वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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१६६ वरिवस्यारहस्ये
परं च । मातृकाः पश्यन्तीमध्यमावैखर्यः परा च । धामपदार्थत्वेनोक्तं शक्तित्रयं मातृ-
पदस्थ वार्थः ॥ ३२-३३ ॥
- सरोजिनी *
'समष्टि'—समूहात्मक । 'व्यष्टि'—व्यक्तिगत । 'बीज'—१. 'सृष्टि' २. 'स्थिति'
३. 'संहार' ४. 'अनाख्या' ।
'अनाख्या'—निरोधन एवं अनुग्रह की समष्टि । कृत्यपञ्चक में भी औदासीन्य
का विशेषावलम्बन ।
'अस्यां चत्वारि बीजानि'—इसमें चार बीज हैं जो निम्न हैं—१. सृष्टि
२. स्थिति ३. संहार ४. अनाख्या ॥ ३२ ॥
'पुट'—पुटादिष्टक । 'अनाख्या'—तिरोधान-अनुग्रह की सृष्टि कृत्य पञ्चक में
भी औदासीन्यावलम्बनरूप अवस्थान विशेष ।
'धाम'—धामसप्तक ।
'पुट'—ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय एवं उनका सामरस्य ।
'धाम'—सामरस्यचक्र नाथ दशा शक्ति त्रयात्मकरूप सात ।
'चक्र'—अग्निचक्र । सूर्य चक्र । सोमचक्र । ब्रह्म चक्र ।
'नाथ'—मित्रेशनाथ, षष्ठीशनाथ, उड्डीशनाथ, आश्चर्यानन्दनाथ ।
'दशा'—जाग्रत, स्वप्न, सुषुरित, तुरीय ।
'शक्ति'—वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, शान्ता । एवं—इच्छा, ज्ञान क्रिया, अम्बिका
एवं कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी एवं महात्रिपुरसुन्दरी । आत्मा, अन्तरात्मा,
परमात्मा, ज्ञानात्मा ।
'तत्त्व'—आत्मतत्त्व । विद्यातत्त्व । शिवतत्त्व । सर्वतत्त्व ।
'पीठ'—कामरूप, पूर्णगिरी, जालंधर, ओडयाण पीठ ।
'अन्वय'—प्राक्, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर । समय पद । आम्नाय पद ।
'लिङ्ग'—स्वयंभूलिङ्ग । बाणलिङ्ग । इतरलिङ्ग । परलिङ्ग ।
'मातृका'—पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, परा ।
'पुट'—ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय एवं उनका सामरस्य ।
'कामरूप पीठ' क्या है?—'कामरूप पीठ'—जब पराशक्ति आत्मगर्भस्थ एवं
अपने साथ एकीभूत विश्व को देखने के लिए उन्मुख होती है तब शक्ति एवं शिव
साम्यभावापन्न होकर एक बिन्दु के रूप में परिणत हो जाते हैं जिससे कि
पारमार्थिक चैतन्य प्रतिकालित होकर ज्योतिलिङ्ग के रूप में प्रकट होता है । यही