वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १६१
(१) बिन्दोस्तस्माद्भिद्यमाना द्रवोऽव्यक्तात्मको भवेत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः
'शब्दब्रह्मेति । कथ्यते ॥
(२) मूलाधारात् प्रथममुदितो यस्तु भावः पराख्यः ।
पश्चात् पश्यन्त्यथ हृदयगो बुद्धियुङ्मध्यमाख्यः ॥
वक्त्रे वैखर्यथ रुरुदिषोरस्य जन्तोः सुषुम्ना ।
बद्धस्तस्माद् भवति पवन प्रेरितो वर्ण संङ्घः ॥ ४३ ॥¹
(१) 'शून्य' = अनुत्पन्न, निस्पन्द (२) 'संवित' = वागुत्पित्सु (३) 'सूक्ष्मा'
= उत्पत्यवस्था (४) परा मूलाधार से प्रथम उदित (५) 'पश्यन्ती'—नाभिस्थिता
(६) 'मध्यमा' = हृदयस्थिता (७) वैखरी = कण्ठस्थिता ॥ अभिनव गुप्त पादाचार्य
ने नादादिक का सूक्ष्म वर्णन किया है । 'तन्त्रालोक' में उनका स्वरूप इस प्रकार
निरूपित किया गया है ।
अर्धचन्द्र की कलायें—ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावली, कान्ति, प्रभा एवं विमला =
(५ कलायें) ॥²
बिन्दूर्द्धेऽर्धेन्दु रेतस्य कला ज्योत्स्ना च तद्गता ।
कान्तिः प्रभा च विमला पञ्चैता रोधिकास्ततः ॥ २८।३८३ ॥³
रोधिका (रेखिनी/रोधिनी) की कलायें⁵—रुन्धिनी । रोधनी । रोदध्री ।
ज्ञानबोधा । तमोपहा = ५कलायें ॥ ये ५ कलायें निरोधिका के आवरण की हैं ।⁴
अर्धचन्द्र की अष्टमांश निरोधिका शक्ति होती है ! निरोधिनी शक्ति ब्रह्मा आदि
कारण तत्त्वों को भी आगे बढ़ने से रोक देती है । इसी कारण इसे 'निरोधनी'
कहते हैं । रुन्धनी रोधनी रोदेध्री ज्ञानबोधा तमोपहा एताः पञ्चकलाः प्राहुर्निरोधिन्यां
गुरुत्तमाः ॥ ३८४ ॥⁶
इसके बाद सादाख्य परम भुवन का परिवेश आता है । सादाख्यपरा सदाशिव
देव मन्त्र शरीर है । निरोधिका के ऊपर 'नाद' का आवरण आता है । 'बिन्दु'
अर्धमात्र एवं चतुष्कल होता है उसका आधा 'अर्धचन्द्र' होता है—'अर्धमात्रःस्मृतो
बिन्दुर्व्योमरूपी चतुष्कलः ।' अर्धचन्द्र का अष्टमांश 'निरोधिका शक्ति' होती है ।
'तदर्धमर्धचन्द्रस्तदष्टांशेन निरोधिका'⁷ ॥ ३८५ ॥
निरोधिका आवरण के ऊपर नाद का आवरण है । 'नाद' किञ्जल्क परागवत
रमणीय है । मन्त्रमहेश्वर सदृश सूर्यप्रभ पुरुषों से यह भुवन भरा हुआ है ।
'इन्धिका । दीपिका । रोचिका । मोचिका एवं ऊर्ध्वगा'—ये पाँच नायिकायें वहाँ सदा
सक्रिय रहती हैं ⁸—'नादः किञ्जल्कसदृशो महद्भिः पुरुषैर्वृतः । चत्वारि भुवनान्यत्र
१. शङ्कराचार्य—'प्रपञ्चसारतन्त्र'
२. हेतुन्ब्रह्मादिकान् रुन्द्धे रोधिकां तां त्यजेत्ततः ।
निरोधिकामिमां भित्वा सादाख्यं भुवनं परम् ॥ ३८६ ॥ (तन्त्रालोक)
३-८. तन्त्रालोक
११ वरि.