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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 530 में से

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पृष्ठ 257

प्रथमोऽंशः १५५
है सृजनार्थ तीन भागों में विभक्त हो जाता है जो निम्न है—१. ‘बिन्दु’ २. ‘नाद’
३. ‘बीज’। वाचकों की महासमष्टिरूप से एकीभूत स्थिति का नाम नाद है।
(१) मूलाधार से समुत्थित ‘नाद’ वर्णों के मध्य सञ्चरण करता हुआ माला के
सूत की भूमिका का निर्वाह करता है। जिस प्रकार मनकों की पृथकता को एकता
में रूपान्तरित करने वाला सूत्र मनकों के मध्य रहता है उसी प्रकार प्रत्येक वर्ण की
विभिन्नता को नाद एकता में रूपान्तरित करके उन सभी को आपस में एकसूत्रता
में पिरो देता है। ‘बिन्दु’ मस्तक के मध्य वृत्ताकाररूप में दीपक की भाँति
प्रकाशित रहता है ॥ २२ ॥
(२) उसके ऊपर ‘अर्धचन्द्र’ स्थित है। वह आकृति एवं कान्ति दोनों दृष्टियों
से अर्धचन्द्रमा की भाँति है।
(३) इसके ऊपर त्रिभुज के आकार की ‘रोधनी’ शक्ति विद्यमान है। यह
चाँदनी के सौन्दर्य से मण्डित है ॥ २३ ॥
भास्कर कहते हैं—वट बीज के अन्तर्गत वटवृक्षीय सूक्ष्मरूप के तुल्य
शब्दसृष्टि सूक्ष्मरूपशालिनी पूर्वोक्तरूपा त्रिपुरसुन्दरी ही तादृशसूक्ष्मरूपवत् प्रवृत्ति-निमित्त
क परा पद वाच्या है। वही त्रिपुरसुन्दरी—‘माति तरति कायतीति च व्युत्पत्या
मातृकेति’—मातृका है। उसके भीतर निर्विकार होने पर भी अनादिसिद्ध अदृष्ट के
कारण स्वान्तः संहृतविश्व की सिसृक्षा उत्पन्न होती है। अतः वह स्रष्टव्य पदार्थों का
आलोचन करती है—‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’ तादृश ईक्षरम ही प्रवृत्ति का निमित्त
बनकर ‘पश्यन्ती’ बन जाता है। वही पश्यन्ती मातृकाकरण को उत्तीर्ण करने
कारण ‘उत्तीर्णा’ कही जाती है। उसके अवयव हैं—वामादिक अष्ट शक्तियाँ; अतः
वही व्यष्टि समष्टिवेष से नवविध हैं। उनसे अविकृत शून्यादिक नाद उत्पन्न होते
हैं। उनकी समष्टि ही नादध्वनि आदि कहलाती है। ‘मध्यमा मातृका’—
मध्यमावयवरूप अविकृत शून्य स्पर्श नाद ध्वनि बिन्दु शक्ति बीजाक्षर नाम वाला
नाद नवक मूलाधार आदि ६ चक्रों में नाद, नादान्त एवं ब्रह्मरंध्र में स्थित है। ९
नादों द्वारा अ-क-च-ट-त-प-य-श-ल नाम वाले ९ वर्गों वाली वैखरी मातृका उत्पन्न
होती है। वर्णों में नाद अनुस्यूत है—‘‘वर्णेषु नादो अनुस्यूतः ।।’’ दोनों वर्णों के
मध्यभाग में मणिद्वय मध्यभाग में स्थित शुद्धसूत्र की भाँति शुद्ध नाद का मान है।
वर्णशरीर के अन्तर्भाग में पराभेद द्वारा संवालित तन्तुबद्ध परान्तभूद्वत उन उन वर्णों
के साथ अभेद के द्वारा ही नाद का मान है किन्तु यहाँ मण्यन्तर्गत सूत्र दृष्टान्त
उचित नहीं है क्योंकि सूत्र तो मणि से पृथक् रहता है किन्तु इस प्रसङ्ग में तो
मणि से सूत्र के अभिन्नत्व की प्रतीतिवत नाद के स्वरूप का वर्णन किया गया है।
अर्द्धचन्द्र—बिन्दु से सहस्रार में उठने के मार्ग में कपाल में जो सोमरस
दृष्टिगत होता है वही ‘अर्द्धचन्द्र’ है। इसके भीतर त्रिविधात्मक वर्णमाला (सौम्य,
सौर, आग्नेय) चिद् बीज में सहस्रार के दलों में प्रकाश पाता है। स्थान की दृष्टि
से बिन्दु के अनन्तर अर्धचन्द्र है। अर्थात् यह द्वितीय भूमि है और इसकी मात्रा
१।४ है यदि बिन्दु पूर्णचन्द्र या चन्द्रबिन्दु है तो अर्धचन्द्र उसका अर्धांश है। यह