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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 530 में से

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पृष्ठ 256

१५४ वरिवस्यारहस्ये
(ख) 'नाद' = नादान्त की पूर्वावस्था । जो विश्व को नादान्त से भरे हुए हैं ।
'निरोधिनी'—नाद की वह अवस्था निरोधिनी है जिसमें बिन्दु का विकसित
करने की क्षमता निहित हो ।१ नाद की अत्यन्त सूक्ष्म अवस्थायें हैं उनमें 'निष्कल
उन्मनी' अन्यतम हैं । 'उन्मनी' निराकार निरुच्चार, निरूप एवं विशेषणशून्य वह
अव्यक्तवस्था है जो अवाङ्मनसगोचरा है । यह अनुत्पन्न निष्पन्द वाक् है । यह
कारणरूपा शक्ति की अवस्था है । इस अवस्था में काल, कला एवं देवता आदि
का भान नहीं होता ॥ “उन्मनी is Nirākār and Niruchchār (निराकार, निरुच्चार)
roundless and without ulternate defind by any adjective, being for
beyound mind and speech and universe"२ यह निर्वाणपद है एवं निर्विकल्प
निरञ्जन शिवशक्ति है ।३
बिन्दु से नादाविर्भाव—कतिपय तांत्रिकों का कथन है कि बिन्दु से भी नादों
का उदय होता है जो निम्न है—(१) 'सूक्ष्मनाद'—बिन्दु का प्रथम स्तर, अचिन्त्य
तत्त्व एवं अभिधेय बुद्धि का कारण है । (२) 'अक्षरनाद'—यह परामर्श ज्ञान
समन्वित एवं सूक्ष्मनाद का कार्य है । (३) 'वर्णनाद'—यह आकाश एवं वायु से
उत्पन्न होता है । कुण्डलिनी को भी 'नाद' कहा गया है ।४
तांत्रिकों के अनुसार 'नाद' से बिन्दु का उद्भव होता है । 'नाद' एवं 'बिन्दु'
ये दोनों शक्ति के रूप हैं । शक्ति के इन दोनों रूपों में क्रिया शक्ति स्थित है ।५
'अहं' द्रष्टा है और 'इदम्' दृश्य है । द्रष्टा की दृश्यरूपी शून्य पर दृष्टि
पड़ने पर उस शून्य से एक अव्यक्त नाद ध्वनि झंकृत होती है जिसे 'आदिनाद' या
'परनाद' कहते हैं । नाद की स्फूर्ति के साथ ही ज्योति का भी विकास होता है ।
नाद एवं ज्योति दोनों एक ही महासत्य की दो अवस्थायें हैं । शक्ति की क्रियावस्था
ही नाद है और निष्क्रिय अवस्था 'कला' है । 'शक्ति' स्वरूपनिष्ठ क्रिया द्वारा
कार्योंन्मुख होकर 'नाद' के रूप में आत्मप्रकाश करती है । 'नाद' घनीभूत होकर
साम्यावस्था में 'परमविन्दु' के रूप में प्रकाशित होता है । पर बिन्दु जब महानाद
में से अपर बिन्दु में अवतीर्ण होता है तब बिन्दु जब बीज का स्पर्श करता है तब
सारे बीज बिन्दुयुक्त होकर गुञ्जन करते रहते हैं—यही 'नाद' है । मानव-हृदय में
अस्फुटभाव से जो चिन्ताएँ क्रीड़ा करती हैं वह नाद की ही क्रीड़ा है । किसी
वृत्तिरूप में अन्तःकरण का जो परिणाम होता है वह 'नाद' से व्याप्त होता है ।
महानाद पर 'प्रणव' है । शक्ति की बहिर्मुख अवस्था ही नाद एवं ज्योति है ।
'बिन्दु' ही क्षुब्ध होकर नादरूप में परिणत होता है । 'नाद' वायु के सङ्घर्ष के
कारण वर्णमाला रूप में प्रकाशित होता है । 'पादुकापञ्चक' में कहा गया है कि—
'पराशक्ति' ही बिन्दु है और उसका रूपान्तरण है—बिन्दु, नाद एवं 'बीज'
'बिन्दु'—रक्तवर्ण है और सूर्य है । 'नाद'—श्वेतवर्ण है और चन्द्रमा है । ये दोनों
ही मिलकर आनन्दमय कोश का निर्माण करते हैं 'कारणबिन्दु' जब प्रस्फुटित होता
१-५. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११४-१३०)