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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 530 में से

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पृष्ठ 254

१५२ वरिवस्यारहस्ये
‘बिन्दु’ की चार शब्दात्मिका शक्तियाँ हैं । इन वृत्तियों के भेद से ही जीवों में
ज्ञान का भेद रहता है । इसका अतिक्रम करके ही साधक शिवत्व प्राप्त करता है ।
बिन्दु की शब्दात्मिका वृत्तियाँ निम्न हैं—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४)
वैखरी । कुछ लोग पश्यन्ती को ही ‘अक्षर बिन्दु’ कहते हैं । अधिकांशः तांत्रिक
आचार्य ‘परावाक्’ से ही इच्छा-ज्ञान-क्रिया के रूप में स्थित त्रिबिन्दु का उद्भव
मानते हैं । त्रिबिन्दु से ही ५ पञ्चाशत मातृकाओं का उद्भव होता है । इनमें स्वर
वर्णों में ‘बीज’ (शिवांश) स्थित है तो व्यञ्जनों में (योनि शक्त्यांश) स्थित हैं ।
सारा विश्व इसी वर्णमाला से आबद्ध है ।
सृष्टि के मूल में ‘बिन्दु’ अवस्थित है । परमशिव के स्वातंत्र्य के कारण
स्पन्दन जब इस बिन्दु का स्पर्श करता है तो यह बिन्दु रेखारूप में परिणत हो
जाता है । इन तीन रेखाओं के संयोग से जो त्रिकोण उत्पन्न होता है वही सृष्टि
का मूल योनिरूप है जो इस प्रकार है—
त्रिकोण का केन्द्र ‘बिन्दु’ है ∇
‘नाद’ का स्वरूप—शिव और शक्ति का प्रथम विकास ‘नाद’ के रूप में ही
माना गया है ।¹ सर आर्थर एवलॉन कहते हैं "From the union of Śiva and
Śakti arrises creative ideation This union and mutual relalion is
called"—‘नाद’ अर्थात् शिव एवं शक्ति के संयोग से जो सृष्टि की कल्पना की
गई है उसमें शिव-शक्ति का संयोग एवं उन दोनों का पारस्परिक सम्बंध ‘नाद’
कहलाता है । जब शिव और शक्ति स्थिर शक्ति से क्रियात्मक रूप में रूपान्तरित
होने लगते हैं तभी नाद का उदय होता है । उनमें विकास की चेतना जाग्रत होती
है इसीलिए नाद क्रियारूप माना जाता है । इसी नाद से विश्व का विकास होता
है । शिव-शक्ति में नादोद्भव तब होता है जब उसमें विकास की चेतना जागती है ।
तात्विक धरातल पर जिसे ‘सदाख्यतत्त्व’ कहते हैं मन्त्रक्षेम में उसे ही ‘नाद’ कहा
जाता है ।² जिस प्रकार शिव-शक्ति से ‘सदाख्यतत्त्व विकसित होता है उसी प्रकार
क्रियाशक्ति रूप पर नाद (ब्रह्म) से ‘नाद’ विकसित होता है । ‘प्रयोगसार’ में कहा
गया है कि—‘‘हे देवि ! अंतरात्मा नाद के रूप में प्रस्फुटित होती है वही वायु
(जीवों में प्राणवायु) से पैरित होकर अक्षरों का रूप धारण करती है ।’’
तन्त्र शास्त्र के मन्त्र पक्ष में ‘नाद’ एवं ‘बिन्दु’ अहं एवं इदं के प्रतीक के
रूप में प्रयुक्त हुए हैं ।³ कतिपय तन्त्रग्रन्थों में ‘नाद’ को विराट शक्ति के रूप में

१. तन्त्राज़ देयर फिलॉसफी एण्ड औकल्ट सीक्रेट्स (डी०एन० बोस) पृ० ११९
२. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११२, ११४)
३. आर्थर एवेलॉन ‘सर्पेण्ट पावर’ (पृ० ३४)