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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 530 में से

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पृष्ठ 265

प्रथमोऽंशः १६३
व्यापी, व्योमात्मक, अनन्त एवं अनाथ—ये चार दिग्देव हैं । ऊर्ध्व दिग्देव अनाश्रित
है । इसी नाम से वहाँ देवाधिदेव भी स्थित हैं । अनाश्रित प्रभु अनन्त कोटि सूर्यों
के प्रकाश से भासमान है और अपनी अङ्कशोभिता अनाश्रिता शक्ति से सुशोभित है
अनाश्रित, शक्तितत्त्व में स्थित है शिव में नहीं । ब्रह्मबिल—शक्ति—व्यापिनी—
समना—उन्मना—का क्रम है ।१
अनाश्रित शिवतत्त्व से ऊर्ध्व आवरण 'समना' नामक पराशक्ति का भुवन है—
शिवतत्त्वोर्ध्वतः शक्तिः परा सा समनाह्वया ।
सर्वेषां कारणानां सा कर्तृभूता व्यवस्थिता ॥ ४०० ॥
विभर्त्यण्डान्यनेकानि शिवेन समधिष्ठता ।
तदारूढः शिवः कृत्य पञ्चकं कुरुते प्रभुः ॥ ४०१ ॥
(१) यह समस्त कारणों की कारणरूपा भूमि है ।२
(२) यह शिवाधिष्ठिता क्रियारूपा पराशक्ति अनन्त अण्डकराओं को धारण
करती है और उनका पोषण करती है ।३
(३) समना में अधिष्ठित । शिव पञ्चकृत्य (सृष्टि। स्थिति। संहार तिरोधान।
अनुग्रह) का सम्पादन करते है । इन्हें ही ३६ तत्त्वमय विभु शिव कहते हैं ।
पञ्चकृत्य करने का आधार यह है कि प्रमाता और कर्ता शिव की सृष्टि क्रिया में
'समना' ही कारणरूपा है—समना करणं तस्य हेतुकर्तुर्महेशितुः ।१ परमात्मा शिव
पहले स्वातन्त्र्यवश शून्यात्मकता को अवभासित करता है और परिणामत अनाश्रित
शिव हो जाता है ये उसी शिवेच्छा से पञ्चकृत्य का सम्पादन करते हैं—
'अतश्चानाश्रितादस्तदिच्छयैन सृष्ट्यादि करोति—अनाश्रित भूमिका स्थित शिव 'अनाथ'
भूमिका का निर्वाह करते हैं । 'अनाश्रित' अनाथ को पैरित करते हैं एवं
'अनाथ'—'अनंतेश' को पैरित करते हैं । अनन्तेश व्योमविग्रह व्योमात्मा शिव को
व्योमव्यापी, व्यापी शिव को पैरित करते हैं ।४ व्यापिनी ही इनकी करण शक्ति है ।
माया इनकी कर्मरूपा शक्ति है । उसी के अधिकार में विश्वगर्भा कुण्डलिनी स्थित
है । नाद, निरोधिनी, अर्धचन्द्र एवं बिन्दु आदि इसी के कार्य हैं । अनाश्रित,
अनाथ अनन्त, व्योमात्मा एवं व्यापी—ये ही पञ्चकारण हैं । ये क्रमशः बिलग्रन्थि,
नादोर्ध्वत, सुषुम्ना, बिन्दु एवं शक्ति के स्वामी है । अनाश्रित, ब्रह्मा, अनाथ विष्णु,
अनन्त रुद्र, व्योम भट्टारक ईश्वर, व्यापी-सदाशिव रूप है ५ ॥ २४-२७ ॥
'नाद'—'शारदातिलक' में कहा गया है कि 'पर बिन्दु' जो कि पराशक्ति से
समन्वित है अपने को तीन भागों में विभाजित करता है जो निम्न है—(१) बिन्दु
(२) नाद (३) बीज । 'बिन्दु' शिवरूप 'बीज' शक्तिरूप एवं 'नाद' शिवशक्तिरूप
है—शिव-शक्ति दोनों की प्रकृति से युक्त है—शिवशक्ति का पारस्परिक सम्बंध या
दोनों का 'मिथःसमवायः' है । 'नाद'—शिव एवं शक्ति के पारस्परिक सम्बंध का
१-५. तन्त्रालोक