सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 269

प्रथमोऽंशः १६७
बिन्दु 'कामरूप पीठ' कहलाता है । इस पीठ में अभिव्यक्त चैतन्य 'स्वयंभूलिङ्ग'
कहलाता है । यह शक्तिपीठ शक्ति एवं शिव से समभाव में एक-एक मात्रा लेकर
सङ्घटित है । शिव-शक्ति का यह अंशद्वय-(१) 'शान्ताशक्ति' एवं (२) 'अम्बिका
शक्ति' कहलाता है । इस पीठ में महाशक्ति की अभिव्यक्ति 'परावाक्' के रूप में
होती है । यही प्रणव का परम रूप या वेद का स्वरूप है ।
'पूर्णगिरि पीठ'—शक्ति के क्रमिक विकास के क्रम में आगे 'शान्ताशक्ति'
'इच्छाशक्ति' के रूप में परिणत हो जाती है एवं शिवांश-अम्बिका शक्ति भी 'वामा'
के रूप में परिणत हो जाती है । (शान्ता—इच्छा । अम्बिका—वामा ।) उभय
शक्तियों के पारस्परिक वैषम्य के दूर होने पर एक अद्वय सामरस्यमय बिन्दु का
आविर्भाव होता है जिससे कि तदनुरूप चैतन्य का स्फुरण होता है । इसी बिन्दु
को 'पूर्णगिरि पीठ' कहते हैं । यही हैं 'पश्यन्तीवाक्' की अवस्था ।
'जालन्धर पीठ'—इच्छाशक्ति के उपराम होने पर जब 'ज्ञानशक्ति' का
आविर्भाव होता है एवं शिवांश ज्येष्ठाशक्ति के साथ ज्ञानशक्ति अद्वैतभाव में मिलित
होती है तब 'जालन्धर पीठ' रूप सामरस्य बिन्दु की सृष्टि करता है । इस बिन्दु
से अभिव्यक्त चैतन्य 'इतरलिङ्ग' कहा जाता है । शक्ति के इस स्तर में
'मध्यमावाक्' आविर्भूत होती है
'उड्डीयान पीठ'—जब ज्ञान शक्ति 'क्रियाशक्ति' के रूप में परिणत होती है
तब शिवांश रौद्री शक्ति के साथ साम्यभाव प्राप्त करती है । उसके द्वारा जिस
अद्वैत बिन्दु का आविर्भाव होता है उसे 'उड्डीयान पीठ' कहते हैं । इस बिन्दु से
चित् शक्ति महातेजोमय 'परलिङ्ग' के रूप में अभिव्यक्त होता है एवं यहाँ शब्द
वैखरीवाक् के रूप में आविर्भूत होता है ।
समस्त विश्व का मूल महात्रिकोण है ।
त्रिकोण कामध्य बिन्दु परावाक् या अम्बिकाशान्ता—इन दो शिवशक्त्यंश का
साम्यभावापन्न स्वरूप है । बिन्दु में शिव+शक्ति दोनों का अंश स्थित है इसी प्रकार
त्रिकोण में भी किन्तु 'बिन्दु' प्रधानतः शिव रूप में एवं त्रिकोण 'शक्ति' या योनि
रूप में परिणत हो जाता है ।
त्रिकोण की ३ रेखायें = पश्यन्ती, मध्यमा वैखरी है । त्रिकोण की ३ रेखायें
वाचक हैं—३ शब्दों, सृष्टि-स्थिति-संहार रूप ३ व्यापारों वामा-ज्येष्ठा-रौद्री, ब्रह्मा-
विष्णु-महेश (शिवांश) की प्रतिनिधि है ।