वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १६९
इस श्लोक का आशय यह घोषित करना है कि—ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी
एवं रुद्र-रुद्राणी पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के प्रत्येक वर्ण के साक्षात स्वरूप हैं।
सारांश—पञ्चदशाक्षरीमन्त्र के वर्ण = ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी, रुद्र-रुद्राणी।
समस्त वर्णों का मूल केन्द्र 'परावाक्' है और परावाक् भगवती का स्वरूप है—
आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदासा परमा कला।
अम्बिका रूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता॥ ३६॥१
अर्थात् विमर्श शक्तिरूपा 'परमाकला' जब अपने पर शिवरूप आत्मा का
(पश्यन्ती आदि क्रम से वैखरीपर्यन्त) स्फुरण (विमर्शन) देखना चाहता है तो परमा
शान्तात्मिका होकर अम्बिका रूप को प्राप्त करके (प्रकाशांश मात्रा वाली अम्बिका
के साथ सामरस्यापन्न होकर) 'परावाक्' कहलाने लगती है। 'इच्छाशक्ति' ही
पश्यन्ती वाक् बन जाती है एवं 'ज्ञानशक्ति' ही 'मध्यमावाक्' बन जाती है—
(१) इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुषा स्थिता।२
(२) ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमावागुदीरिता।३
इसी वाक् से ही मन्त्र बनते हैं। वाक् देवी है तो मन्त्र एवं देवी में कोई
भेद नहीं है।
मन्त्रों का सङ्घटन शिवशक्ति समायॊग से होता ही है—
(१) शिवशक्तिसमायोगाज्जनितो मन्त्रराजकः।४
(२) तेषां समष्टिरूपेण पराशक्ति तु मातृकाम्।
(३) पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सदानघे।
तन्मयी मूलविद्या च तदद्य कथयामि ते॥
(४) शक्ति मूलाधार में वाणी बन गई है और मन्त्र वाणीमय हैं।
मूलाधारे तडिद्रूपे वाग्भवाकारतां गते।
अष्टात्रिंशत्कलायुक्त पञ्चादशद्वंशाविग्रहा॥५
विद्याकुण्डलिनीरूपा मण्डलत्रयविभेदिनी।६
(५) शिवशक्तिसमायोगाच्च मन्त्राणामुदयः परः।७
(६) समस्त मन्त्रों की योनि परमात्मा की ज्ञानशक्ति है।८
१-६. योगिनीहृदय ७. नेत्रतन्त्र
८. ज्ञानशक्ति परा सूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः।
सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रारणिवत्स्थिता॥
मन्त्रसृष्टिर्भवेद्देषा शिवस्य परमात्मनः।
अस्मादेव समुत्पन्ना मन्त्राश्चामोघ शक्तयः॥ (नेत्रतन्त्र)