सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 266

१६४ वरिवस्यारहस्ये
नाम है—'Nāda is thus the union of therse two in creation'¹. 'Nāda is
the first produced movement in the editing cosmic consciousness
leading up to the Sound Brahman (Śabda Brahma) where all ideas
the languege in which they are exrpressed (Śabda) and the objects
(Artha) which they denote are demised''.² Nāda is a mutual relation
between Bindu and Bīja.³
'बिन्दुः शिवात्मको, बीजम् शक्तिर नादास्तयोर्मिथः ।
समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदैः ॥'
'Nāda is Śiva Śakti—that is, their mutual relation or interaction
(मिथः समवायः) or yoga (union) as 'Prayogo-Sana' call it.⁴
जब 'प्रकाशबिन्दु' 'विमर्शबिन्दु' में प्रविष्ट होता है तब बिन्दु में उच्छूनता
(Swelling, सूजन) आती है तब इस बिन्दु से नाद उत्पन्न होता है । इसी
नाद में सारे तत्त्व रहते हैं । यही नाद व्यक्त होकर त्रिकोण का रूप धारण कर
लेता है ॥ २८-३० ॥
पूर्वं विद्यास्वरूपस्य काल उक्तः, इदानीमुच्चारणकालं निष्कृष्याह—
आद्ये दश मध्ये ताः सार्धास्तार्तीय कूटेष्टौ ।
एकलवोना ऊनत्रिंशन्मात्रा मनोजपे कालः ॥ ३१ ॥
(कूटत्रय का उच्चारण-काल)
प्रथम (कूट) में दश (मात्रायें), मध्य (कूट) में साढ़े दस (मात्रायें) एवं तृतीय
(कूट) में एक लव कम साढ़े आठ (मात्रायें)—कुल मिलाकर एक लव न्यून
उन्तीस मात्रा-काल जप में होना चाहिए ॥ ३१ ॥

  • प्रकाश *
    आद्ये कूटे दश मात्राः । मध्ये कामराजकूटे ता दश सार्धा मात्राः । तार्तीय-
    कूटेऽष्टाविति । यस्य पूर्वपरवर्ति पदद्वयं काकाक्षिन्यायेन द्विर्द्विरन्वयितव्यम् । तेनैकल-
    वोनाः सार्धा अष्टौ मात्रास्तृतीयकूटे यथापूर्वमवस्थिता इत्यर्थः । संहत्य त्वाह—एकल-
    वोना इति । ऊनत्रिंशदेकोनत्रिंशत् । जपे वाचिके । न तु मानसे पूर्वोक्तकालादयः ।
    प्रथमद्वितीयकूटस्थास्तु यत्र न्यासादौ संध्याङ्गभूते—कैककूटमात्रजपे च प्रातिस्विक-
    मुच्चारणेन कूटानां विनियोगविधिस्तत्रैव सार्थका इति विज्ञेयम् ॥ ३१ ॥
  • सरोजिनी *
    'पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के प्रथम कूट ('वाग्भव कूट') में १० मात्रायें, मध्य द्वितीय
    कूट ('कामराज कूट') में १० मात्रायें, एवं तृतीय कूट ('शक्ति कूट') में एक लव
    1-4. Serpent Power (Sir Jöhn Woodroffe) p. 43