वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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स्वीकार करके उसे सृष्टि-विकास का केन्द्र माना गया है ।¹ कतिपय तन्त्रों के
अनुसार सच्चिदानन्द सगुण परमात्मा शिव से शक्ति का एवं शक्ति से नाद-बिन्दु
की उत्पत्ति हुई है । इसी बिन्दु से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है ।² अन्य
द्वैतवादी तांत्रिकों के मतानुसार 'शिव' एवं 'शक्ति' नामक दो तत्त्व हैं । शिव शक्ति
में प्रवेश करता है और बाद में बिन्दु का रूप धारण कर लेता है । बिन्दु का
प्रथम विकास 'नाद' के रूप में होता है और फिर सृष्टि का विकास होता है ।³
कुछ भेदवादी तांत्रिक शिव एवं शक्ति को समवाय सम्बन्ध से संयुक्त एक तत्त्व
तथा बिन्दु का दूसरा तत्त्व मानते हैं ।⁴ बौद्धतन्त्रों में 'बिन्दु' ज्ञान के प्रतीक एवं
हठयोगिक ज्योति के रूप में कल्पित किया गया है ।⁵ शैव तन्त्रों में 'नाद' 'बिन्दु'
को शिव-शक्ति के परिकल्पित स्वीकार किए गए हैं । बौद्ध तांत्रिकों ने इन्हें प्रज्ञा
एवं उपाय का वाचक भी माना है । तांत्रिक एवं हठयौगिक ग्रन्थों में (क) 'बिन्दु'
को—रसना, सूर्य, रवि, प्राण, शमन, काली, यमुना, रज, पुरुष, नाद एवं व्यञ्जन
(ख) 'नाद' को—ललना, चन्द्रा, शशि, अपान, घमन, अली, गङ्गा, शुक्रा, तमस्
अभाव, प्रकृति, ग्राहक एवं स्वर के रूप में गृहीत किया गया है ।⁶
'कौलज्ञाननिर्णय' में एक स्थल पर बिन्दु को महालिङ्ग की शक्ति एवं दूसरे
स्थल पर उसे शिव की सृजन-शक्ति कहा गया है । इसमें बिन्दु से ही नादोत्पत्ति
बताई गई है । योग उपनिषदों में 'बिन्दु' मन⁷ वायु⁸ बुद्धि⁹ एवं महेश्वर¹⁰ के अर्थ
में स्वीकार किया गया है ।
'शारदातिलक' के अनुसार—शब्दब्रह्मरूपिणी कुण्डलिनी से शक्ति, शक्ति से
ध्वनि, ध्वनि से नाद, नाद से निरोधिका, निरोधिका से अर्द्धेन्दु, अर्द्धेन्दु से बिन्दु
की उत्पत्ति होती है । 'शक्ति' = शुद्ध सत्त्व में प्रविष्ट चित्, रजोनुबिद्ध एवं सत्व
प्रविष्ट चित् शक्ति = 'ध्वनि' तमोनुविद्ध चित् शक्ति = 'नाद' । तमसप्राचुर्याचित्
शक्ति = निरोधिका । सत्वप्राचार्या चित् शक्ति = 'अर्द्धेन्दु' । सत्व + तमस से
विशिष्ट होने पर वही चित् शक्ति 'बिन्दु' कहलाती है । बिन्दु का स्थान सहस्रार
है । बिन्दु ही शब्दब्रह्म है । मन्त्र में नाद एवं बिन्दु दोनों प्रतिष्ठित हैं । इनमें
'नाद' नीचे एवं 'बिन्दु' ऊपर स्थित होता है । 'नाद' रूपा कुण्डलिनी मूलाधार में
(नीचे) एवं 'बिन्दु' रूपी शब्द ब्रह्म (ऊपर) सहस्रार में रहते हैं । ये ही दोनों शक्ति
एवं शिव हैं और इनका सम्मिलत कराना ही तान्त्रिकों का लक्ष्य है ।
नाद के कई स्वरूप हैं यथा—
(क) 'महानाद' या नादान्त = शब्दब्रह्म का प्रथम क्रियात्मक विकास
१-२. तन्त्राज़ देयर फिलॉसफी एण्ड औकल्ट सीक्रेट्स (पृ० १०७)
३. कलेक्टेड वर्क्स आफ आर० जी० भण्डारकर, पृ० २१९
४. गोपीनाथ कविराज—'तान्त्रिक दृष्टि' ५-६. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
७. योगकुण्डल्योपनिषद ८. योगशिखोपनिषद
९-१०. ध्यानबिन्दूपनिषद