वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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बिन्दु के ऊपर स्थित है । इसके चतुर्दिक चार एवं मध्य में एक अर्थात् सब
मिलाकर पाँच कलाएँ स्थित हैं । अर्धचन्द्र में जो कि ललाट में स्थित है ज्ञेय
प्रधानभाव नहीं है । यह शून्य भी नहीं है । यह आकार में अर्धचन्द्र के समान एवं
प्रकाश में चन्द्रमा के समान है—
'तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्या तथा कृत्या ।' (वरि०र०)
यद्यपि बिन्दु ही वास्तविक अर्धमात्रा है किन्तु बिन्दु के पश्चात् प्रत्येक परवर्ती
मन्त्रावयव में उसके पूर्ववर्ती की अर्धमात्रा (अर्धांश) निहित है । जैसे बिन्दु में एक
मात्रा का अर्धांश है तो अर्धचन्द्र में बिन्दु का अर्धांश है, निरोधिका में अर्धचन्द्र
का अर्धांश है, नाद में निरोधिका का, नादान्त में नाद का, शक्ति में नादान्त का,
व्यापिनी में शक्ति का, समना में व्यापिनी का अर्धांश निहित है । 'अर्धचन्द्र' में
काल की स्थिति है किन्तु इसकी मात्रा ६४ लवों की है—'चन्द्रे तद्द्विगुणा लवाः ।'
जब सृष्टिकारक 'शिवामृत' मूर्धा में गिरता है तब वह अवस्था 'अर्धचन्द्र' कहलाती है—
'यदा शिवामृतं मूर्ध्नि पतति सृष्टिकारणम् ।
आप्यायस्तु भवेत्तेन सोऽर्धचन्द्र इति स्मृतः ॥'१
यह समस्त भूतों की सृष्टि एवं संहार का भी कारक है—“संहारः सर्वभूतानां
सृष्टिः कारणमेव च ॥”२
अर्धचन्द्र की कलायें निम्नांकित हैं—ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा
विमला शिवाः 'ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा विमला शिवा । अर्धचन्द्रकला
ह्येताः सर्वज्ञपद संस्थिताः ।। विद्यावरणसंबद्धा मन्त्रकोटि विभूषिताः । क्रिया
शक्तिस्वरूपास्तु संस्थिता विमला शुभः ॥'३
यहाँ नादात्मक शिव का सदाशिव सम्बन्धी, स्फुट इदन्ताभासात्मक
सृष्टिवीर्यरूपात्मक पीयूष का उन्मेष होता है ।
'अर्द्धचन्द्र' दीपक के समान प्रभास्वर है । इसका अवस्थान ललाट में ही
बिन्दु के किंचित् ऊर्ध्वदेश में है । इसका उच्चारणकाल मात्रा का चतुर्थभाग है ।
बिन्दु के ऊपर 'अर्धचन्द्र' दीप्ति एवं आकृति में अन्वर्थक (आकृति एवं कान्ति
दोनों ही दृष्टियों से अर्द्धचन्द्र के समान) है ।
“तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्या तथाकृत्या ।"४
'अर्द्धचन्द्र' की कलायें निम्नांकित हैं—
ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा विमला शिवा ।
अर्द्धचन्द्रकला ह्येताः सर्वज्ञ पदसंस्थिता ॥५
१-५. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११४-१३०)
१-३. नेत्रतन्त्र ४. वरिवस्यारहस्यम्
५. नेत्रतन्त्र