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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 530 में से

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पृष्ठ 259

प्रथमोऽंशः १५७
दीपिकाकार अर्धमात्रा की व्याख्या करते हुए कहते हैं—अर्धमात्रः ह्रस्वस्य
उच्चारण कालो मात्रेत्युच्यते । मात्राया अर्ध मुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः ।।”
अर्थात् ह्रस्व वर्ण का उच्चारण काल मात्रा कहलाता है । इस मात्रा का अर्द्धांश
‘अर्धमात्रा’ है ।
आचार्य भास्करराय ‘सेतुबंध’ में अर्धमात्रा की व्याख्या करते हुए कहते है —
‘अर्धमात्रा यस्य सोऽर्धमात्रः । मात्रा नाम ह्रस्वस्योच्चारण कालः स च षट्पञ्चाशदुत्तर
शतद्वयलवैर्भवति । लवो नाम काल परमाणुः नलिनीपत्रसंहत्याः सूक्ष्मसूच्यभिभेदने ।
दले दले तु यः कालः स कालो लव संज्ञितः ॥’
‘अर्द्धचन्द्र’ की निम्न कलायें हैं—(१) ज्योत्स्ना (२) ज्योत्स्नावती (३) सुप्रभा
(४) विमला (५) शिवा ॥
मन की मात्रा जितनी ही प्रसृत होती है उतना ही मन का अंश क्षुद्रतर होता
है और उतना ही चिदालोक उज्ज्वलतर होता है अर्द्धमात्रादि में जो प्रतिफलित
चैतन्य है वही ‘मन्त्र’ है । एक मात्रा ही अर्द्धमात्रा में परिणत हो जाती है । स्थूल
विश्व अनुभूति मन की जिस मात्रा से होती है उसे एक मात्रा कहते हैं । जगत् की
अनुभूति का आरंभ इसी एक मात्रा में होता है । मात्रा का अधिक्य जड़ता के
अधिक्य का कारण है । साधक का कर्तव्य है कि वह मन को एकाग्र करे (केन्द्र
में स्थापित करे) अर्थात् एक मात्रा में अवस्थित करे । सामान्यतः मन एक मात्रा में
नही रहता । विक्षिप्त एवं क्षिप्त अवस्था में मात्राओं की बहुलता रहता है ।
‘बिन्दु’ मात्रा से मात्राहीन की ओर जाने का द्वार है । इस स्थान में ज्ञाता—
ज्ञेय-ज्ञान एकाकार हो जाते हैं । मात्रा-भङ्ग के फलस्वरूप अर्द्धमात्रा का उदय होता
है । बिन्दु से सहस्रार में उठने के मार्ग में कपाल प्रदेश में जो सोम दृष्टिगत होता
है वही ‘अर्द्धचन्द्र’ है ।
‘अर्धचन्द्र’ एवं ‘रोधिनी’ आदि में पूर्व ध्वनि की आधी-आधी मात्रा समझना
चाहिए । ‘रोधिनी’ = अर्द्धचन्द्र का १/२; ‘नाद’—‘रोधिनी’ का १/२; इसी प्रकार
परवर्ती ध्वनि अपने-अपने पूर्ववर्ती ध्वनि का १/२ भाग होती है । काल परमाणु
ही ‘लव’ है । २५६ लव = १ मात्रा । बिन्दु का उच्चारणकाल १२८ लव है ।
अर्द्धचन्द्र का उच्चारण काल ६४ लव है । इसी प्रकार ‘रोधिनी’ का ३२; ‘नाद’
का १६; ‘नादान्त’ का ०८; ‘शक्ति’ का ४, ‘व्यापिका’ का ०२ एवं ‘समना’ का
उच्चारण काल १ लव है ।
‘उन्मना कालहीन है । ‘उन्मना’ में क्षण से परार्द्धान्तकाल, निवृत्ति से लेकर
शान्त्यतीतादि कलायें, प्राणाचार, भुवन एवं देवों की गति नहीं है । ‘उन्मना’ =
‘गुरुवक्त्र’ है एवं परमशिव की प्राप्ति का द्वार है । इससे आगे अनामय पर तत्व
मात्र शेष है—
‘यावत्सा समना शक्तिः तदूर्ध्वं चोन्मना स्मृता ।
नात्र कालः कलाक्षारो न तत्त्वो न च देवताः ॥ १२७६ ॥