वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
१७२ वरिवस्यारहस्ये
कुण्डलिनीत्रय
प्रथमकूट
हृल्लेखा
१. वह्नि कुण्डलिनी कामकला
या सापराधर्कला सा वह्नि सापरार्धकला
कुण्डलिनीत्युच्यते—(प्रकाश) (वह्निकुण्डलिनी)
त्रैलोक्यमोहन आदि चक्र के आधार में स्थित वह्नि मण्डल में स्थित वाग्भव
बीज शिखरवर्ती कामकला के अन्तर्गत स्थित हार्धकला ही वह्नि कुण्डलिनी हैं ।
द्वितीयकूट
हृल्लेखा
२. सूर्य कुण्डलिनी कामकला
सैव द्वितीयकूटे सूर्य हार्धकला
कुण्डलिनीति—(प्रकाश) (सूर्यकुण्डलिनी)
द्वितीय कूट में स्थित हृल्लेखा के अन्तर्गत स्थित कामकला में स्थित हार्ध-
कला ही सूर्य कुण्डलिनी है । सर्वसौभाग्यदायक आदि चक्रत्रय के हृदय में स्थित
सूर्यमण्डल में स्थित कामराजशिखरवर्ती कामकलान्तर्गत हार्धकला सूर्यकुण्डलिनी है ।
तृतीयकूट
हृल्लेखा
३. सोम कुण्डलिनी कामकला
स्यापरंandरूपम्? Let's look: सृष्टिरूपस्यापरंरूपम् ।- wait, is there a space? Look at line 31:(२) चक्रत्रयस्य त्रिविध स्थितिरूपस्यापरं रूपम् । In line 31, there is a clear space:स्थितिरूपस्यापरं रूपम् । In line 30, it is tighter:सृष्टिरूपस्यापरंरूपम् ।`
-
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त्रिदेवों के त्रिकर्म
सृष्टि (ब्रह्मा) स्थिति (विष्णु) संहति (महेश)
सृष्टि सृष्टि सृष्टि स्थिति स्थिति स्थित संहति संहति संहति
सृष्टि स्थिति संहति सृष्टि स्थिति संहति सृष्टि स्थिति संहतिWait, what about the tree connector lines? Are they considered text lines?
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१७४ वरिवस्यारहस्ये
(३) चक्रमयस्य त्रिविध संहतित्रयरूपस्यापरं रूपमिति विभावनीयाः (क)
'अनाहतमारभ्योत्थितो नाद' (ख) 'भूमध्यमारभ्योत्थितो नादः (ग) 'बिन्दुस्थान-
मारभ्योत्थितो नादः ॥'१
कुण्डलिनी का स्वरूप—कुण्डलिनी 'परमाकला' है—'सर्पाकारा कुण्डलिनी
या देवी परमाकला ।'२ यह समस्त गुणों से युक्त एवं सूर्य, चन्द्र तथा अग्निरूपिणी
है—'गुण युक्ता कुण्डलिनी चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी ।'३ यह एक अचिन्त्य शक्ति है और
भुजगाकाररूपिणी है—'मूलाधारे तुया शक्तिर्भुजगाकाररूपिणी ।' जीवात्मा इसी
कुण्डलिनी के मध्य निवास किया करता है (जीवात्मा परमेशानि तन्मध्ये वर्तते
सदा ।)४ इस शक्ति का निवास पाताल में है और उसके प्रियतम शिव का निवास
ब्रह्माण्ड में है—'पाताले वसते शक्ति ब्रह्माण्डे वसते शिवः'५ यह वासुकी या
महामाया है । भुजगाकाररूपिणी । सार्धत्रिवलयाकारा पाताल तल वासिनी ॥६
कुण्डलिनी वर्णमाला के ५० वर्णों के स्वरूप वाली है—"मूलचक्राच्छिरोऽन्ता च
सुषुम्ना परिकीर्तिता । तद्गर्भस्था च या शक्तिः सा देवी कुण्डरूपिका । सा सदा
कुण्डलिनी देवी पञ्चाशद्वर्णभूषिता ॥'७ यह कामिनी कुण्डलिनी महापत्रात्मक सहस्रार
के बीजकोष या शिवालय में जाकर तथा शिव का साक्षात्कार करके तथा मालाकार
रूप में स्थित होकर शिवलिङ्ग को अपने इसी अकारादिक्षकारान्त वर्णमाला रूप
अक्षमाला से परिवेष्टित किये रहती है—
'सहस्रारं तु सम्प्राप्य शिवं दृष्ट्वा तु कामिनी ।
मालाकारेण तल्लिङ्गं संवेष्ट्य कुण्डली सदा ॥'८
यह अन्तर्माला ही महामाला है जो ५० वर्णों से निर्मित है ।९ 'अन्तर्माला
महामाला पञ्चाशद्वर्णरूपिणी' और स्वयंभूलिङ्ग पर सुशोभित है । यही कुण्डलिनी
सहस्रार महापद्म में 'महाकुण्डलिनी' कही जाती है—'सहस्रारे महापद्मे विश्वरूप परः
शिवः । महाकुण्डलिनी तत्र स्थिता नित्या सुरेश्वरि ॥'१० यह विद्युल्लता के आकार
की, सोते हुए सर्प की आकृति वाली, सार्द्ध त्रिवलयों से अलंकृत, भगवान शिव
को आवेष्टित करके स्थित 'परमेश्वरी' कुण्डली 'परदेवता' है—'तत्र विद्युल्लताकारा
कुण्डली पर देवता । प्रसुप्तभुजगाकारा सार्द्धत्रिवलयान्विता ॥'११ सहस्रार में शिव
शून्यरूप एवं करोड़ों विद्युत के समान देदीप्यमान कुण्डली इन्दुरूप है और यहाँ
'परमकुण्डली' कहलाती है—'शून्यरूपं शिवं साक्षादिन्दुं परमकुण्डलीम् ॥'१२ यह
नादरूपा, योनिरूपा सनातनी शक्ति है—'नादरूपेण सादेवी योनिरूपा सनातनी ।'१३
परदेवता कुण्डली हुङ्कार वर्ण से उत्पन्न होती है—'हुंकार बर्ण संभूता कुण्डली
परदेवता ।'१४ 'परदेवता', 'कुण्डली', 'महादेवी' रूपा यह 'रूपवती' देवी अपने
१. आचार्य भास्करराय २-४. मातृकाभेद तन्त्र
५. ज्ञानसंकलिनी तन्त्र ६-१०. तोडल तन्त्र
११-१२. शाक्तनन्दतरंगिणी, कुब्जिकातन्त्र १३. यामल
१४. गंधर्वमालिका
प्रथमोऽंशः १७५
मुखपद्म की सुगंधि से शिव को आह्लादित कर देती है और शिव के ऊपर लेटती
हुई शिव के मुखपद्म का चुम्बन लेती है और क्षणमात्र के लिए सदाशिव के साथ
रमण करती है जिससे कि उसी क्षण लाखरस के समान रङ्ग वाला अमृतक्षरित
होता है—इसी अमृत से परदेवता एवं षट्चक्रस्थित देवों की पूजा की जानी चाहिए
('उन्हें सन्तुप्त करना चाहिए') 'सङ्केतपद्धति' में पिण्ड को ही कुण्डलिनी शक्ति
कहा गया है, 'पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः ।'१' स्वयंभूलिङ्ग के साथ रमण करनेवाली
इस कुण्डलिनी को मूलाधार से सहस्रार में लाना चाहिए । और वहाँ से शंभु के
साथ एकीकृत (अभिन्न) रूप में देखकर तथा पीनोन्नतपयोधरा, षोडशवर्षीया,
नवयौवनसम्पन्ना, सर्वाभरणभूषिता, पूर्णचन्द्रनिभा, नानारत्नयुता, नूपुरशोभिता,
कन्दर्पकोटिलावण्या, रक्तकङ्कणमण्डिता, किंकिणीशोभिता, मधुरहासिनी कामिनी के
रूप में परिकल्पित करना चाहिए ।
अवरोहण क्रम—सहस्रार में स्थित देवी कुण्डलिनी का इस रूप में ध्यान
करके फिर १०८ बार मातृका-माला से मन्त्र का जप करना चाहिए ।
परमात्मा और कुण्डली—नाथ योगियों का कथन है कि 'परमशिव' में
सिसृक्षा उत्पन्न होते ही उसे 'सगुण शिव' (वेदान्तियों का अपरंब्रह्म) कहा जाने
लगता है क्योंकि वह इच्छायुक्त होता है । यह सिसृक्षा है । शक्ति है । परमशिव
से एक साथ ही दो तत्त्व उत्पन्न होते हैं—१. शिव २. शक्ति । यह शक्ति पाँच
अवस्थाएँ पार करती हैं—
(१) 'निजा'—परमशिव की अवस्था मात्र धर्म से युक्त, स्फुरित होने की
पूर्ववर्तिनी और स्फुरणोन्मुखी यह अवस्था ही 'निजा' है । शक्ति की इस निजा
अवस्था में जो शिव रहते हैं वे उनकी अवस्था 'अपरंपदम' है । वे अव्यक्त रूप में
रहते हुए भी स्फुरणोन्मुखी शरीर से युक्त होकर रहते हैं ।
(२) 'परा'—यह शक्ति की स्फुरणोन्मुखी अवस्था है । इस अवस्था के शिव
को 'परम' कहते हैं ।
(३) 'अपरा'—यह शक्ति स्पन्दावस्था है । शक्ति की इस अवस्था के साथ
रहने वाले शिव 'शून्य' कहलाते हैं ।
(४) 'सूक्ष्मा'—इस अवस्था में शक्ति सूक्ष्म अहन्ता भाव से युक्त होती है ।
इसके साथ रहने वाला शिव निरञ्जन कहा जाता है ।
(५) 'कुण्डली'—शक्ति की यह अवस्था वह है जिसमें वह पृथकता का भाव
लेकर प्रस्तुत होती है । इस अवस्था से उत्पन्न शिव 'परमात्मा' कहलाते हैं—
निजा पराऽपरा सूक्ष्मा कुण्डली तासु पञ्चधा ।
शक्ति चक्रक्रमेणैव जातः पिण्डः परः शिवे ॥'२
१. संकेत पद्धति
२. सिद्धसिद्धान्त संग्रह (१।१३)
१७६ वरिवस्यारहस्ये
इस प्रकार शिव पाँच अवस्थाओं को पार करते हुए 'परमात्मा' के रूप में
एवं शक्ति 'कुण्डली' के रूप में आविर्भूत होती है । यही 'कुण्डली' समस्त विश्व
में व्याप्त है किन्तु पिण्ड में रहने पर 'कुण्डली' एवं समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त
रहने पर 'महाकुण्डलिनी' कही जाती है । इसी 'कुण्डली' की सहायता से शिव
सृष्टि-पालन-संहार कर पाने में समर्थ हो पाते हैं । इसका स्वरूप निम्नानुसार है—
'स्वयं' (पर शिव)—निजा + अपर शिव; परा + परमशिव; अपरा + शून्य
शिव; सूक्ष्मा + निरञ्जन शिव एवं कुण्डली + परमात्मा रूप शिव ।।
'कुण्डली' शक्ति चिच्छीला, चिद्रूपिणी, अनन्तरूपा, अनन्त एवं शक्तिस्वरूपा
है । जगत् इसी का परिणाम है अर्थात् इसका परिणमन ही जगत् है । इसके
उपरान्त आविर्भूत होते हैं—अहं प्रधान सदाशिव, इदं प्रधान ईश्वर एवं उभयप्रधान
शुद्धविद्या ।
स्फोट—योगी सुचिरनिद्रिता कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने का प्रयास
करता है । अधोमुखी कुण्डलिनी जैसे ऊर्ध्वमुखी होती हे वैसे ही 'स्फोट' होता है ।
यह स्फोट ही 'नाद' है । नाद से प्रकाश होता है और इस प्रकाश का व्यक्त रूप
ही 'महाबिन्दु' कहा जाता है । यह 'बिन्दु' तीन प्रकार का होता है । १. इच्छा,
२. ज्ञान, ३. क्रिया । इसे ही योगी सूर्य चन्द्र-अग्निद्य ब्रह्मा-विष्णु-महेश कहते हैं ।
यह 'नाद' एवं 'बिन्दु' ब्रह्माण्ड में व्याप्त अनाहत नाद का व्यष्टि में व्यक्त
रूप है । अनाहत भाव से समस्त विश्व में व्याप्त नाद व्यक्ति में प्रकाशित होने पर
'नाद' एवं 'बिन्दु' कहलाते हैं ।
प्रस्तुत श्लोक ३६ में जिस कुण्डलिनी का एवं 'प्रकाश' में—१. 'वह्नि
कुण्डलिनी' २. 'सूर्य कुण्डलिनी' एवं ३. चन्द्र कुण्डलिनी' का वर्णन किया है
उसका स्वरूप क्या है?
भास्करराय कहते हैं—
(१) 'वह्निकुण्डलिनी' = 'अत्र प्रथमकूटे या हृल्लेखा तदन्तर्गता या
कामकला' तस्यां गुरुमुखैकवेद्या या सपरार्धकला सा 'वह्नि कुण्डलिनी' इत्युच्यते ।'
(२) 'सूर्यकुण्डलिनी'—'सैव द्वितीय कूटे सूर्यकुण्डलिनी इति' ।
(३) 'सोमकुण्डलिनी'—तृतीय कूटे सोमकुण्डलिनी इति कथ्यते ।
'बिन्दादि समष्टिरूपो नादस्तु तत एवोत्पन्न दीपशिखाग्रवर्तिकज्जल-
लेखावत् ।'
'नाद' कुण्डलिनी रूप दीपशिखा की वर्तिकाग्रवर्ती कज्जललेखावत स्थित
है ।
मूलाधार से भी नीचे वाग्भवाकार त्रिकोण में 'समष्टिकुण्डलिनी' का वास
है ।
प्रथमोऽंशः १७७
कुण्डलिनी
(मूलाधार के नीचे) (मूलाधार में) (हृदय में) (भ्रूमध्य में)
वाग्भवाकार त्रिकोण में 'अग्निकुण्डलिनी' 'सूर्यकुण्डलिनी' 'सोमकुण्डलिनी'
'समष्टिकुण्डलिनी' (उकार) (अकार) (मकार)
(समष्टिप्रणव)
'कुण्डलिनी' ही उन्मना है ।
नित्यानन्द कृत श० महिम्नस्तोत्र की व्याख्या में 'कुण्डलिनी' के ४ रूप
बताए गए हैं ।
(१) भास्कराचार्य : कूटत्रय में ३ कुण्डलिनियाँ हैं—
(क) (प्रथम कूट की हल्लेखा में स्थित कामकला में स्थित सपरार्ध कला)
'वह्निकुण्डलिनी' (ख) द्वितीय कूट में 'सूर्यकुण्डलिनी' (ग) 'तृतीय कूट' में
'सोमकुण्डलिनी'
(२) नित्यानन्दकृत महिम्नस्तोत्र की व्याख्या—इसके अनुसार कुण्डलिनी के ४
रूप हैं—
(१) मूलाधार में—'अग्निकुण्डलिनी'
(२) हृदय में—'सूर्यकुण्डलिनी'
(३) भ्रूमध्य में—'सोमकुण्डलिनी'
(४) वाग्भवाकार त्रिकोण में—(जो कि मूलाधार चक्र के नीचे स्थित है)—
'समष्टि कुण्डलिनी'
(चतुर्विधतनु अग्निसूर्य सोम समष्टिरूपेण, अग्निकुण्डलिनी मूलाधारे, सूर्य-
कुण्डलिनी हृदये, सोमकुण्डलिनी भ्रूमध्ये, समष्टिकुण्डलिनी मूलाधाराधोगत वाग्भवा-
कार त्रिकोणे)१
कुण्डलिनी के अन्य स्वरूपों का भी दिग्दर्शन कराया गया है यथा (१)
'शक्ति कुण्डलिनी'—जब 'अमाकला' विसर्गहीन हो जाती है तब इसी भुजङ्गाकार,
स्वात्मविश्रान्त, प्रसुप्त परासंवित को 'शक्तिकुण्डलिनी' कहते हैं । 'अ' नाम्नी
पराशक्ति (या 'सप्तदशीकला' अर्थात् 'अमा') तिरोधान शून्य होने के कारण
नित्योदित है और 'अमृतकला' कहलाती है और अन्तःकरण आदि षोडश कलाओं
की उद्भाविका है—वही 'अमाकला' विसर्ग शून्य होने परबहिरुन्मुख न रहने पर—
'शक्तिकुण्डलिनी' की आख्या धारण करती है ।
१. नित्यानन्द कृत श० महिम्नस्तोत्र, व्याख्या, पृ० ६
१२ वरि.
१७८ वरिवस्यारहस्ये
(२) 'प्राण कुण्डलिनी' (३) 'पराकुण्डलिनी'—
विसर्ग के दो प्रकार हैं—(१) पर विसर्ग (आनन्द) (२) अपर विसर्ग (हकार
या प्राण) ! विसर्ग के दोनों छोरों पर दो कुण्डलिनियों का अवस्थान है—(१)
'प्राण कुण्डलिनी' (२) 'परा कुण्डलिनी' । प्रथम कोटि में अवस्थित 'कुण्डलिनी'
ही प्राण कुण्डलिनी' एवं द्वितीय कोटि में स्थित कुण्डलिनी परा कुण्डलिनी
कहलाती है । विसर्ग के दूसरे प्रान्त भूमि में—अनन्त कोटि में—जो कुण्डलिनी
अवस्थित है वह स्वात्मविश्रान्त, अन्तरोन्मुखी परासंवित् ही 'परा कुण्डलिनी' है ।
कुण्डलिनी
ॐ — 'कुलशक्ति' (सर्पिणी)
'अकुल' (नकुल)
'प्रकाश' (अकुल)
(परमशिव)
शब्दब्रह्ममयी कुण्डलिनी
'महाकुण्डलिनी'
('विमर्श' शक्ति)
↓
कुण्डलिनी | शक्ति | ('महाकुण्डलिनी रूपे सच्चिदानन्द
↓ | रूपिणी'—दे०भा०)
सूर्य कुण्डलिनी — समष्टि कुण्डलिनी | ध्वनि | ↓
↓ | (सत्व प्रविष्ट चित् शक्ति वाच्या
अग्नि कुण्डलिनी — सोम कुण्डलिनी | नाद | परमाकाशावस्था)
↓ | ↓
निरोधिका | (सत्वप्रविष्ट रजोनुविद्ध)
↓ | ↓
अर्द्धेन्दु | (तमोनुविद्ध)
↓ | ↓
बिन्दु | (ताम-प्राचुर्या)
↓ | ↓
कुण्डलिनी | परा | (सत्व प्राचुर्या)
↓ | ↓
समष्टि प्रणव — 'अ' — 'उ' — 'म' | पश्यन्ती | (उभय संयोग)
↓
मध्यमा
↓
वैखरी¹
१. शारदातिलक (त० प्र० पटल)
प्रथमोऽंशः १७९
कुण्डलिनी
┌───────────────────────────┴───────────────────────────┐
अधः कुण्डलिनी (मूलाधार ऊर्ध्व कुण्डलिनी (मूलाधार से
के अधोप्रदेश में मेरुदण्ड के उन्मना तक की यात्रा पार
सबसे निचले भाग में स्थित करके परमशिव के
त्रिकोणाकार अग्निचक्र साथ एकीभूत)
(कुलकुण्ड) में स्थित है ।
यही शक्ति की विकास भूमि
है—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
कुण्डलिनी
┌──────────────┬──────────────┬──────────────┐
अधः मध्य ऊर्ध्व परा
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
│ │ │ │
अग्निखण्ड सूर्यखण्ड सोमखण्ड पराखण्ड
वा०कूट का०कूट श०कूट तूर्यकूट
कुण्डलिनी
┌──────────────┼──────────────┐
कुमारी योषित पतिव्रता
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
ध्यातव्य बिन्दु— 'बिन्दु' के बाद 'परा' के उद्भव का क्रमसङ्गत नहीं है क्योंकि
कुण्डलिनी एवं परा को असकृत (एक) कहा गया है । “सैषा परावाग्लक्षणा
कुण्डलिनी । तस्यास्तिस्रोऽवस्थाः पश्यन्त्याद्याः ता एव इह पर परापर अपर
कुण्डलिन्य उक्ताः ।'”१
कुण्डलिनी के मध्य में ज्योतिमात्र, सूक्ष्म, परा की अवस्थिति है । राघव भट्ट
ने इसे स्वीकार किया है— 'सूक्ष्मा कुण्डलिनीमध्ये ज्योतिर्मात्रात्म रूपिणी । अश्रोत्र-
विषया तस्यादुद्गच्छत्यूर्ध्वगामिनी ॥'२ यहाँ पर यह 'सूक्ष्मा' परा का ही वाचक है ।
सार्द्धत्रिवलयाकार 'कुण्डलिनी' एवं सार्द्धत्रिमात्रिक प्रणव एक ही है— 'उध्युष्ट-
वलयाकार प्रणवत्वमुपागता ।'३
─────────────────────────────────────────────────────────────
१. प्रयोगक्रमदीपिका (पृ० ४०६) २-३. 'पदार्थदर्श:' (पृ० ६०)
१८० वरिवस्यारहस्ये
शक्ति की दो भूमियाँ
विकास भूमि सङ्कोचभूमि (ऊर्ध्व कुण्डलिनी)
(अधः कुण्डलिनी) —(प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
(विकास) (सङ्कोच)
अथावस्थापञ्चकं शून्यषट्कं विषुवत्सप्तकं च जपकाले विभागव्यमाह—
इन्द्रियदशकेत्यादिना, एवमवस्थेत्यन्तेन श्लोकषोडशकेन ।
इन्द्रियदशकव्यवहृतिरूपा या जागरावस्था ।
तत्र प्रकाशरूपो हेतुर्भाव्यस्तृतीये रेफे ॥ ३७ ॥
(जागृतावस्था और रेफस्थ प्रकाश के अंतर्संबन्ध का प्रतिपादन)
जिसमें दस इन्द्रियाँ व्यवहार (जागतिक क्रियाओं का निष्पादन) करती हैं
उसके स्वरूपवाली जो जागृतावस्था है उसमें, तृतीयकूट के रेकस्थान में होने वाले,
उस प्रकाश की कल्पना करनी चाहिए जो कि जागृतावस्था का कारण है ॥ ३७ ॥
- प्रकाश *
कर्मेन्द्रियाणि पञ्च वाक्पाणिपादपायूपस्थानि; ज्ञानेन्द्रियाण्यपि पञ्च
प्रथमोऽशः १८१
(३) आन्तरवृत्तेर्लवतो, लीनप्रायस्य जीवस्य । वेदनमेव सुषुप्तिः ॥ ३९ ॥
(४) तुर्यावस्थाचिदभि व्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तम् ॥ ३९ ॥
(५) आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् । तुरीयातीतावस्था ॥ ४१ ॥
शब्द की भी (१) जागर (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति (४) तुरीय—चार अवस्थायें
बतायी गई हैं । 'तुरीय' शब्द ही 'शब्दब्रह्म' है । इसका अतिक्रम करके अतितुर्य
या पर ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है । यह परब्रह्म ही 'परमशिव' है । आचार्य शङ्कर
ने 'प्रपञ्चसार तन्त्र' के टीकाकार पद्मपादाचार्य ने चेतन तत्त्व को इन पाँच स्तरों पर
स्थित देखा है—(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म, (३) कारण, (४) सामान्य, (५) साक्षी ।१
ग्रन्थान्तर में यह भी कहा गया है कि शब्द का सघोष एवं अघोष बाह्य व्यवहार
उसकी 'जागरावस्था' है । समष्टिरूप से हम इसे 'विराटशब्द' कह सकते हैं । पर
श्रूयमाण शब्द सघोष शब्द या वाचिक शब्द हैं । अघोष (उपांशु = स्वयं मात्र को
श्रुत) अघोष है । जाग्रत दशा में सर्वत्र सघोष एवं अघोषात्मक वाग्व्यवहार रूप
शब्दानुविद्धता ही प्रधानतः दृष्टिगोचर होती है । यह स्थूल शब्द वैखरी वाक् कहा
जाता है । कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों का व्यवहार ही जागृतावस्था है ।२
अन्तःकरणचतुष्कव्यवहारः स्वाप्निकावस्था ।
सा तार्तीयैकाराद्बध्यापि गलस्थले चिन्त्या ॥ ३८ ॥
(स्वप्नावस्था एवं मन्त्राक्षर 'ई' में स्थित प्रकाश के अंतर्संबंध का विवेचन)
अन्तःकरणचतुष्टय का व्यवहारस्वरूप (जागतिक क्रियानिष्पादनरूप) जो
स्वप्नावस्था है (उसका कारणरूप जो प्रकाश है) उसे तृतीय कूट की हृल्लेखा में
स्थित ईकार रूप कामकला के द्वारा (उस स्वप्नावस्था में विद्यमान) समझना
चाहिए । द्वितीय कूट के लकार को भी वैसे ही समझना चाहिए ॥ ३८ ॥
- प्रकाश *
मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेत्यन्तःकरणानि चत्वारि । तैरेवं व्यवहारः स्वप्नः ।
तज्जनकः प्रकाशस्तृतीयहृल्लेखास्थकामकलया१ बोध्यः । अथापि गलस्थले द्वैतीयी-
कलकारे चिन्त्यः । गलस्थश्चासौ लश्चेति विग्रहः ॥ ३८ ॥ - सरोजिनी *
प्रस्तुत श्लोक में स्वप्नावस्था एवं उससे पञ्चदशी मन्त्र का सम्बंध क्या
है?—इसका निरूपण किया गया है । उनका कथन है कि—अन्तःकरण चतुष्टय
के व्यवहार का अपर पर्याय है 'स्वप्न' । इस स्वप्नावस्था का मूलभूत (केन्द्रीय)
कारण कौन हैं? इसका कारण है वह अचिन्त्य दिव्य प्रकाश जो कि तृतीय कूट
की हृल्लेखा में स्थित ईकार रूप कामकला । भास्कराचार्य कहते हैं—'मनो
१. पद्मपादाचार्य—प्रपञ्चसार की टीका २. भास्करराय—प्रकाश
१८२ वरिवस्यारहस्ये
• बुद्धिरहङ्कारश्चितं चेत्यन्तः करणानि चत्वारि । तैरेव व्यवहारः “स्वप्नः” । तज्जनकः
प्रकाश स्तुतीय हृल्लेखास्थकामकलया बोध्यः ॥'
द्वितीय कूट के लकार को भी वैसा ही समझना चाहिए । 'स्वप्नावस्था' की
केन्द्रीय शक्ति है 'ह्रीं' में स्थित ईकार स्वरूप 'कामकला' ॥ ३८ ॥
आन्तरवृत्तेर्लयतो लीनप्रायस्य जीवस्य ।
वेदनमेव सुषुप्तिश्चिन्त्या तार्तीयबिन्दौ सा ॥ ३९ ॥
(सुषुप्ति का स्वरूप)
तृतीयकूट के बिन्दु में उस सुषुप्ति की भावना करनी चाहिए जो कि सुषुप्ति
का कारण है और जिसमें समस्त अन्तःकरण एवं जीव निद्रामग्न हैं ॥ ३९ ॥
- प्रकाश *
विवरणमत आत्मसुखाज्ञानविषयिकास्तिस्रोऽविद्यावृत्तयः स्वीकृता इत्यत आह—
आन्तरवृत्तेरिति । अन्तःकरणपरिणामरूपवृत्तेरित्यर्थः । वार्त्तिकमते वृत्तिसामान्याभाव
एव सुषुप्तिः । तार्तीयबिन्दौ ललाटस्थाने ॥ ३९ ॥ - सरोजिनी *
'सुषुप्ति'—जिस समय अपने व्यापार-सहित बुद्धि अपने कारण अज्ञान में
विलीन हो जाती है उसी को विज्ञ पुरुषों ने 'निद्रा' कहा है ।१ सुषुप्ति-काल में घोर
निद्रा में सकल इन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि इत्यादि तथा इनकी वृत्तियाँ अपने उपादान
कारण अविद्या में विलीन हो जाती हैं और उस समय आत्मा की जाग्रत-स्वप्न
अवस्थाओं के अभाव होने के कारण विश्व तैजस आदि संज्ञा नहीं रहती, उस समय
तो वह तमावृत अपने स्वरूप सुख का बिना किसी साधन की सहायता के ही
स्वयं भोग करता है ।२
वृत्तियाँ एवं सुषुप्ति—
(१) विवरणकार का मत—आत्मसुख के अज्ञानविषयिक तीन अविद्या वृत्तियाँ
हैं । अन्तःकरण का परिणाम रूप ही वृत्तियाँ हुआ करती हैं ।
(२) वार्तिककार का मत—वृत्ति सामान्य का अभाव ही सुषुप्ति है ।
तुर्यावस्था चिदभिव्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तम् ।
तद्भावनार्धचन्द्रादिकं त्रयं व्याप्त कर्त्तव्यः ॥ ४० ॥
(तुरीयावस्था का स्वरूप)
चैतन्य को अभिव्यक्त करने वाली जो नादावस्था है (वह अवस्था जिसमें
'नाद' पूर्ण चैतन्य को अभिव्यक्त करता है) 'तुरीयावस्था' कहलाती है । उसकी
१. वराहोपनिषद
प्रथमोऽंशः १८३
भावना अर्द्धचन्द्र एवं (उसके आगे के) वर्णत्रय तक की जानी चाहिए ॥ ४० ॥
- प्रकाश *
अर्धचन्द्ररोधिनीनादेषु व्याप्तस्तुर्यावस्थाप्रकाशो भाव्यः ॥ ४० ॥ - सरोजिनी *
ज्ञान की सात भूमिकायें
|
┌─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┐
शुभेच्छा विचारणा तनुमानसा सत्वापत्ति असंसक्ति पदार्थ भावना तुरीयगा
ज्ञान की सात भूमिकायें हैं । उनमें अन्तिम भूमिका है 'तुरीयगा' । 'शुभेच्छा
प्रथमा भूमिका भवति । विचारणा द्वितीया तनुमानसी तृतीया । सत्वापत्तिस्तुरीया ।
असंसक्तिः पञ्चमी । पदार्थ भावना षष्ठी । तुरीयगा सप्तमी ॥'
(१) अकार, उकार, मकार एवं अर्धमात्रा वाली प्रणवात्मिका भूमिका होती हैं ।
(२) उन अकार, उकारादि चार मात्राओं के प्रत्येक के स्थूल, सूक्ष्म कारण
एवं साक्षी भेद से चार-चार प्रकार के होते हैं । उसमें भी अकारादि के जो स्थूलादि
चार भेद हैं उनके प्रत्येक के जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय—ये चार भेद से
अवस्थायें होती हैं । आत्मा के भी चार भेद हैं—विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीय ।
'तदवस्था जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति तुरीयाः ।'
अकार का स्थूल अंश में—जाग्रत-विश्व, उनके सूक्ष्म अंश में जाग्रत तैजस,
उसके बीज अंश में जागृत-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में जागृत-तुरीय है ।
उकार के स्थूल अंश में स्वप्न-विश्व, उसके सूक्ष्म अंश में स्वप्न-तैजस, उसके
बीजांश में स्वप्न-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में स्वप्न-तुरीय है । प्रणव की तृतीय
मात्रा मकार के स्थूल अंश में सुषुप्ति-विश्व, उसके सूक्ष्म अंश में सुषुप्ति-तैजस
उसके बीजांश में सुषुप्ति-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में सुषुप्ति-प्राज्ञ और उसके
साक्षी अंश में सुषुप्ति-तुरीय हैं । प्रणव की चौथी अर्धमात्रा के स्थूल अंश में
तुरीय-विश्व उसके सूक्ष्म अंश में तुरीय तैजस, उसके बीज अंश में तुरीय-प्राज्ञ एवं
उसके साक्षी अंश में तुरीय-तुरीय है ।
(३) अकार के स्थूलांश से तुरीयांश तक जो चार अवस्थायें हैं, उनमें तीन
भूमिकायें हैं—प्रथमा—'शुभेच्छा', द्वितीया—'विचारणा', तृतीया—'तनुमानसा' ।
उकार के स्थूलांश से लेकर तुरीय तक—चौथी 'सत्त्वापत्ति' भूमिका होती है ।
मकार के स्थूलांश से लेकर तुरीयांश तक पाँचवी असंसक्ति नामक भूमिका होती
है । अर्धमात्रा के स्थूलांश से लेकर उसके तुरीयांश तक छठवीं 'पदार्थभावना'
नामक 'भूमिका' होती है । इन समस्त भूमिकाओं के अनन्तर जो अवस्था होती
है । वही सप्तमी 'तुरीयगा' भूमिका है ।
१८४ वरिवस्यारहस्ये
'ज्ञानभूमिः शुभेच्छास्यात्प्रथमा समुदीरिता ।
विचारणा द्वितीया तु, तृतीया तनुमानसा ।
सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका ।
पदार्थभावना षष्ठी सप्तमी तुर्यगास्मृता ॥'
'तुरीयगा' का स्वरूप क्या है?
यत्र नासन्त सद्गूपो, नाहं नाप्य न हंकृतिः ।
केवलं क्षीणमनन आस्तेऽद्वैतेडित निर्भयः ॥
अन्तः शून्यो बहिः शून्यः शून्य कुंभइवाम्बरे ।
अन्तः पूर्णो बहिः पूर्णः पूर्ण कुंभ इवार्णवे ॥ १८ ॥
मा भव ग्राह्यभावात्मा ग्राहकात्मा च मा भव !
भावना मखिलां त्यक्त्वा यच्छिष्टं तन्मयो भव !
द्रष्टृदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह ।
दर्शन प्रथमाभासमात्मानं केवल भज ॥१
बिन्दु कुण्डलिनी
┌───────────┼───────────┐
वह्नि सूर्य सोम
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
┌ ○ महाबिन्दु ┌ ई ┐ स्वप्न महाबिन्दु
│ ० ◡ उन्मनी │ रं ┘ जागर ↓
│ ० समना ┌ ह ┐ उन्मनी
│ । │ ल │ भूमि ↓
तुर्यातीतावस्था │ ▽ ◡ व्यापिका │ क │ विष्णु समना
│ ० │ स ┘ भारती ↓
│ ०० शक्ति └ ह्रीं व्यापिका
│ ०|◡ नादान्त ┌ ल ┐ ब्रह्मा ↓
│ ┌ ह │ भूमि ┐ शक्ति
│ ०|० नाद │ क │ विष्णु │ स्वप्न तुर्यातीतावस्था ↓
तुर्यावस्था │ ▽ ◡ रोधिनी │ स │ भारती │ नादान्त
│ │ ह ┘ ब्रह्मा │ ↓
│ ◡ अर्धचन्द्र └ मिथुनम् │ नाद
┌─┴─ ⸗ ◡ बिन्दु ┌ ह्रीं रुद्राणी │ ↓
सुषुप्ति └─┬─ │ रुद्र ┘ तुर्यावस्था रोधिनी
│ ल ┐ विष्णु ↓
│ ई │ भूमि अर्धचन्द्र
│ ए │ भारती सुषुप्ति ┌─ ↓
└ क ┘ ब्रह्मा └─ बिन्दु
१. वराहोपनिषद
प्रथमोऽंशः १८५
चक्र
'वाग्भवकूट' 'कामराजकूट' 'शक्तिकूट'
१) त्रैलोक्यमोहन १) सर्वसौभाग्यदायक १) सर्वरोगहर
२) सर्वाशापरिपूरकम् २) सर्वार्थसाधक २) सर्वसिद्धिप्रद
३) सर्वसंक्षोभण भूपुर ३) सर्वरक्षाकर ३) सर्वानन्दमय
षोडशदल, अष्टदल ४) चतुर्दशार, बहिर्दशार, सर्वानन्दमय
अन्तर्दशार ४) अष्टार, त्र्यश्र,
बिन्दु
वाक्चतुष्टय (मातृका)
'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' 'वैखरी'
(मूला) (नाभि) (हृदय) (कण्ठ)
(धार चक्र) (मणिपूरक चक्र) (अनाहत चक्र) (विशुद्ध चक्र)
आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् ।
तुर्यातीतावस्था सा नादान्तादिपञ्चके भाव्या ॥ ४१ ॥
(तुर्यातीतावस्था का स्वरूप)
(वह) आनन्दैकघन अवस्था जो मनुष्यों की वाणी से परे है 'तुर्यातीतावस्था'
(कहलाती) है । उसकी 'नादान्त' आदि पञ्चवर्णों में भावना करनी चाहिए ॥ ४१ ॥
- सरोजिनी *
इस श्लोक में 'तुर्यातीतावस्था' के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है ।
(१) 'तुर्यातीतावस्था' आनन्दैकघन, अवाङ्मनसगोचर अवस्था है ।
(२) 'तुर्यातीतावस्था' नादान्त आदि पाँच वर्णों में स्थित है ।
अवस्थापञ्चकं निरूप्य शून्यषट्कं निरूपयति—
तार्तीयीके रेफस्थाने बिन्दौ च रोधिन्याम् ।
नादान्तव्यापिकयोश्चन्द्रकतुल्यानि पञ्च शून्यानि ॥ ४२ ॥
उन्मन्यां नीरूपं षष्ठं चिन्त्यं महाशून्यम् ।
क्रमात् प्राप्तानि सप्त विषुवन्त्याह—
प्राणात्ममानसानां संयोगः प्राणविषुवाख्यः ॥ ४३ ॥
१८६ वरिवस्यारहस्ये
(बिन्दु एवं पञ्चशून्य-अन्तस्संबन्ध)
तृतीयकूट के रेफ, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त एवं व्यापिका स्थानों में पञ्च शून्यों
की, मयूर के पङ्ख में स्थित चन्द्र के रूप में, भावना करनी चाहिए ॥ ४२ ॥
(महाशून्य की भावना एवं 'प्राणविषुव' का स्वरूप)
'उन्मनी' में रूप शून्य छठे (शून्य) महाशून्य की भावना करनी चाहिए ।
प्राण, आत्मा एवं मन के संयोग का नाम 'प्राणविषुव' है ॥ ४३ ॥
* प्रकाश *
चन्द्रको मयूरपिच्छाग्रगतं चन्द्राकारं शून्यम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
'शिखिपक्षचित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम् ।
ध्यायतो ऽनुत्तरे शून्यं परं व्योम तनुर्भवेत् ॥'
इति । यद्यपि
'अग्न्यादिद्वादशान्तेषु त्रींस्त्रींस्त्यक्त्वा वरानने ।
शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरितं प्रिये ।
शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं विभावयेत् ॥'
इति पूजासङ्केते रेफादिमहाबिन्द्वन्तेषु द्वादशसु स्थानेषु मध्ये त्रयं त्रयं त्यक्त्वा,
एकैकमन्तरितं मध्यस्थितं शून्यत्रयं विजानीयादित्यर्थादर्धचन्द्रशक्तिमहाबिन्दुषु शून्यत्रयं
तदूर्ध्वं चतुर्थमित्यर्थः; अथ वा, आदावन्ते च त्रयं त्रयं त्यक्त्वा मध्यस्थे ऽर्धचन्द्रादि-
व्यापिकान्तषट्क एकैकव्यवधानेन शून्यत्रयं तत्परे चतुर्थमित्यर्थचन्द्रनादशक्तिषु त्रीणि
शून्यानि व्यापिकायां महाशून्यमिति वार्थः स्पष्टं प्रतीयते; तथापि
'शून्यषट्कं सुरेशानि अवस्थापञ्चकं पुनः ।
विषुवत्सप्तरूपं च भावयन्मनसा जपेत् ॥'
इत्युपक्रमविरोधादन्यथार्थः । तथा हि—अग्न्यादीति भिन्नं पदं शून्यत्रये ऽन्वेति ।
अन्तशब्दश्चरमावयववाची । अर्थाच्चरमहृल्लेखासंबन्धिषु द्वादशस्ववयवेषु हकारा-
द्युन्मनान्तेषु, अग्न्यादि रेफमारभ्य शून्ययोस्त्रयं शून्यषट्कं विजानीयात् । तच्च न
रेफादिसान्तत्येन, किं त्वेकैकव्यवधानेनेति । अत आह—एकैकान्तरितमिति । प्रथम-
शून्यस्य रेफस्थानीयत्वे कथिते व्यवधानमर्थाद्धकारेकारार्धचन्द्रनादशक्तिसमनाभिः
षड्भिरिति सिध्यति । तदेवाह—त्रींस्त्रीनिति । द्विगुणतांस्त्रींस्त्यक्त्वेत्यर्थः । शून्यत्रयात्
शून्ययोस्त्रयस्य, तत्षट्कस्येत्यर्थः । 'सुपां सु—' इति सुपो डस आदादेशः । निर्धारणे
षष्ठी । तेषां मध्ये परे चरम उन्मन्यां महाशून्यमिति । एतद्विभावनस्य परमरहस्यत्वादित्थं
क्लेशेनोक्ति- रित्यन्वयितव्यम् ॥ ४२ ॥
क्रमात् प्राप्तानि सप्त विषुवन्त्याह—
ककारात्मकवायुः प्राणः । आत्मा प्राण मनश्चेत्येतेषामैक्यं प्राणविषुवसंज्ञमिति
केचित् । यथाश्रुतमन्ये ॥ ४३ ॥
प्रथमोऽशः १८७
- सरोजिनी *
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के तृतीय कूट—'स क ल ह्रीं' के रेफ, बिन्दु, रोधिनी,
नादान्त एवं व्यापिका में पाँच शून्य अवस्थित हैं । ये उसी प्रकार स्थित हैं जैसे
कि मोर के पङ्खों में चन्द्राकार आकृति ॥
'स क ल ह्रीं' के 'रेफ', 'बिन्दु', 'रोधिनी', 'नादान्त' एवं 'व्यापिका' में ५
शून्यों की अवस्थिति ।
महानाद या नादान्त—ये ब्रह्म का प्रथम क्रियात्मक विकास कहा जा सकता
है । 'नाद' वह स्वरूप है जो सारे विश्व को नादान्त से भरे हुए हैं । यह नादान्त
की पूर्णावस्था है । निरोधिनी नाद की वह अवस्था है जिसमें बिन्दु को विकसित
करने की क्षमता रहती है । नाद की सूक्ष्मावस्थायें भी हैं—इनमें निष्कल उन्मनी
अन्तिम है—
नाद की अवस्थायें
| प्रथमा-वस्था | द्वितीया-वस्था | तृतीया-वस्था | चतुर्थ अवस्था | पञ्चम अवस्था | छठवीं अवस्था | सातवीं अवस्था | आठवीं अवस्था | नवीं अवस्था |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| 'बिन्दु' | 'अर्धचन्द्र' | 'रोधिनी' | 'नाद' | 'नादान्त' | 'शक्ति' | 'व्यापिका' | 'समना' | 'उन्मना' |
बिन्दु के बाद शक्तियाँ सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप धारण करती चली जाती हैं और
अन्त में उन्मनी अवस्था (अनुत्पन्न निस्पंद वाक्) आ जाती है । 'उन्मनी' =
कारणरूपा शक्ति की अवस्था है । इस अवस्था में—काल, कला, देवता आदि
किसी का भी आभास नहीं रह जाता । यह 'स्वनिर्वाणपद' है—निर्विकल्प निरञ्जन
शिवशक्ति है । १ "Unmani is Nirākār and Nirucchār soundless and
without ulterance defined by any adjective, being beyond mind and
speech and universe" २ यह अवाङ्मनसगोचरा, निराकार, निरुच्चार, निरूप
अवस्था है ।
कुछ तांत्रिकों ने बिन्दु से भी ३ नादों की उत्पत्ति बतायी है—ये निम्न हैं—
(१) 'सूक्ष्मवाद' (२) 'अक्षरनाद' (३) 'वर्णनाद' । (क) 'सूक्ष्मनाद' = अचिन्त्य,
अभिधेय बुद्धिका कारण एवं बिन्दु का प्रथम प्रसार है । (ख) 'अक्षरनाद' = यह
सूक्ष्मनाद का कार्य है और परामर्श ज्ञान समन्वित है । (ग) 'वर्णनाद' = इसकी
उत्पत्ति आकाश एवं वायु से होती है । कुण्डलिनी भी नादरूपा है । नाद-बिन्दु ।
बिन्दु = वेदान्त का ईश्वर । 'नाद' शक्ति का एक रूप है । बिन्दु भी शक्ति का
एक रूप है । नाद-बिन्दु में क्रिया शक्ति है ।
१-२. गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (आर्थर एवेलॉन)
१८८ वरिवस्यारहस्ये
नाद-बिन्दु—जगत् की सृष्टि ।१
नाद, बिन्दु और कला—'बिन्दु' शिवात्मक है और 'बीज' शक्त्यात्मक है
तथा 'नाद' दोनों (बिन्दु एवं बीज) के समवाय से उत्पन्न होने के कारण उभयात्मक
हैं। नादोत्पत्ति—बिन्दु + बीज—'नाद'
'सच्चिदानन्द विभवात् सकलात् परमेश्वरात्'—(१) आसीच्छक्तिः (२) ततो
नादो (३) नादाद् बिन्दुसमुद्भवः ।। सच्चिदानन्द सकल परमेश्वर—शक्ति—नाद—
बिन्दु ।।
'शक्ति' क्या है? परमेश्वर का 'स्पन्द' ही 'शक्ति' है । इसी 'बिन्दु' से (१)
बिन्दु (२) बीज (३) नाद उत्पन्न होते हैं । 'बिन्दु' का फटना—बिन्दु, बीज एवं
नाद ।। 'बिन्दु'—रौद्री । 'नाद'—ज्येष्ठा । 'बीज'—वामा ।। 'बिन्दु नाद कला ब्रह्मन्
विष्णु महेश देवताः ।।'' (योगशिखोपनिषद ६-७०) । विष्णु = 'बिन्दु' । ब्रह्मा =
'नाद' । रुद्र (ईश) = 'कला' ।।
'श्रीचक्र' = भगवती का स्थूल शरीर । पञ्चदशाक्षरी मन्त्र' = भगवती का
सूक्ष्मशरीर 'बीज' = शक्त्यात्मिका कला ।।
शिव (पर बिन्दु)—शक्ति—सदाख्यशिव (नाद)—ईश्वर (बिन्दु)—शुद्धविद्या
बिन्दु) ।।
┌ नाद-ज्येष्ठा ।। ब्रह्मा-इच्छा ।। ब्राह्मी-क्रिया ।। सूर्य-प्राण ।।
शुद्धविद्या ┤ बीज-वामा ।। विष्णु-क्रिया ।। वैष्णवी-ज्ञान ।। अग्नि-चिति ।।
└ बिन्दु-रौद्री ।। रुद्र-ज्ञान ।। गौरी-इच्छा ।। चन्द्र-मन ।।
बिन्दु—रौद्री । नाद—ज्येष्ठा । बीज—वामा । बिन्दु—ज्ञान । बीज—क्रिया ।
नाद—इच्छा ।। नाद = सूर्य । बीज = अग्नि ।। बिन्दु = चन्द्रमा ।। इच्छा, क्रिया
एवं ज्ञान = गौरी, ब्राह्मी वैष्णवी ।। बीज = शक्त्यात्मिका कला ।।
हल्लेखा के उच्चारण होने पर अनुनासिक ध्वनि उक्त ९ स्तरों से होती हुई
उन्मनी में समाप्त हो जाती है । नौ स्तर निम्न हैं—
शिव (पर बिन्दु)
↓
शक्ति
↓
सदाख्यशिव (नाद)
↓
―――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――
१. गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (राघव भट्ट : 'शारदातिलक')—नाद-बिन्दु शक्ति की वे
अवस्थाएँ हैं जो सृष्टि को जन्म देने के लिए उत्सुक रहती हैं । 'बिन्दु' एक घनावस्था
है । बिन्दु में शून्यता + गुण दोनों की प्रतिष्ठा है । (कालीचरण : ष.च.नि. की टीका)
प्रथमोऽंशः १८९
ईश्वर (बिन्दु)
↓
शुद्ध विद्या (बिन्दु)
┌─────────────────┬─────────────────┐
नाद-ज्येष्ठा बीज-वामा बिन्दु-रौद्री
↓ ↓ ↓
ब्रह्मा-इच्छा विष्णु-क्रिया रुद्र-ज्ञान
↓ ↓ ↓
ब्राह्मी-क्रिया वैष्णवी-ज्ञान गौरी-इच्छा
↓ ↓ ↓
सूर्य-प्राण अग्नि-चिति चन्द्र-मन
(१) ब्रह्म को बिन्दु, शक्ति को कला एवं जीव को नाद समझकर ५ प्रकार
का ऐक्य भी स्थापित किया जाता है।
(क) जीव—ब्रह्मैक्य भाव । (ख) ब्रह्म—सृष्टि-प्रभव ।
(ग) तृतीय—देहाध्यास । (घ) चतुर्थ—प्रलय ।
(ङ) पञ्चम—जीवोत्पत्ति ।
बिन्दु से नाद का सम्बंध न बताने का अभिप्राय यह है कि ब्रह्म कभी जीव
नहीं बनता, आत्मा सदा ब्रह्मस्वरूप है, जीवभाव एक मिथ्या प्रतीति मात्र है ।
(१) हृल्लेखा के उच्चारण होने पर जो अनुनासिक ध्वनि उक्त ९ स्तरों से
होती हुई उन्मनी में समाप्त हो जाती है । उसके उच्चारण काल की मात्रा उत्तरोत्तर
आधी होती जाती है ।
(२) सभी के योग का काल १/२ मात्रा होता है जो बिन्दु की आधी मात्रा
सहित पूरी एक मात्रा बनती है अर्थात्—
१/२ + १/४ + १/४ + १/१६ + १/३२ + १/६४ + १/१२८ + १/२५६ + १/२५६ = १ मात्रा
(३) पञ्चदशी के ३ अनुस्वार ३ बिन्दु हैं ।
(४) हृल्लेखा, नाद एवं १५ अक्षर १५ कलायें हैं ।
(५) नाद, बिन्दु, कला = ‘त्रिबिन्दु’
(६) श्रीचक्र त्रिधा विभक्त—नाद । बिन्दु । कला ।
(७) बिन्दु को शिवशक्ति भेद से दो प्रकार का माना जाय तो शक्त्यात्म
बिन्दु ही ‘बीजि’ है । दोनों से शब्दब्रह्म, नादोत्पत्ति एवं शब्द से कला (अर्थात्मक
सृष्टि) की उत्पत्ति होती है ॥ ४२ ॥
१९० वरिवस्यारहस्ये
‘प्राणविषुवाख्यः’—प्राणविषुव नामक ।। ‘प्राणविषुव’ क्या है?
प्राण, आत्मा एवं मन के पारस्परिक योग को ‘प्राणविषुव’ कहते हैं । ‘योगः
प्राणात्ममनसां विषुव प्राणसंज्ञितम् ।।१’
अमृतानन्दनाथ इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं—‘प्राणस्य हकारात्मनो
वाटवात्मनो यष्ठर्मनसश्च संयोगः प्राणविषुवमित्युच्यते ।।२ ‘शैवतन्त्र’ में कहा गया है—
‘शिष्यात्म प्राणमनसां संयोगं प्राणकं बिन्दुः ।।’ आचार्य भास्कर इसकी व्याख्या करते
हुए कहते हैं—‘वस्तुतस्तुमूलाधारे ब्रह्मेति प्रसिद्धस्य खस्य वायु कुण्डली
संयोगात्तद्व्युत्पत्तिः स एव खो नाभिपर्यन्तमागत्य पवनेन मनसा च युज्यते । स एव
हृदयमागतः पवनेन बुद्ध्या च संयुज्यते । अतः स एव स्थानत्रये परा-पश्यन्ती-
मध्यमेति नामत्रयं क्रमेण मजत इति सौभाग्यभास्करे कर्णितमस्माभिः । इदमेव प्राण-
विषुवपद वाच्यमिति स्थानत्रये मिलित्वैका भावनेति ज्ञेयम् ।।'
‘उन्मन्यां नीरूपं षष्ठं चिन्त्यं महाशून्यम्’३—उन्मनी षष्ठ शून्य है । यह
‘महाशून्य’ कही जाती है ।
स्वच्छन्दागम के मतानुसार शून्यों की स्थिति इस प्रकार है—(१) ‘ऊर्ध्व
शून्य’—शक्तिप्रद जहाँ नादान्त तक निःशेष पाश प्रशान्त हो गए हैं । (२) ‘अधः
शून्य’ = हृदयक्षेत्र; जहाँ अभी तक प्रपञ्चोल्लास नहीं हुआ है । (३) ‘मध्यशून्य’
= कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट एवं ब्रह्मरंध्र ही शक्तिस्थान है । व्यापिनी चतुर्थ
शून्य है । तीन शून्य चल एवं हेय है । ‘समना’ में पञ्चम शून्य एवं ‘उन्मना’ में
षष्ठ शून्य है । ये भी चल एवं हेय हैं । उन्मना में भी यत्किंचित चलत्व है ।
परमशिवाधिष्ठित होने से सभी शून्य सिद्धिप्रद है । स्वच्छन्द शास्त्र के अनुसार ६
शून्यों का त्याग करके सातवें में प्रवेश आवश्यक है । वही वास्तविक परमपद है ।
६ शून्य अवस्थायें हैं—सातवाँ ही योगियों का लक्ष्य है—‘अशून्यं शून्यमित्युक्तं
शून्यं चाभाव उच्यते । अभावः स समुद्दिष्टः यत्र भावाः परं गताः ।।' यह सप्तम
शून्य ही अखण्ड महासत्ता महाशून्य है ।
मन्त्रविषुवमाह—
प्राथमिककूटनादे त्वनाहताद् ब्रह्मरन्ध्रान्ते ।
व्यष्टिसमष्टिविभेदाद् बीजचतुष्कस्य च स्वस्य ।। ४४ ।।
ऐक्येन नादमयताविभावनं मन्त्रविषुवाख्यम् ।
(‘मन्त्रविषुव’ का स्वरूप)
प्रथम कूट के नाद एवं व्यष्टि-समष्टि के भेद से अनाहत से आरंभ करके
ब्रह्मरंध्र तक उत्पन्न होने वाला नाद एवं चारों बीज तथा आत्मा के नादमय
विभावना की ‘मन्त्रविषुव’ संज्ञा है ।। ४४, ४४- ।।'
१. योगिनीहृदय (१८२) २. दीपिका
३. सेतुबन्ध (श्लो० १८५)
प्रथमोऽंशः १९१
- प्रकाश *
प्राथमिककूटनादे बीजचतुष्कस्यैक्यम्, स्वस्यात्मनस्वाधारोत्थितनादेन सहैक्यं न
प्राथमिकेनानाहतादारब्धेन सह,
'आधारोत्थितनादे तु लीनं बुद्ध्वात्मरूपकम् ।
संयोगेन वियोगेन मन्त्राणां महेश्वरि ॥
अनाहताद्याधारान्तं नादात्मत्वविचिन्तनम् ।
विषुवम् .............................. ॥'
इति कादिमतीयवचनात् । संयोगेन समष्ट्या । वियोगेन व्यष्ट्या । चतुर्विधानामिति
शेषः । आधाराणामन्तो ब्रह्मरन्ध्रम् । आधारान्तान्तमिति तन्त्रेणान्तपदद्वयसत्त्वाद्-
ब्रह्मरन्ध्रान्तमित्यर्थकत्वेन व्याचक्षते । आ आधारान्तादित्यर्थक आङ्प्रश्लेषे तु सर्वं
सुस्थम् ॥ ४४, ४४- ॥ - सरोजिनी *
मन्त्र सङ्केत एवं मन्त्र के विविध अर्थ—'योगिनीहृदय' के 'मन्त्र-सङ्केत' नामक
द्वितीय पटल में 'मन्त्रसङ्केत' के नाम से मन्त्रार्थों का निरूपण किया गया है।
'मन्त्रसङ्केत' के ६ प्रकार हैं—
(१) मन्त्रसङ्केतस्तस्य नानाकारो व्यवस्थितः ।
(२) षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे ।
(३) (क) भावार्थ (ख) सम्प्रदायार्थ (ग) निगर्मार्थ (घ) कौलिकार्थ (ङ)
सर्वरहस्यार्थ (च) महातत्त्वार्थ ॥ योगिनीहृदय (मन्त्रसङ्केत निरूपणम्)
मन्त्रविषुव का तात्पर्य है अभिव्यज्यमान नाद को जापक की अपनी आत्मा
मानकर भावना करना ॥
'योगिनीहृदय दीपिकाकार' कहते हैं—मूलाधारस्थित वाग्भव शिखरवर्तिनं नादं
हृदयपर्यन्तमुच्चार्य तत्र स्वयं लीनो भूत्वा स्वात्मनस्तन्मयतानुसंधानं मन्त्रविषुव-
मित्यर्थः ॥'१ मूलाधारस्थित वाग्भवशिखरवर्ती नाद को हृदयपर्यन्त उच्चारित करके
वहीं स्वयं लीन होकर अपनी आत्मा की उसके साथ की गई तन्मयता का
अनुसन्धान करना 'मन्त्रविषुव' है ।२ 'शैवतन्त्र' में कहा भी गया है—
आत्मना नादमध्ये तु लयं सञ्चार्य तत्त्वतः ।
अकारोकार वर्णादिसंयोगेन वियोगतः ।
हृदयादि बिलान्तं च विषुवमन्त्र संशकम् ॥३
हृदय से ब्रह्मरंध्रपर्यन्त इसकी व्याप्ति है—‘‘हृदयाद ब्रह्मरंध्रान्तं विषुवमन्त्र
संज्ञकम् ॥’’ भास्कराचार्य कहते हैं—'नादं वाग्भवान्त्यस्थानमारभ्य हृदयस्थं कामराज-
१-२. अमृतानन्द योगी—'दीपिका' ३. शैवतन्त्र