वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ वरिवस्यारहस्ये
सुनिर्वाणं परं शुद्धं गुरुवक्त्रं तदुच्यते ।
तदतीतं वरारोहे परं तत्त्व मनामयम् ॥ १२७७ ॥१
'योगिनीहदय' का मत—इसके अनुसार उन्मनी भी कालात्मक है—शक्त्यादीनां
तु मात्राशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ।२
'स्वच्छन्दतन्त्र' का मत—उन्मनी में काल नहीं है—नात्र कालः कलाश्चारो न
तत्त्वो न च देवताः ॥३
निरोधिका—अर्धचन्द्र के बाद तृतीय भूमि के रूप में 'निरोधिका' आती है ।
इसकी मात्रा १/८ है । समग्र विश्व के प्रशासक ब्रह्मादिक पञ्च कारणों की भी
ऊर्ध्वगति को अग्रपद होने से रोकने वाली भूमि का नाम ही रोधिनी या निरोधिका
है । यह भी बिन्द्रावरण की शेष प्रान्तभूमि है । इस भूमि का अतिक्रमण कर लेने
पर विश्व प्रशासन का कार्य संभव नहीं रह जाता । यह योगिमात्रैक लंघ्य दुर्लंघ्य
भूमि है । कपाल के ऊर्ध्व में (ब्रह्मरंध्र के नीचे त्रिकोण के मध्य) 'रोधिनी' स्थित
है । इसका अभिधान 'रोधिनी' इसलिए है क्योंकि यह ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-ईश्वर-सदाशिव
नामक कारण पञ्चक को उनकी ऊर्ध्व गति से रोके हुए है । रोधिनी तक ही
'बिन्द्रावरण' है । यह भी शून्य है । इस भूमि में दिशा एवं काल की पृथकता
दृष्टिगत नहीं होती । यहाँ निम्नाभिमुखी मन एवं प्राण की भी अनुभूति नहीं होती ।
'रोधिनी' में काल विद्यमान है किन्तु इसकी मात्रा ३२ लव है—'द्वात्रिंशदेव
रोधिन्यां' । अध्वगत ध्वनि जहाँ विश्राम करने लगती है, जो सर्वदेवनिरोधिका है, जो
ब्रह्मादिक, सुराधियों की गति को भी निरुद्ध कर देती है वही निरोधिकाख्यामांत्री
कला है—
'ध्वनिरध्वगतो यत्र विश्राम्यत्यनिरोधतः ।
निरोधिनीति विख्याता सर्वदेव निरोधिका ॥ ६४ ॥
निरोधयति या देवान्ब्रह्मादींश्च सुराधिपे ।४
निरोधिकेति साख्याता.......................॥
निरोधिका की कलायें निम्नांकित हैं—रुन्धनी, रोधनी, रौद्री, ज्ञानबोधा,
तमोपहा । (रुंधनी रोधनी रौद्री ज्ञानबोधा तमोपहा । निरोधिका कला ह्येताः सर्वदेव-
निरोधिकाः ।। नेत्रतन्त्र) । यहाँ अनाहतनादात्मा सदाशिव विश्राम ग्रहण करते हैं ।
'निरोधिका' या 'निरोधिनी' त्रिकोणाकार है और चन्द्रिकावत प्रभास्वर है । इसका
उच्चारण-काल मात्रा का अष्टम भाग है ।
अर्धचन्द्र के अनन्तर त्रिभुज के आकार की 'रोधिनी' है—जो कि चन्द्रिका की
कान्ति से समन्वित है । "अथ रोधिनी तदूर्ध्वं त्रिकोणरूपा च चन्द्रिका कान्तिः ।"५
कपाल के ऊर्ध्व में (ब्रह्मरन्ध्र) के नीचे त्रिकोण के मध्य 'रोधिनी' स्थित है ।
१. स्वच्छन्दतन्त्र (१० पटल) २. योगिनीहृदय
३. स्वच्छन्दतन्त्र ४. नेत्रतन्त्र
५. वरिवस्यारहस्यम्