न है—(१) 'सूक्ष्मनाद'—बिन्दु का प्रथम स्तर, अचिन्त्य
तत्त्व एवं अभिधेय बुद्धि का कारण है । (२) 'अक्षरनाद'—यह परामर्श ज्ञान
समन्वित एवं सूक्ष्मनाद का कार्य है । (३) 'वर्णनाद'—यह आकाश एवं वायु से
उत्पन्न होता है । कुण्डलिनी को भी 'नाद' कहा गया है ।४
तांत्रिकों के अनुसार 'नाद' से बिन्दु का उद्भव होता है । 'नाद' एवं 'बिन्दु'
ये दोनों शक्ति के रूप हैं । शक्ति के इन दोनों रूपों में क्रिया शक्ति स्थित है ।५
'अहं' द्रष्टा है और 'इदम्' दृश्य है । द्रष्टा की दृश्यरूपी शून्य पर दृष्टि
पड़ने पर उस शून्य से एक अव्यक्त नाद ध्वनि झंकृत होती है जिसे 'आदिनाद' या
'परनाद' कहते हैं । नाद की स्फूर्ति के साथ ही ज्योति का भी विकास होता है ।
नाद एवं ज्योति दोनों एक ही महासत्य की दो अवस्थायें हैं । शक्ति की क्रियावस्था
ही नाद है और निष्क्रिय अवस्था 'कला' है । 'शक्ति' स्वरूपनिष्ठ क्रिया द्वारा
कार्योंन्मुख होकर 'नाद' के रूप में आत्मप्रकाश करती है । 'नाद' घनीभूत होकर
साम्यावस्था में 'परमविन्दु' के रूप में प्रकाशित होता है । पर बिन्दु जब महानाद
में से अपर बिन्दु में अवतीर्ण होता है तब बिन्दु जब बीज का स्पर्श करता है तब
सारे बीज बिन्दुयुक्त होकर गुञ्जन करते रहते हैं—यही 'नाद' है । मानव-हृदय में
अस्फुटभाव से जो चिन्ताएँ क्रीड़ा करती हैं वह नाद की ही क्रीड़ा है । किसी
वृत्तिरूप में अन्तःकरण का जो परिणाम होता है वह 'नाद' से व्याप्त होता है ।
महानाद पर 'प्रणव' है । शक्ति की बहिर्मुख अवस्था ही नाद एवं ज्योति है ।
'बिन्दु' ही क्षुब्ध होकर नादरूप में परिणत होता है । 'नाद' वायु के सङ्घर्ष के
कारण वर्णमाला रूप में प्रकाशित होता है । 'पादुकापञ्चक' में कहा गया है कि—
'पराशक्ति' ही बिन्दु है और उसका रूपान्तरण है—बिन्दु, नाद एवं 'बीज'
'बिन्दु'—रक्तवर्ण है और सूर्य है । 'नाद'—श्वेतवर्ण है और चन्द्रमा है । ये दोनों
ही मिलकर आनन्दमय कोश का निर्माण करते हैं 'कारणबिन्दु' जब प्रस्फुटित होता
१-५. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११४-१३०)
प्रथमोऽंशः १५५
है सृजनार्थ तीन भागों में विभक्त हो जाता है जो निम्न है—१. ‘बिन्दु’ २. ‘नाद’
३. ‘बीज’। वाचकों की महासमष्टिरूप से एकीभूत स्थिति का नाम नाद है।
(१) मूलाधार से समुत्थित ‘नाद’ वर्णों के मध्य सञ्चरण करता हुआ माला के
सूत की भूमिका का निर्वाह करता है। जिस प्रकार मनकों की पृथकता को एकता
में रूपान्तरित करने वाला सूत्र मनकों के मध्य रहता है उसी प्रकार प्रत्येक वर्ण की
विभिन्नता को नाद एकता में रूपान्तरित करके उन सभी को आपस में एकसूत्रता
में पिरो देता है। ‘बिन्दु’ मस्तक के मध्य वृत्ताकाररूप में दीपक की भाँति
प्रकाशित रहता है ॥ २२ ॥
(२) उसके ऊपर ‘अर्धचन्द्र’ स्थित है। वह आकृति एवं कान्ति दोनों दृष्टियों
से अर्धचन्द्रमा की भाँति है।
(३) इसके ऊपर त्रिभुज के आकार की ‘रोधनी’ शक्ति विद्यमान है। यह
चाँदनी के सौन्दर्य से मण्डित है ॥ २३ ॥
भास्कर कहते हैं—वट बीज के अन्तर्गत वटवृक्षीय सूक्ष्मरूप के तुल्य
शब्दसृष्टि सूक्ष्मरूपशालिनी पूर्वोक्तरूपा त्रिपुरसुन्दरी ही तादृशसूक्ष्मरूपवत् प्रवृत्ति-निमित्त
क परा पद वाच्या है। वही त्रिपुरसुन्दरी—‘माति तरति कायतीति च व्युत्पत्या
मातृकेति’—मातृका है। उसके भीतर निर्विकार होने पर भी अनादिसिद्ध अदृष्ट के
कारण स्वान्तः संहृतविश्व की सिसृक्षा उत्पन्न होती है। अतः वह स्रष्टव्य पदार्थों का
आलोचन करती है—‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’ तादृश ईक्षरम ही प्रवृत्ति का निमित्त
बनकर ‘पश्यन्ती’ बन जाता है। वही पश्यन्ती मातृकाकरण को उत्तीर्ण करने
कारण ‘उत्तीर्णा’ कही जाती है। उसके अवयव हैं—वामादिक अष्ट शक्तियाँ; अतः
वही व्यष्टि समष्टिवेष से नवविध हैं। उनसे अविकृत शून्यादिक नाद उत्पन्न होते
हैं। उनकी समष्टि ही नादध्वनि आदि कहलाती है। ‘मध्यमा मातृका’—
मध्यमावयवरूप अविकृत शून्य स्पर्श नाद ध्वनि बिन्दु शक्ति बीजाक्षर नाम वाला
नाद नवक मूलाधार आदि ६ चक्रों में नाद, नादान्त एवं ब्रह्मरंध्र में स्थित है। ९
नादों द्वारा अ-क-च-ट-त-प-य-श-ल नाम वाले ९ वर्गों वाली वैखरी मातृका उत्पन्न
होती है। वर्णों में नाद अनुस्यूत है—‘‘वर्णेषु नादो अनुस्यूतः ।।’’ दोनों वर्णों के
मध्यभाग में मणिद्वय मध्यभाग में स्थित शुद्धसूत्र की भाँति शुद्ध नाद का मान है।
वर्णशरीर के अन्तर्भाग में पराभेद द्वारा संवालित तन्तुबद्ध परान्तभूद्वत उन उन वर्णों
के साथ अभेद के द्वारा ही नाद का मान है किन्तु यहाँ मण्यन्तर्गत सूत्र दृष्टान्त
उचित नहीं है क्योंकि सूत्र तो मणि से पृथक् रहता है किन्तु इस प्रसङ्ग में तो
मणि से सूत्र के अभिन्नत्व की प्रतीतिवत नाद के स्वरूप का वर्णन किया गया है।
अर्द्धचन्द्र—बिन्दु से सहस्रार में उठने के मार्ग में कपाल में जो सोमरस
दृष्टिगत होता है वही ‘अर्द्धचन्द्र’ है। इसके भीतर त्रिविधात्मक वर्णमाला (सौम्य,
सौर, आग्नेय) चिद् बीज में सहस्रार के दलों में प्रकाश पाता है। स्थान की दृष्टि
से बिन्दु के अनन्तर अर्धचन्द्र है। अर्थात् यह द्वितीय भूमि है और इसकी मात्रा
१।४ है यदि बिन्दु पूर्णचन्द्र या चन्द्रबिन्दु है तो अर्धचन्द्र उसका अर्धांश है। यह
१५६ वरिवस्यारहस्ये
बिन्दु के ऊपर स्थित है । इसके चतुर्दिक चार एवं मध्य में एक अर्थात् सब
मिलाकर पाँच कलाएँ स्थित हैं । अर्धचन्द्र में जो कि ललाट में स्थित है ज्ञेय
प्रधानभाव नहीं है । यह शून्य भी नहीं है । यह आकार में अर्धचन्द्र के समान एवं
प्रकाश में चन्द्रमा के समान है—
'तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्या तथा कृत्या ।' (वरि०र०)
यद्यपि बिन्दु ही वास्तविक अर्धमात्रा है किन्तु बिन्दु के पश्चात् प्रत्येक परवर्ती
मन्त्रावयव में उसके पूर्ववर्ती की अर्धमात्रा (अर्धांश) निहित है । जैसे बिन्दु में एक
मात्रा का अर्धांश है तो अर्धचन्द्र में बिन्दु का अर्धांश है, निरोधिका में अर्धचन्द्र
का अर्धांश है, नाद में निरोधिका का, नादान्त में नाद का, शक्ति में नादान्त का,
व्यापिनी में शक्ति का, समना में व्यापिनी का अर्धांश निहित है । 'अर्धचन्द्र' में
काल की स्थिति है किन्तु इसकी मात्रा ६४ लवों की है—'चन्द्रे तद्द्विगुणा लवाः ।'
जब सृष्टिकारक 'शिवामृत' मूर्धा में गिरता है तब वह अवस्था 'अर्धचन्द्र' कहलाती है—
'यदा शिवामृतं मूर्ध्नि पतति सृष्टिकारणम् ।
आप्यायस्तु भवेत्तेन सोऽर्धचन्द्र इति स्मृतः ॥'१
यह समस्त भूतों की सृष्टि एवं संहार का भी कारक है—“संहारः सर्वभूतानां
सृष्टिः कारणमेव च ॥”२
अर्धचन्द्र की कलायें निम्नांकित हैं—ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा
विमला शिवाः 'ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा विमला शिवा । अर्धचन्द्रकला
ह्येताः सर्वज्ञपद संस्थिताः ।। विद्यावरणसंबद्धा मन्त्रकोटि विभूषिताः । क्रिया
शक्तिस्वरूपास्तु संस्थिता विमला शुभः ॥'३
यहाँ नादात्मक शिव का सदाशिव सम्बन्धी, स्फुट इदन्ताभासात्मक
सृष्टिवीर्यरूपात्मक पीयूष का उन्मेष होता है ।
'अर्द्धचन्द्र' दीपक के समान प्रभास्वर है । इसका अवस्थान ललाट में ही
बिन्दु के किंचित् ऊर्ध्वदेश में है । इसका उच्चारणकाल मात्रा का चतुर्थभाग है ।
बिन्दु के ऊपर 'अर्धचन्द्र' दीप्ति एवं आकृति में अन्वर्थक (आकृति एवं कान्ति
दोनों ही दृष्टियों से अर्द्धचन्द्र के समान) है ।
“तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्या तथाकृत्या ।"४
'अर्द्धचन्द्र' की कलायें निम्नांकित हैं—
ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा विमला शिवा ।
अर्द्धचन्द्रकला ह्येताः सर्वज्ञ पदसंस्थिता ॥५
१-५. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११४-१३०)
१-३. नेत्रतन्त्र ४. वरिवस्यारहस्यम्
५. नेत्रतन्त्र
प्रथमोऽंशः १५७
दीपिकाकार अर्धमात्रा की व्याख्या करते हुए कहते हैं—अर्धमात्रः ह्रस्वस्य
उच्चारण कालो मात्रेत्युच्यते । मात्राया अर्ध मुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः ।।”
अर्थात् ह्रस्व वर्ण का उच्चारण काल मात्रा कहलाता है । इस मात्रा का अर्द्धांश
‘अर्धमात्रा’ है ।
आचार्य भास्करराय ‘सेतुबंध’ में अर्धमात्रा की व्याख्या करते हुए कहते है —
‘अर्धमात्रा यस्य सोऽर्धमात्रः । मात्रा नाम ह्रस्वस्योच्चारण कालः स च षट्पञ्चाशदुत्तर
शतद्वयलवैर्भवति । लवो नाम काल परमाणुः नलिनीपत्रसंहत्याः सूक्ष्मसूच्यभिभेदने ।
दले दले तु यः कालः स कालो लव संज्ञितः ॥’
‘अर्द्धचन्द्र’ की निम्न कलायें हैं—(१) ज्योत्स्ना (२) ज्योत्स्नावती (३) सुप्रभा
(४) विमला (५) शिवा ॥
मन की मात्रा जितनी ही प्रसृत होती है उतना ही मन का अंश क्षुद्रतर होता
है और उतना ही चिदालोक उज्ज्वलतर होता है अर्द्धमात्रादि में जो प्रतिफलित
चैतन्य है वही ‘मन्त्र’ है । एक मात्रा ही अर्द्धमात्रा में परिणत हो जाती है । स्थूल
विश्व अनुभूति मन की जिस मात्रा से होती है उसे एक मात्रा कहते हैं । जगत् की
अनुभूति का आरंभ इसी एक मात्रा में होता है । मात्रा का अधिक्य जड़ता के
अधिक्य का कारण है । साधक का कर्तव्य है कि वह मन को एकाग्र करे (केन्द्र
में स्थापित करे) अर्थात् एक मात्रा में अवस्थित करे । सामान्यतः मन एक मात्रा में
नही रहता । विक्षिप्त एवं क्षिप्त अवस्था में मात्राओं की बहुलता रहता है ।
‘बिन्दु’ मात्रा से मात्राहीन की ओर जाने का द्वार है । इस स्थान में ज्ञाता—
ज्ञेय-ज्ञान एकाकार हो जाते हैं । मात्रा-भङ्ग के फलस्वरूप अर्द्धमात्रा का उदय होता
है । बिन्दु से सहस्रार में उठने के मार्ग में कपाल प्रदेश में जो सोम दृष्टिगत होता
है वही ‘अर्द्धचन्द्र’ है ।
‘अर्धचन्द्र’ एवं ‘रोधिनी’ आदि में पूर्व ध्वनि की आधी-आधी मात्रा समझना
चाहिए । ‘रोधिनी’ = अर्द्धचन्द्र का १/२; ‘नाद’—‘रोधिनी’ का १/२; इसी प्रकार
परवर्ती ध्वनि अपने-अपने पूर्ववर्ती ध्वनि का १/२ भाग होती है । काल परमाणु
ही ‘लव’ है । २५६ लव = १ मात्रा । बिन्दु का उच्चारणकाल १२८ लव है ।
अर्द्धचन्द्र का उच्चारण काल ६४ लव है । इसी प्रकार ‘रोधिनी’ का ३२; ‘नाद’
का १६; ‘नादान्त’ का ०८; ‘शक्ति’ का ४, ‘व्यापिका’ का ०२ एवं ‘समना’ का
उच्चारण काल १ लव है ।
‘उन्मना कालहीन है । ‘उन्मना’ में क्षण से परार्द्धान्तकाल, निवृत्ति से लेकर
शान्त्यतीतादि कलायें, प्राणाचार, भुवन एवं देवों की गति नहीं है । ‘उन्मना’ =
‘गुरुवक्त्र’ है एवं परमशिव की प्राप्ति का द्वार है । इससे आगे अनामय पर तत्व
मात्र शेष है—
‘यावत्सा समना शक्तिः तदूर्ध्वं चोन्मना स्मृता ।
नात्र कालः कलाक्षारो न तत्त्वो न च देवताः ॥ १२७६ ॥
१५८ वरिवस्यारहस्ये
सुनिर्वाणं परं शुद्धं गुरुवक्त्रं तदुच्यते ।
तदतीतं वरारोहे परं तत्त्व मनामयम् ॥ १२७७ ॥१
'योगिनीहदय' का मत—इसके अनुसार उन्मनी भी कालात्मक है—शक्त्यादीनां
तु मात्राशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ।२
'स्वच्छन्दतन्त्र' का मत—उन्मनी में काल नहीं है—नात्र कालः कलाश्चारो न
तत्त्वो न च देवताः ॥३
निरोधिका—अर्धचन्द्र के बाद तृतीय भूमि के रूप में 'निरोधिका' आती है ।
इसकी मात्रा १/८ है । समग्र विश्व के प्रशासक ब्रह्मादिक पञ्च कारणों की भी
ऊर्ध्वगति को अग्रपद होने से रोकने वाली भूमि का नाम ही रोधिनी या निरोधिका
है । यह भी बिन्द्रावरण की शेष प्रान्तभूमि है । इस भूमि का अतिक्रमण कर लेने
पर विश्व प्रशासन का कार्य संभव नहीं रह जाता । यह योगिमात्रैक लंघ्य दुर्लंघ्य
भूमि है । कपाल के ऊर्ध्व में (ब्रह्मरंध्र के नीचे त्रिकोण के मध्य) 'रोधिनी' स्थित
है । इसका अभिधान 'रोधिनी' इसलिए है क्योंकि यह ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-ईश्वर-सदाशिव
नामक कारण पञ्चक को उनकी ऊर्ध्व गति से रोके हुए है । रोधिनी तक ही
'बिन्द्रावरण' है । यह भी शून्य है । इस भूमि में दिशा एवं काल की पृथकता
दृष्टिगत नहीं होती । यहाँ निम्नाभिमुखी मन एवं प्राण की भी अनुभूति नहीं होती ।
'रोधिनी' में काल विद्यमान है किन्तु इसकी मात्रा ३२ लव है—'द्वात्रिंशदेव
रोधिन्यां' । अध्वगत ध्वनि जहाँ विश्राम करने लगती है, जो सर्वदेवनिरोधिका है, जो
ब्रह्मादिक, सुराधियों की गति को भी निरुद्ध कर देती है वही निरोधिकाख्यामांत्री
कला है—
'ध्वनिरध्वगतो यत्र विश्राम्यत्यनिरोधतः ।
निरोधिनीति विख्याता सर्वदेव निरोधिका ॥ ६४ ॥
निरोधयति या देवान्ब्रह्मादींश्च सुराधिपे ।४
निरोधिकेति साख्याता.......................॥
निरोधिका की कलायें निम्नांकित हैं—रुन्धनी, रोधनी, रौद्री, ज्ञानबोधा,
तमोपहा । (रुंधनी रोधनी रौद्री ज्ञानबोधा तमोपहा । निरोधिका कला ह्येताः सर्वदेव-
निरोधिकाः ।। नेत्रतन्त्र) । यहाँ अनाहतनादात्मा सदाशिव विश्राम ग्रहण करते हैं ।
'निरोधिका' या 'निरोधिनी' त्रिकोणाकार है और चन्द्रिकावत प्रभास्वर है । इसका
उच्चारण-काल मात्रा का अष्टम भाग है ।
अर्धचन्द्र के अनन्तर त्रिभुज के आकार की 'रोधिनी' है—जो कि चन्द्रिका की
कान्ति से समन्वित है । "अथ रोधिनी तदूर्ध्वं त्रिकोणरूपा च चन्द्रिका कान्तिः ।"५
कपाल के ऊर्ध्व में (ब्रह्मरन्ध्र) के नीचे त्रिकोण के मध्य 'रोधिनी' स्थित है ।
१. स्वच्छन्दतन्त्र (१० पटल) २. योगिनीहृदय
३. स्वच्छन्दतन्त्र ४. नेत्रतन्त्र
५. वरिवस्यारहस्यम्
प्रथमोऽंशः १५९
निरोधिका की कलायें निम्न हैं—
रुन्धनी रोधनी रौद्री ज्ञानबोधा तमोपहा ।
निरोधका कला, ह्येताः सर्व देव निरोधिकाः ॥
'ब्रह्मादिपरमेशानां पर प्राप्ति निरोधनात् ।
‘निरोधिनीतिसा प्रोक्ता'—निरोधिनी का यही अर्थ है । १. रुन्धनी २. रोधनी
३. रौद्री ४. ज्ञानबोधा ५. तमोपहा—यही हैं निरोधिका की कलाएँ ॥ २२ ॥
‘व्यापिनी' के विषय में 'नेत्रतन्त्र' में कहा गया है—सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च
ह्यमृतामृतसंभवाः ॥ ४२ ॥ व्यापिनी चैव विख्याता शक्तितत्व समाश्रिताः । अलुप्त
शक्ति संबंधच्चिच्छक्तिसधिष्ठिताः ॥ ४३ ॥ शक्तितत्त्वे स्थिता ह्येताश्चिन्मात्रा डिप-
लक्षिताः । व्यापिनी व्योमरूपा च ह्यनन्तानाथ संज्ञिता । अनाश्रिता महेशानि
व्यापिकान्यास्तु कलाः स्मृताः ॥”
'समनाशक्ति'—सर्वज्ञा सर्वगा दुर्गा सवना स्पृहणा धृतिः। समना चेति विख्याता
एताः शिवकलाः स्मृताः । इच्छाशक्तिसमधिष्ठाय इच्छा सिद्धि प्रदायिकाः ॥ ४६ ॥
शिवतत्त्व समाश्रित्य सुसम्पूर्णार्णवप्रभाः । अनन्तशक्ति संस्थानाः सूक्ष्माश्चात्यन्त-
निर्मलाः ॥ समनान्तं वरारोहे पाश जालमनेन्तकम् । वट्कारणा पदाक्रान्तं स्थूलसूक्ष्म
प्रभेदतः ॥ शक्त्यादि समनान्तं हि सूक्ष्मविज्ञान गोचरम् । तदूर्ध्वं तु परं शान्तम-
प्रमेयमनामयम् ॥ ४९ ॥
समनान्तं वरारोहे पाशजालमनन्तकम् (स्व० ४।४२९) मस्तक में इन्दु है
उसके ऊपर है बोधिनी और उसके ऊपर है 'नाद' और उसके ऊपर है 'महानाद'
उसके ऊपर है 'कला' (आञ्जी) और उसके ऊपर है 'उन्मनी' । 'अर्धमात्रा' =
बोधिनी ॥ 'बिन्दु' बोधिनी और नाद—बिन्दुमयी परा प्रकृति के पृथक् पृथक् पक्ष
हैं । 'भूतशुद्धितन्त्र' में 'बोधिनी' के नीचे 'बिन्दु' माना गया है ।
कुण्डलिनी एवं नाद—वर्ण रूप १०० कुण्डलों को धारण करने से =
'कुण्डलिनी'—ॐकार—५२ मातृकायें—(१) ५० अक्षरमय (२) ५१वीं मातृका
प्रकाशरूपा (३) ५२वीं मातृका—प्रकाश—प्रवाह : १७ वीं ५० मातृकायें जीवन
कला = लोम + विलोम से १००/१०० मातृकायें = १०० कुण्डल
(१) 'चतुष्पदी नाद'—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४) वैखरी —
पाद 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । तानि विदुर्ब्राह्मणे ये मनीषिणः ॥'
(२) 'पञ्चपदी नाद'—नाद—(१) सूक्ष्मा (२) परा (३) पश्यन्ती (४)
मध्यमा (५) वैखरी ।² आचार्यपद्मपाद
(३) 'सप्तपदी नाद'—(१) शून्य (२) संवित् (३) सूक्ष्मा (४) परा (५)
पश्यन्ती (६) मध्यमा (७) वैखरी—आचार्य पद्मपाद ।
१. सम्मोहनतन्त्र २. प्रपञ्चसारतन्त्र विवरण-पद्मपादाचार्य
१६० वरिवस्यारहस्ये
आदिनाद = आदि मन्त्र
"ॐ" शब्दब्रह्म परावाक्
[चित्र विवरण:]
ॐ
नाद
↓
बिन्दु
↓
जगत्
कुण्डलिनी का फूत्कार
कुण्डलिनी — [सर्पाकार वलय]
कुण्डलिनी के ३ वलय — स्वयंभू लिङ्ग
मूलाधार चक्र त्रिकोण
[दाहिनी ओर प्रवाह:]
प्राणापान का आघात
↓
कुण्डलिनी का जागरण
↓
फूत्कार
महाबिन्दु का विस्फोट | सप्तपदी नाद | सहस्रारचक्र में
↓ | ↓ | (अव्यक्त नाद)
मूलाधार चक्र में = परावाक् | शून्य | ↓
नाभि से नीचे | ↓ | आज्ञा चक्र में
↓ | संवित् | (ॐ)
| ↓ | ↓
नाभि = पश्यन्ती वाक् | सूक्ष्मा | ५२ मातृकाएँ
↓ | ↓ |
हृदय = मध्यमा वाक् | परा |
↓ | ↓ |
कण्ठ = वैखरी वाक् | पश्यन्ती |
↓ | ↓ |
जिह्वादि उच्चारण स्थान = वर्णमाला | मध्यमा |
| ↓ |
| वैखरी |
वाक्
↓
┌───────────────────────┴───────────────────────┐
निस्पन्द वाक् सस्पन्द वाक्
↓ ↓
परा वाक् ┌───────────────┴───────────────┐
मध्यमा वाक् वैखरी वाक्
प्रथमोऽंशः १६१
(१) बिन्दोस्तस्माद्भिद्यमाना द्रवोऽव्यक्तात्मको भवेत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः
'शब्दब्रह्मेति । कथ्यते ॥
(२) मूलाधारात् प्रथममुदितो यस्तु भावः पराख्यः ।
पश्चात् पश्यन्त्यथ हृदयगो बुद्धियुङ्मध्यमाख्यः ॥
वक्त्रे वैखर्यथ रुरुदिषोरस्य जन्तोः सुषुम्ना ।
बद्धस्तस्माद् भवति पवन प्रेरितो वर्ण संङ्घः ॥ ४३ ॥¹
(१) 'शून्य' = अनुत्पन्न, निस्पन्द (२) 'संवित' = वागुत्पित्सु (३) 'सूक्ष्मा'
= उत्पत्यवस्था (४) परा मूलाधार से प्रथम उदित (५) 'पश्यन्ती'—नाभिस्थिता
(६) 'मध्यमा' = हृदयस्थिता (७) वैखरी = कण्ठस्थिता ॥ अभिनव गुप्त पादाचार्य
ने नादादिक का सूक्ष्म वर्णन किया है । 'तन्त्रालोक' में उनका स्वरूप इस प्रकार
निरूपित किया गया है ।
अर्धचन्द्र की कलायें—ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावली, कान्ति, प्रभा एवं विमला =
(५ कलायें) ॥²
बिन्दूर्द्धेऽर्धेन्दु रेतस्य कला ज्योत्स्ना च तद्गता ।
कान्तिः प्रभा च विमला पञ्चैता रोधिकास्ततः ॥ २८।३८३ ॥³
रोधिका (रेखिनी/रोधिनी) की कलायें⁵—रुन्धिनी । रोधनी । रोदध्री ।
ज्ञानबोधा । तमोपहा = ५कलायें ॥ ये ५ कलायें निरोधिका के आवरण की हैं ।⁴
अर्धचन्द्र की अष्टमांश निरोधिका शक्ति होती है ! निरोधिनी शक्ति ब्रह्मा आदि
कारण तत्त्वों को भी आगे बढ़ने से रोक देती है । इसी कारण इसे 'निरोधनी'
कहते हैं । रुन्धनी रोधनी रोदेध्री ज्ञानबोधा तमोपहा एताः पञ्चकलाः प्राहुर्निरोधिन्यां
गुरुत्तमाः ॥ ३८४ ॥⁶
इसके बाद सादाख्य परम भुवन का परिवेश आता है । सादाख्यपरा सदाशिव
देव मन्त्र शरीर है । निरोधिका के ऊपर 'नाद' का आवरण आता है । 'बिन्दु'
अर्धमात्र एवं चतुष्कल होता है उसका आधा 'अर्धचन्द्र' होता है—'अर्धमात्रःस्मृतो
बिन्दुर्व्योमरूपी चतुष्कलः ।' अर्धचन्द्र का अष्टमांश 'निरोधिका शक्ति' होती है ।
'तदर्धमर्धचन्द्रस्तदष्टांशेन निरोधिका'⁷ ॥ ३८५ ॥
निरोधिका आवरण के ऊपर नाद का आवरण है । 'नाद' किञ्जल्क परागवत
रमणीय है । मन्त्रमहेश्वर सदृश सूर्यप्रभ पुरुषों से यह भुवन भरा हुआ है ।
'इन्धिका । दीपिका । रोचिका । मोचिका एवं ऊर्ध्वगा'—ये पाँच नायिकायें वहाँ सदा
सक्रिय रहती हैं ⁸—'नादः किञ्जल्कसदृशो महद्भिः पुरुषैर्वृतः । चत्वारि भुवनान्यत्र
१. शङ्कराचार्य—'प्रपञ्चसारतन्त्र'
२. हेतुन्ब्रह्मादिकान् रुन्द्धे रोधिकां तां त्यजेत्ततः ।
निरोधिकामिमां भित्वा सादाख्यं भुवनं परम् ॥ ३८६ ॥ (तन्त्रालोक)
३-८. तन्त्रालोक
११ वरि.
१६२ वरिवस्यारहस्ये
दिक्षु मध्ये च पञ्चमम् ॥ ३८८ ॥ इन्धिका दीपिका चैव रोधिका मोचिकोर्ध्वगा ।
मध्येऽत्र पदं तत्रोर्ध्वगामी तच्छक्तिभिर्वृतः ॥१' इनमें चार तो चारों दिशाओं को
प्रकाशित करती है किन्तु 'ऊर्ध्वगा' मध्य में राजित रहती है ।२
ऊर्ध्वगामी, विकसित, सौषुम्न अरबिन्द कोश में स्थित नाद इन शक्तियों से
आवृत्त रहते हैं । ये इड़ा-पिङ्गला से संवलित हैं । नाद के ऊर्ध्वभाग में ऊर्ध्वगा
शक्तिधाम में ही ऊर्ध्वगेश नादान्त देव शाश्वत रूप में स्थित है ।२
नाद एवं नादान्त के ऊपर सौषुम्न भुवन का आवरण है । सुषुम्णा शशिप्रभा
महादेवी है । इसके स्वामी सुषुम्नेश अनिशसुषुम्ना विहार करते हैं ।३ सुषुम्नेश
इड़ा-पिङ्गला से घिरे हैं । सुषुम्नेश के अङ्क में देवी सुषुम्ना स्थित है । यही शक्ति
नाद की आश्रय शक्ति है । 'नादः सुषुम्नाधारस्तु भित्वा विश्वमयं जगत्'—नाद
सुषुम्ना में दो काम करता है—प्रथम—अधः शक्ति के द्वारा मूलाधार से उद्गत
होता है ।४ फिर ऊर्ध्वरूपा प्राणात्मिका शक्ति का आश्रय लेकर ऊपर उठता है ।
ऊर्ध्वगामिनी शक्ति में ऊर्ध्वगेश स्थित हैं सारा विश्व-शरीर नाद शक्ति की अधः ऊर्ध्व
शक्तियों से व्याप्त है ।
नाड्या ब्रह्मविले लीनः सोऽव्यक्त ध्वनिरक्षरः ।
नदन्सर्वेषु भूतेषु शिवशक्त्या ह्यधिष्ठितः ॥
नाड्याधारस्तु नादो वै भित्वा सर्वमिदं जगत् । अधः शक्त्या विनिर्गत्य
यावद्ब्राह्मणमूर्द्धतः । नाड्या ब्रह्मबिले लीनस्त्व व्यक्तध्वनिरक्षरः । नदते सर्वभूतेषु
शिवशक्त्या त्वधिष्ठितः ॥ (स्व० १०।१२३३)
इनकी पराशक्ति ब्रह्माणी है जो कि मोक्षद्वार को अवरुद्ध करके स्थित है ।
किन्तु वह मोक्षदा भी है । इस आवरण का भेदन करके शक्ति व्यापिनी धाम समना
में प्रवेश करती है ।५
समना के ऊर्ध्व में कुण्डली भूमि है । वह सुषुप्ता सर्पिणी की भाँति कुण्डली
मारकर बैठी है । इसी शक्तितत्त्व में—सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, एवं अमिता नामक
चार देवियाँ चारों दिशाओं में एवं व्यापिनी मध्योर्ध्व में स्थित है । व्यापिनी के
स्वामी व्यापिनीश भी यहीं स्थित हैं । 'तस्यां सूक्ष्मा सुसूक्ष्मा च तथान्ये अमृतासिते ।
मध्यतो व्यापिनी तस्यां व्याजीशो व्यापिनीधरः ॥' 'सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च तथा चैवा-
मृतामिता । व्यापिनी मध्यतो ज्ञेया शेषाः पूर्वांदितः क्रमात् ॥' (स्व० १०।१२९०)६
शक्तितत्त्व में—(१) सूक्ष्मा (२) सुसूक्ष्मा (३) अमृता (४) अमिता—ये चार
देवियाँ चार दिशाओं में एवं 'व्यापिनी' मध्योर्ध्व में स्थित हैं । वही व्यापिनी के
स्वामी व्यापिनीश भी स्थित है ।७
'व्यापिनी' का अवस्थान शक्तितत्त्व में है । शक्ति अनाश्रित भुवन के रूप में
भी स्वीकृत है । शक्ति का आश्रय लेकर शिवत्व भी विश्वोल्लास में संलग्न है ।
१-७. तन्त्रालोक
प्रथमोऽंशः १६३
व्यापी, व्योमात्मक, अनन्त एवं अनाथ—ये चार दिग्देव हैं । ऊर्ध्व दिग्देव अनाश्रित
है । इसी नाम से वहाँ देवाधिदेव भी स्थित हैं । अनाश्रित प्रभु अनन्त कोटि सूर्यों
के प्रकाश से भासमान है और अपनी अङ्कशोभिता अनाश्रिता शक्ति से सुशोभित है
अनाश्रित, शक्तितत्त्व में स्थित है शिव में नहीं । ब्रह्मबिल—शक्ति—व्यापिनी—
समना—उन्मना—का क्रम है ।१
अनाश्रित शिवतत्त्व से ऊर्ध्व आवरण 'समना' नामक पराशक्ति का भुवन है—
शिवतत्त्वोर्ध्वतः शक्तिः परा सा समनाह्वया ।
सर्वेषां कारणानां सा कर्तृभूता व्यवस्थिता ॥ ४०० ॥
विभर्त्यण्डान्यनेकानि शिवेन समधिष्ठता ।
तदारूढः शिवः कृत्य पञ्चकं कुरुते प्रभुः ॥ ४०१ ॥
(१) यह समस्त कारणों की कारणरूपा भूमि है ।२
(२) यह शिवाधिष्ठिता क्रियारूपा पराशक्ति अनन्त अण्डकराओं को धारण
करती है और उनका पोषण करती है ।३
(३) समना में अधिष्ठित । शिव पञ्चकृत्य (सृष्टि। स्थिति। संहार तिरोधान।
अनुग्रह) का सम्पादन करते है । इन्हें ही ३६ तत्त्वमय विभु शिव कहते हैं ।
पञ्चकृत्य करने का आधार यह है कि प्रमाता और कर्ता शिव की सृष्टि क्रिया में
'समना' ही कारणरूपा है—समना करणं तस्य हेतुकर्तुर्महेशितुः ।१ परमात्मा शिव
पहले स्वातन्त्र्यवश शून्यात्मकता को अवभासित करता है और परिणामत अनाश्रित
शिव हो जाता है ये उसी शिवेच्छा से पञ्चकृत्य का सम्पादन करते हैं—
'अतश्चानाश्रितादस्तदिच्छयैन सृष्ट्यादि करोति—अनाश्रित भूमिका स्थित शिव 'अनाथ'
भूमिका का निर्वाह करते हैं । 'अनाश्रित' अनाथ को पैरित करते हैं एवं
'अनाथ'—'अनंतेश' को पैरित करते हैं । अनन्तेश व्योमविग्रह व्योमात्मा शिव को
व्योमव्यापी, व्यापी शिव को पैरित करते हैं ।४ व्यापिनी ही इनकी करण शक्ति है ।
माया इनकी कर्मरूपा शक्ति है । उसी के अधिकार में विश्वगर्भा कुण्डलिनी स्थित
है । नाद, निरोधिनी, अर्धचन्द्र एवं बिन्दु आदि इसी के कार्य हैं । अनाश्रित,
अनाथ अनन्त, व्योमात्मा एवं व्यापी—ये ही पञ्चकारण हैं । ये क्रमशः बिलग्रन्थि,
नादोर्ध्वत, सुषुम्ना, बिन्दु एवं शक्ति के स्वामी है । अनाश्रित, ब्रह्मा, अनाथ विष्णु,
अनन्त रुद्र, व्योम भट्टारक ईश्वर, व्यापी-सदाशिव रूप है ५ ॥ २४-२७ ॥
'नाद'—'शारदातिलक' में कहा गया है कि 'पर बिन्दु' जो कि पराशक्ति से
समन्वित है अपने को तीन भागों में विभाजित करता है जो निम्न है—(१) बिन्दु
(२) नाद (३) बीज । 'बिन्दु' शिवरूप 'बीज' शक्तिरूप एवं 'नाद' शिवशक्तिरूप
है—शिव-शक्ति दोनों की प्रकृति से युक्त है—शिवशक्ति का पारस्परिक सम्बंध या
दोनों का 'मिथःसमवायः' है । 'नाद'—शिव एवं शक्ति के पारस्परिक सम्बंध का
१-५. तन्त्रालोक
१६४ वरिवस्यारहस्ये
नाम है—'Nāda is thus the union of therse two in creation'¹. 'Nāda is
the first produced movement in the editing cosmic consciousness
leading up to the Sound Brahman (Śabda Brahma) where all ideas
the languege in which they are exrpressed (Śabda) and the objects
(Artha) which they denote are demised''.² Nāda is a mutual relation
between Bindu and Bīja.³
'बिन्दुः शिवात्मको, बीजम् शक्तिर नादास्तयोर्मिथः ।
समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदैः ॥'
'Nāda is Śiva Śakti—that is, their mutual relation or interaction
(मिथः समवायः) or yoga (union) as 'Prayogo-Sana' call it.⁴
जब 'प्रकाशबिन्दु' 'विमर्शबिन्दु' में प्रविष्ट होता है तब बिन्दु में उच्छूनता
(Swelling, सूजन) आती है तब इस बिन्दु से नाद उत्पन्न होता है । इसी
नाद में सारे तत्त्व रहते हैं । यही नाद व्यक्त होकर त्रिकोण का रूप धारण कर
लेता है ॥ २८-३० ॥
पूर्वं विद्यास्वरूपस्य काल उक्तः, इदानीमुच्चारणकालं निष्कृष्याह—
आद्ये दश मध्ये ताः सार्धास्तार्तीय कूटेष्टौ ।
एकलवोना ऊनत्रिंशन्मात्रा मनोजपे कालः ॥ ३१ ॥
(कूटत्रय का उच्चारण-काल)
प्रथम (कूट) में दश (मात्रायें), मध्य (कूट) में साढ़े दस (मात्रायें) एवं तृतीय
(कूट) में एक लव कम साढ़े आठ (मात्रायें)—कुल मिलाकर एक लव न्यून
उन्तीस मात्रा-काल जप में होना चाहिए ॥ ३१ ॥
- प्रकाश *
आद्ये कूटे दश मात्राः । मध्ये कामराजकूटे ता दश सार्धा मात्राः । तार्तीय-
कूटेऽष्टाविति । यस्य पूर्वपरवर्ति पदद्वयं काकाक्षिन्यायेन द्विर्द्विरन्वयितव्यम् । तेनैकल-
वोनाः सार्धा अष्टौ मात्रास्तृतीयकूटे यथापूर्वमवस्थिता इत्यर्थः । संहत्य त्वाह—एकल-
वोना इति । ऊनत्रिंशदेकोनत्रिंशत् । जपे वाचिके । न तु मानसे पूर्वोक्तकालादयः ।
प्रथमद्वितीयकूटस्थास्तु यत्र न्यासादौ संध्याङ्गभूते—कैककूटमात्रजपे च प्रातिस्विक-
मुच्चारणेन कूटानां विनियोगविधिस्तत्रैव सार्थका इति विज्ञेयम् ॥ ३१ ॥ - सरोजिनी *
'पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के प्रथम कूट ('वाग्भव कूट') में १० मात्रायें, मध्य द्वितीय
कूट ('कामराज कूट') में १० मात्रायें, एवं तृतीय कूट ('शक्ति कूट') में एक लव
1-4. Serpent Power (Sir Jöhn Woodroffe) p. 43
प्रथमोऽंशः १६५
कम ८ ।। मात्रायें अर्थात् एक लव कम २९ मात्राकाल में मन्त्र का जप किया
जाना चाहिए ।
'आद्ये' — आद्यकूट (वाग्भव कूट) में । "मध्ये" द्वितीय या कामराज कूट में ।
“सार्धा” = १/२ भाग ।
'तार्तीय कूटे' — तृतीय कूट, शक्ति कूट में ।
'मनोर्जपे' — मन्त्र के जप में । 'जपे' = वाचिक जप में ।
'कालः' — किसी भी मन्त्र या उसके कूट के उच्चारण में कितना समय लगना
चाहिए इसका समयानुशासन ही 'काल' है । मन्त्रोच्चारण काल ही यहाँ 'काल'
शब्द का अर्थ है ॥ ३१ ॥
अथ कूटानां व्यष्टिसमष्टिभेदेन चतुर्धाभिन्नानां स्वरूपविशेषनाह—
व्यष्टि समष्टिविभेदादस्यां चत्वारि बीजानि ।
सृष्टि-स्थिति-संहारा नाख्यारूपाणि भवनीयानि ॥ ३२ ॥
पुटधामतत्त्वपीठान्वयलिङ्गकमातृ तत्समष्टीनाम् ।
रूपान्तराणि बीजाान्यमूनि चत्वारि चिन्तनीयानि ॥ ३३ ॥
(कूटत्रय में बीज चतुष्टय)
इस (विद्या) में (तीनों कूटों पर) व्यष्टि (व्यक्तिगत) एवं समष्टि (सामूहिक)
रूप से विचार करने पर (इसमें) सृष्टि, स्थिति संहार एवं अनाख्या रूप वाले चार
बीजों (के अवस्थान) का चिन्तन करना चाहिए ॥ ३२ ॥
(बीज चतुष्टय का)
पुट, धाम, तत्त्व, पीठ, अन्वय, लिङ्ग एवं मातृका आदि में इन चारों बीजों
की भावना व्यष्टि-समष्टि भेद से करनी चाहिए ॥ ३३ ॥
- प्रकाश *
अनाख्या तिरोधानानुग्रहयोः समष्टिः, कृत्यपञ्चकेष्वप्यौदासीन्यावलम्बनरूपा-
वस्थानविशेषो वा । पुटादिष्टकं धामसप्तकं च त्रित्रिरूपं पृथक्पृथक् तत्समष्टि-
रेकैकैत्येवं चत्वारि चत्वारि । यथा—पुटानि ज्ञातृज्ञानज्ञेयानि तत्सामरस्यं च । धामानि
चक्रनाथदशाशक्तित्रयात्मरूपाणि सप्त । तत्र चक्राण्यग्निचक्रसूर्यचक्रसोमचक्राणि
ब्रह्मचक्रं च । नाथा मित्रेशनाथषष्ठीशनाथोड्डीशनाथाश्चर्यनिन्दनाथश्च । दशा जाग्रत्स्वप्न-
सुषुप्तयस्तुरीया' च । शक्तयः —वामाज्येष्ठारौद्र्यः शान्ता च; इच्छाज्ञानक्रिया अम्बिका
च; कामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिन्यो महात्रिपुरसुन्दरी च । आत्मान आत्मा-
न्तरात्मपरमात्मानो ज्ञानात्मा च । तत्त्वान्यात्मतत्त्वविद्यातत्त्वशिवतत्त्वानि सर्वतत्त्वं च ।
पीठानि कामरूपपूर्णगिरिजालंधराख्योड्डयाणपीठं च । अन्वयाः प्राग्दक्षिणपश्चिमान्वया
उत्तरान्वयश्च । एत एव समयपदेनाम्नायपदेन च कथ्यन्ते । लिङ्गानि स्वयंभूबाणेतराणि
१६६ वरिवस्यारहस्ये
परं च । मातृकाः पश्यन्तीमध्यमावैखर्यः परा च । धामपदार्थत्वेनोक्तं शक्तित्रयं मातृ-
पदस्थ वार्थः ॥ ३२-३३ ॥
- सरोजिनी *
'समष्टि'—समूहात्मक । 'व्यष्टि'—व्यक्तिगत । 'बीज'—१. 'सृष्टि' २. 'स्थिति'
३. 'संहार' ४. 'अनाख्या' ।
'अनाख्या'—निरोधन एवं अनुग्रह की समष्टि । कृत्यपञ्चक में भी औदासीन्य
का विशेषावलम्बन ।
'अस्यां चत्वारि बीजानि'—इसमें चार बीज हैं जो निम्न हैं—१. सृष्टि
२. स्थिति ३. संहार ४. अनाख्या ॥ ३२ ॥
'पुट'—पुटादिष्टक । 'अनाख्या'—तिरोधान-अनुग्रह की सृष्टि कृत्य पञ्चक में
भी औदासीन्यावलम्बनरूप अवस्थान विशेष ।
'धाम'—धामसप्तक ।
'पुट'—ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय एवं उनका सामरस्य ।
'धाम'—सामरस्यचक्र नाथ दशा शक्ति त्रयात्मकरूप सात ।
'चक्र'—अग्निचक्र । सूर्य चक्र । सोमचक्र । ब्रह्म चक्र ।
'नाथ'—मित्रेशनाथ, षष्ठीशनाथ, उड्डीशनाथ, आश्चर्यानन्दनाथ ।
'दशा'—जाग्रत, स्वप्न, सुषुरित, तुरीय ।
'शक्ति'—वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, शान्ता । एवं—इच्छा, ज्ञान क्रिया, अम्बिका
एवं कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी एवं महात्रिपुरसुन्दरी । आत्मा, अन्तरात्मा,
परमात्मा, ज्ञानात्मा ।
'तत्त्व'—आत्मतत्त्व । विद्यातत्त्व । शिवतत्त्व । सर्वतत्त्व ।
'पीठ'—कामरूप, पूर्णगिरी, जालंधर, ओडयाण पीठ ।
'अन्वय'—प्राक्, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर । समय पद । आम्नाय पद ।
'लिङ्ग'—स्वयंभूलिङ्ग । बाणलिङ्ग । इतरलिङ्ग । परलिङ्ग ।
'मातृका'—पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, परा ।
'पुट'—ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय एवं उनका सामरस्य ।
'कामरूप पीठ' क्या है?—'कामरूप पीठ'—जब पराशक्ति आत्मगर्भस्थ एवं
अपने साथ एकीभूत विश्व को देखने के लिए उन्मुख होती है तब शक्ति एवं शिव
साम्यभावापन्न होकर एक बिन्दु के रूप में परिणत हो जाते हैं जिससे कि
पारमार्थिक चैतन्य प्रतिकालित होकर ज्योतिलिङ्ग के रूप में प्रकट होता है । यही
प्रथमोऽंशः १६७
बिन्दु 'कामरूप पीठ' कहलाता है । इस पीठ में अभिव्यक्त चैतन्य 'स्वयंभूलिङ्ग'
कहलाता है । यह शक्तिपीठ शक्ति एवं शिव से समभाव में एक-एक मात्रा लेकर
सङ्घटित है । शिव-शक्ति का यह अंशद्वय-(१) 'शान्ताशक्ति' एवं (२) 'अम्बिका
शक्ति' कहलाता है । इस पीठ में महाशक्ति की अभिव्यक्ति 'परावाक्' के रूप में
होती है । यही प्रणव का परम रूप या वेद का स्वरूप है ।
'पूर्णगिरि पीठ'—शक्ति के क्रमिक विकास के क्रम में आगे 'शान्ताशक्ति'
'इच्छाशक्ति' के रूप में परिणत हो जाती है एवं शिवांश-अम्बिका शक्ति भी 'वामा'
के रूप में परिणत हो जाती है । (शान्ता—इच्छा । अम्बिका—वामा ।) उभय
शक्तियों के पारस्परिक वैषम्य के दूर होने पर एक अद्वय सामरस्यमय बिन्दु का
आविर्भाव होता है जिससे कि तदनुरूप चैतन्य का स्फुरण होता है । इसी बिन्दु
को 'पूर्णगिरि पीठ' कहते हैं । यही हैं 'पश्यन्तीवाक्' की अवस्था ।
'जालन्धर पीठ'—इच्छाशक्ति के उपराम होने पर जब 'ज्ञानशक्ति' का
आविर्भाव होता है एवं शिवांश ज्येष्ठाशक्ति के साथ ज्ञानशक्ति अद्वैतभाव में मिलित
होती है तब 'जालन्धर पीठ' रूप सामरस्य बिन्दु की सृष्टि करता है । इस बिन्दु
से अभिव्यक्त चैतन्य 'इतरलिङ्ग' कहा जाता है । शक्ति के इस स्तर में
'मध्यमावाक्' आविर्भूत होती है
'उड्डीयान पीठ'—जब ज्ञान शक्ति 'क्रियाशक्ति' के रूप में परिणत होती है
तब शिवांश रौद्री शक्ति के साथ साम्यभाव प्राप्त करती है । उसके द्वारा जिस
अद्वैत बिन्दु का आविर्भाव होता है उसे 'उड्डीयान पीठ' कहते हैं । इस बिन्दु से
चित् शक्ति महातेजोमय 'परलिङ्ग' के रूप में अभिव्यक्त होता है एवं यहाँ शब्द
वैखरीवाक् के रूप में आविर्भूत होता है ।
समस्त विश्व का मूल महात्रिकोण है ।
त्रिकोण कामध्य बिन्दु परावाक् या अम्बिकाशान्ता—इन दो शिवशक्त्यंश का
साम्यभावापन्न स्वरूप है । बिन्दु में शिव+शक्ति दोनों का अंश स्थित है इसी प्रकार
त्रिकोण में भी किन्तु 'बिन्दु' प्रधानतः शिव रूप में एवं त्रिकोण 'शक्ति' या योनि
रूप में परिणत हो जाता है ।
त्रिकोण की ३ रेखायें = पश्यन्ती, मध्यमा वैखरी है । त्रिकोण की ३ रेखायें
वाचक हैं—३ शब्दों, सृष्टि-स्थिति-संहार रूप ३ व्यापारों वामा-ज्येष्ठा-रौद्री, ब्रह्मा-
विष्णु-महेश (शिवांश) की प्रतिनिधि है ।
१६८ वरिवस्यारहस्ये
अथ प्रत्यक्षरं स्वरूपमाह—
एकैकस्मिन् कर्मणि सृष्ट्यादिविभेद तस्त्रिविधे ।
ब्रह्माद्या अधिपतयो भारत्यादि स्वशक्तिभिः सहिताः ॥ ३४ ॥
ब्रह्मादयस्त्रयोऽमी भारत्याद्याश्च शक्तयस्तिस्रः ।
प्रत्यक्षरस्वरूपाः शाक्तार्थे वक्ष्यमाण रीत्या ॥ ३५ ॥
(ब्रह्मादिक देवत्रय एवं उनकी शक्तियों की मन्त्राक्षररूपता)
ब्रह्मादिक अधिपति भारती आदि अपनी शक्तियों के साथ सृष्टि आदि प्रत्येक
कर्म के पक्ष त्रय के अधिपति होते हैं ॥ ३४ ॥
शाक्तार्थ में विवक्षित रीति के अनुसार ये ब्रह्मादिक देवत्रय एवं भारती आदि
शक्तियाँ प्रत्येक मन्त्राक्षर के स्वरूप वाले हैं ॥ ३५ ॥
- प्रकाश *
सृष्टिकर्म त्रिविधं सृष्टिसृष्टिः सृष्टिस्थितिः सृष्टिसंहृतिश्चेति । एवं स्थितिकर्म
स्थितिसृष्टिः स्थितिस्थितिः स्थितिसंहृतिश्चेति । एवं संहृति कर्मापि संहृतिसृष्टिः संहृति-
स्थितिः संहतिसंहृतिश्चेति । अत्र प्रतित्रिकं ब्रह्मादयस्त्रयोऽ ब्रह्मविष्णुरुद्रा भारतीपृथिवी-
रुद्राणीसहिता अधिपतयः । एवं च प्रथमकूटे—ककारो ब्रह्मण एवं रूपान्तरम्,
त्रिकोणा तु भारतीस्वरूपा, तुर्यः स्वरो विष्णुस्वरूपः, लकारः पृथिवीस्वरूपः, हकारो
रुद्रस्वरूपः, रेफो रुद्राणीस्वरूपः, तुर्यः स्वरस्तु शान्ताम्बिकात्मकमिथुनस्वरूपः ।
द्वितीयकूटे मध्यमहकारं परित्यज्यावशिष्टाक्षरेष्वेषैव रीतिः । तृतीयकूटे तु द्वितीय-
कूटस्थपरित्यक्तहकारस्य ब्रह्मस्वरूपत्वादभारतीमारभ्यैव सकारेणारम्भः । शक्तिकूट-
त्वेन शक्तेः प्राधान्येन प्रथमं निर्देशः । तदेतदाह—शाक्तार्थे वक्ष्यमाणयेति ॥ ३४-३५ ॥ - सरोजिनी *
(क) सृष्टि कर्म त्रिविध है—१. 'सृष्टि-सृष्टि' २. 'सृष्टि-स्थिति' ३. 'सृष्टि-
संहति' ॥ (ख) स्थिति कर्म भी त्रिविध है—१. 'स्थिति-सृष्टि' २. स्थिति-स्थिति'
३. 'स्थिति-संहति' ॥ (ग) संहति कर्म—१. 'संहति-सृष्टि' २. 'संहति-स्थिति'
३. 'संहति-संहति' ॥
प्रत्येक त्रिक—में ब्रह्मादिक तीन—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र । भारती, पृथ्वी एवं
रुद्राणी सहित उनके अधिपति ।
(क) प्रथम कूट में—'ककार'—ब्रह्म । 'त्रिकोण' (ए) = भारती ॥ 'तुर्य स्वर'
= 'ई' = विष्णु । 'ल' = पृथ्वी । 'ह्रीं' = में 'ह' = रुद्र । रेक = रुद्राणी । 'ई'
= तुर्य स्वर = 'शान्ता'-'अम्बिका'-मिथुन रूप । ('क,ए,ई,ल,ह्रीं' = प्रथम कूट) ।
(ख) द्वितीय कूट में—('ह स क ह ल ह्रीं') ।
(ग) तृतीय कूट में—('स क ल ह्रीं') ॥ ३४ ॥
प्रथमोऽंशः १६९
इस श्लोक का आशय यह घोषित करना है कि—ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी
एवं रुद्र-रुद्राणी पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के प्रत्येक वर्ण के साक्षात स्वरूप हैं।
सारांश—पञ्चदशाक्षरीमन्त्र के वर्ण = ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी, रुद्र-रुद्राणी।
समस्त वर्णों का मूल केन्द्र 'परावाक्' है और परावाक् भगवती का स्वरूप है—
आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदासा परमा कला।
अम्बिका रूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता॥ ३६॥१
अर्थात् विमर्श शक्तिरूपा 'परमाकला' जब अपने पर शिवरूप आत्मा का
(पश्यन्ती आदि क्रम से वैखरीपर्यन्त) स्फुरण (विमर्शन) देखना चाहता है तो परमा
शान्तात्मिका होकर अम्बिका रूप को प्राप्त करके (प्रकाशांश मात्रा वाली अम्बिका
के साथ सामरस्यापन्न होकर) 'परावाक्' कहलाने लगती है। 'इच्छाशक्ति' ही
पश्यन्ती वाक् बन जाती है एवं 'ज्ञानशक्ति' ही 'मध्यमावाक्' बन जाती है—
(१) इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुषा स्थिता।२
(२) ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमावागुदीरिता।३
इसी वाक् से ही मन्त्र बनते हैं। वाक् देवी है तो मन्त्र एवं देवी में कोई
भेद नहीं है।
मन्त्रों का सङ्घटन शिवशक्ति समायॊग से होता ही है—
(१) शिवशक्तिसमायोगाज्जनितो मन्त्रराजकः।४
(२) तेषां समष्टिरूपेण पराशक्ति तु मातृकाम्।
(३) पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सदानघे।
तन्मयी मूलविद्या च तदद्य कथयामि ते॥
(४) शक्ति मूलाधार में वाणी बन गई है और मन्त्र वाणीमय हैं।
मूलाधारे तडिद्रूपे वाग्भवाकारतां गते।
अष्टात्रिंशत्कलायुक्त पञ्चादशद्वंशाविग्रहा॥५
विद्याकुण्डलिनीरूपा मण्डलत्रयविभेदिनी।६
(५) शिवशक्तिसमायोगाच्च मन्त्राणामुदयः परः।७
(६) समस्त मन्त्रों की योनि परमात्मा की ज्ञानशक्ति है।८
१-६. योगिनीहृदय ७. नेत्रतन्त्र
८. ज्ञानशक्ति परा सूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः।
सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रारणिवत्स्थिता॥
मन्त्रसृष्टिर्भवेद्देषा शिवस्य परमात्मनः।
अस्मादेव समुत्पन्ना मन्त्राश्चामोघ शक्तयः॥ (नेत्रतन्त्र)
१७० वरिवस्यारहस्ये
अथावशिष्टानां बिन्दूनां बिन्द्वादीनां स्वरूपमाह—
हृल्लेखा कामकला सपरार्धकलाख्य कुण्डलिन्युत्थः ।
नादाश्चक्रत्रितय त्रितयात्मनो विभावनीयाः स्युः ॥ ३६ ॥
प्रकाश
अत्र प्रथमकूटे या हृल्लेखा, तदन्तर्गता या कामकला, तस्यां गुरुमुखैकवेद्या या
सपरार्धकला, सा वह्निकुण्डलिनीत्युच्यते । सैव द्वितीयकूटे सूर्यकुण्डलिनीति, तृतीय-
कूटे सोमकुण्डलिनीति च कथ्यते । बिन्द्वादिसमष्टिरूपो नादस्तु तत एवोत्पन्नो
दीपशिखाप्रवर्तिकज्जलेखावत् । एवं चानाहतमारभ्योत्थितो नादस्त्रैलोक्यमोहन-
सर्वाशापरिपूरकसर्वसंक्षोभणचक्रत्रयस्य त्रिविधसृष्टिरूपस्यापरं रूपम्; भ्रूमध्यमारभ्यो-
त्थितो नादः सर्वसौभाग्यदायकसर्वार्थसाधकसर्वरक्षाकरचक्रत्रयस्य त्रिविधस्थिति-
रूपस्यापरं रूपम्; बिन्दुस्थानमारभ्योत्थितो नादः सर्वरोगहरसर्वसिद्धिप्रदसर्वानन्दमय-
चक्रत्रयस्य संहृतित्रयरूपस्यापरं रूपमिति विभावनीयाः ॥ ३६ ॥
हृल्लेखाओं में स्थित कामकला (ई) की सपरार्ध कला नाम वाली (तीन)
कुण्डलिनियों से आविर्भूत नादों को तीनों चक्रों के त्रिक के रूप में कल्पित किया
जाना चाहिए ॥ ३६ ॥
सरोजिनी
कुण्डलिनी के तीन रूप हैं—'वह्नि', 'सूर्य' एवं 'सोम' कु० ।। हृल्लेखा में
स्थित कामकला (ई) हीं 'सपरार्धकला' हैं । इन कुण्डलिनियों से उत्पन्न ९ नादों
को तीनों चक्रों के त्रिक समझना चाहिए ।
(क) 'वह्नि कुण्डलिनी'—प्रथम कूट में—जो 'हृल्लेखा' है उसके अन्तर्गत जो
'कामकला' है उसके अन्तर्गत गुरुमुखैकवेद्या जो 'सपरार्धकला' है वही
'वह्निकुण्डलिनी' है ।¹
(ख) 'सूर्य कुण्डलिनी'—प्रथम कूट में स्थित वह्निकुण्डलिनी ही द्वितीय कूट
में 'सूर्यकुण्डलिनी' कहलाती है ।²
(ग) 'सोम कुण्डलिनी'—प्रथम कूट की वह्निकुण्डलिनी, द्वितीय कुण्डलिनी
की सूर्य कुण्डलिनी ही तृतीय कूट में 'सोमकुण्डलिनी' कहलाती है । 'नाद'
बिन्द्वादिसमष्टिरूप है ('बिन्द्वादि समष्टिरूपो नादः') उसी से दीपशिखाग्रवर्ती कज्जल-
लेखा की भाँति उत्पन्न होता है ।³
इसी प्रकार अनाहत चक्र से—
(क) समारब्ध होकर उठने वाला 'नाद'—त्रैलोक्यमोहन-सर्वाशा परिपूरक-
सर्वसंक्षोभण चक्र की त्रिविधात्मक सृष्टि का अपर रूप है ।
१-३. भास्कर—प्रकाश
प्रथमोऽंशः १७१
(ख) भ्रूमध्य से समारब्ध एवं वहाँ से उठने वाला 'नाद'—सर्वसौभाग्य दायक,
सर्वार्थसाधक, सर्वरक्षाकर चक्रत्रय के त्रिविध स्थिति रूप का अपर रूप है ।१
(ग) बिन्दुस्थान से समारब्ध एवं वहाँ से उठने वाला 'नाद'—सर्वरोगहर-
सर्वसिद्धिप्रद-सर्वानन्दमय चक्रत्रय के संहतित्रय का अपर रूप है ।२ श्रीविद्या के
चतुर्थखण्ड में १५ कलाओं का अन्तर्भाव है । इन सभी का निवास ह्रीङ्कार में है
क्योंकि—
श्री विद्यात्मके चतुर्थे खण्डे पञ्चदशकलानां अन्तर्भावं निश्चित्य भुवनेश्वरी
प्रभृतीनां योगिनीविद्यानां नवानां त्रिकस्य त्रिकस्य एकैक ह्रीङ्कारेण अन्तर्भावं अङ्गीकृत्य,
सर्वभूतात्मकं, सर्वमन्त्रात्मकं, सर्वतत्त्वात्मकं, सर्वावस्थात्मकं, सर्वदेवात्मकं, सर्ववेदार्था-
त्मकं, सर्वशब्दात्मकं, सर्वशक्त्यात्मकं, त्रिगुणात्मकं, त्रिखण्डं, त्रिगुणातीतं, सादाख्या