वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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अथावशिष्टानां बिन्दूनां बिन्द्वादीनां स्वरूपमाह—
हृल्लेखा कामकला सपरार्धकलाख्य कुण्डलिन्युत्थः ।
नादाश्चक्रत्रितय त्रितयात्मनो विभावनीयाः स्युः ॥ ३६ ॥
प्रकाश
अत्र प्रथमकूटे या हृल्लेखा, तदन्तर्गता या कामकला, तस्यां गुरुमुखैकवेद्या या
सपरार्धकला, सा वह्निकुण्डलिनीत्युच्यते । सैव द्वितीयकूटे सूर्यकुण्डलिनीति, तृतीय-
कूटे सोमकुण्डलिनीति च कथ्यते । बिन्द्वादिसमष्टिरूपो नादस्तु तत एवोत्पन्नो
दीपशिखाप्रवर्तिकज्जलेखावत् । एवं चानाहतमारभ्योत्थितो नादस्त्रैलोक्यमोहन-
सर्वाशापरिपूरकसर्वसंक्षोभणचक्रत्रयस्य त्रिविधसृष्टिरूपस्यापरं रूपम्; भ्रूमध्यमारभ्यो-
त्थितो नादः सर्वसौभाग्यदायकसर्वार्थसाधकसर्वरक्षाकरचक्रत्रयस्य त्रिविधस्थिति-
रूपस्यापरं रूपम्; बिन्दुस्थानमारभ्योत्थितो नादः सर्वरोगहरसर्वसिद्धिप्रदसर्वानन्दमय-
चक्रत्रयस्य संहृतित्रयरूपस्यापरं रूपमिति विभावनीयाः ॥ ३६ ॥
हृल्लेखाओं में स्थित कामकला (ई) की सपरार्ध कला नाम वाली (तीन)
कुण्डलिनियों से आविर्भूत नादों को तीनों चक्रों के त्रिक के रूप में कल्पित किया
जाना चाहिए ॥ ३६ ॥
सरोजिनी
कुण्डलिनी के तीन रूप हैं—'वह्नि', 'सूर्य' एवं 'सोम' कु० ।। हृल्लेखा में
स्थित कामकला (ई) हीं 'सपरार्धकला' हैं । इन कुण्डलिनियों से उत्पन्न ९ नादों
को तीनों चक्रों के त्रिक समझना चाहिए ।
(क) 'वह्नि कुण्डलिनी'—प्रथम कूट में—जो 'हृल्लेखा' है उसके अन्तर्गत जो
'कामकला' है उसके अन्तर्गत गुरुमुखैकवेद्या जो 'सपरार्धकला' है वही
'वह्निकुण्डलिनी' है ।¹
(ख) 'सूर्य कुण्डलिनी'—प्रथम कूट में स्थित वह्निकुण्डलिनी ही द्वितीय कूट
में 'सूर्यकुण्डलिनी' कहलाती है ।²
(ग) 'सोम कुण्डलिनी'—प्रथम कूट की वह्निकुण्डलिनी, द्वितीय कुण्डलिनी
की सूर्य कुण्डलिनी ही तृतीय कूट में 'सोमकुण्डलिनी' कहलाती है । 'नाद'
बिन्द्वादिसमष्टिरूप है ('बिन्द्वादि समष्टिरूपो नादः') उसी से दीपशिखाग्रवर्ती कज्जल-
लेखा की भाँति उत्पन्न होता है ।³
इसी प्रकार अनाहत चक्र से—
(क) समारब्ध होकर उठने वाला 'नाद'—त्रैलोक्यमोहन-सर्वाशा परिपूरक-
सर्वसंक्षोभण चक्र की त्रिविधात्मक सृष्टि का अपर रूप है ।
१-३. भास्कर—प्रकाश