वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ वरिवस्यारहस्ये
दिक्षु मध्ये च पञ्चमम् ॥ ३८८ ॥ इन्धिका दीपिका चैव रोधिका मोचिकोर्ध्वगा ।
मध्येऽत्र पदं तत्रोर्ध्वगामी तच्छक्तिभिर्वृतः ॥१' इनमें चार तो चारों दिशाओं को
प्रकाशित करती है किन्तु 'ऊर्ध्वगा' मध्य में राजित रहती है ।२
ऊर्ध्वगामी, विकसित, सौषुम्न अरबिन्द कोश में स्थित नाद इन शक्तियों से
आवृत्त रहते हैं । ये इड़ा-पिङ्गला से संवलित हैं । नाद के ऊर्ध्वभाग में ऊर्ध्वगा
शक्तिधाम में ही ऊर्ध्वगेश नादान्त देव शाश्वत रूप में स्थित है ।२
नाद एवं नादान्त के ऊपर सौषुम्न भुवन का आवरण है । सुषुम्णा शशिप्रभा
महादेवी है । इसके स्वामी सुषुम्नेश अनिशसुषुम्ना विहार करते हैं ।३ सुषुम्नेश
इड़ा-पिङ्गला से घिरे हैं । सुषुम्नेश के अङ्क में देवी सुषुम्ना स्थित है । यही शक्ति
नाद की आश्रय शक्ति है । 'नादः सुषुम्नाधारस्तु भित्वा विश्वमयं जगत्'—नाद
सुषुम्ना में दो काम करता है—प्रथम—अधः शक्ति के द्वारा मूलाधार से उद्गत
होता है ।४ फिर ऊर्ध्वरूपा प्राणात्मिका शक्ति का आश्रय लेकर ऊपर उठता है ।
ऊर्ध्वगामिनी शक्ति में ऊर्ध्वगेश स्थित हैं सारा विश्व-शरीर नाद शक्ति की अधः ऊर्ध्व
शक्तियों से व्याप्त है ।
नाड्या ब्रह्मविले लीनः सोऽव्यक्त ध्वनिरक्षरः ।
नदन्सर्वेषु भूतेषु शिवशक्त्या ह्यधिष्ठितः ॥
नाड्याधारस्तु नादो वै भित्वा सर्वमिदं जगत् । अधः शक्त्या विनिर्गत्य
यावद्ब्राह्मणमूर्द्धतः । नाड्या ब्रह्मबिले लीनस्त्व व्यक्तध्वनिरक्षरः । नदते सर्वभूतेषु
शिवशक्त्या त्वधिष्ठितः ॥ (स्व० १०।१२३३)
इनकी पराशक्ति ब्रह्माणी है जो कि मोक्षद्वार को अवरुद्ध करके स्थित है ।
किन्तु वह मोक्षदा भी है । इस आवरण का भेदन करके शक्ति व्यापिनी धाम समना
में प्रवेश करती है ।५
समना के ऊर्ध्व में कुण्डली भूमि है । वह सुषुप्ता सर्पिणी की भाँति कुण्डली
मारकर बैठी है । इसी शक्तितत्त्व में—सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, एवं अमिता नामक
चार देवियाँ चारों दिशाओं में एवं व्यापिनी मध्योर्ध्व में स्थित है । व्यापिनी के
स्वामी व्यापिनीश भी यहीं स्थित हैं । 'तस्यां सूक्ष्मा सुसूक्ष्मा च तथान्ये अमृतासिते ।
मध्यतो व्यापिनी तस्यां व्याजीशो व्यापिनीधरः ॥' 'सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च तथा चैवा-
मृतामिता । व्यापिनी मध्यतो ज्ञेया शेषाः पूर्वांदितः क्रमात् ॥' (स्व० १०।१२९०)६
शक्तितत्त्व में—(१) सूक्ष्मा (२) सुसूक्ष्मा (३) अमृता (४) अमिता—ये चार
देवियाँ चार दिशाओं में एवं 'व्यापिनी' मध्योर्ध्व में स्थित हैं । वही व्यापिनी के
स्वामी व्यापिनीश भी स्थित है ।७
'व्यापिनी' का अवस्थान शक्तितत्त्व में है । शक्ति अनाश्रित भुवन के रूप में
भी स्वीकृत है । शक्ति का आश्रय लेकर शिवत्व भी विश्वोल्लास में संलग्न है ।
१-७. तन्त्रालोक